देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एम्स में हाल में बॉयोमेडिकल वेस्ट के निपटारे के टेंडर में हुई गड़बडिय़ों का खुलासा हुआ है। अब हालत यह है कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं है। सूत्रों के अनुसार, एम्स ने अपने यहां होने वाले बॉयोमेडिकल वेस्ट के निपटारे के लिए सवा करोड़ रुपये सालाना का टेंडर जारी किया था।
इसके तहत अस्पताल में होने वाले मेडिकल कचरे को उस कंपनी को अपने प्लांट में ले जाकर निपटाना था। हैरानी की बात तो यह है कि एम्स के पास अपना इंसीनरेटर पहले से ही है। उसे ठीक करने की बजाय अस्पताल प्रशासन प्राइवेट कंपनियों से कचरा उठवा रहा है। इस समय दिल्ली में बॉयोमेडिकल वेस्ट का निपटारा करने की इजाजत केवल तीन कंपनियों के पास है। एम्स के टेंडर में पेंच के चलते दो कंपनियों ने इस टेंडर प्रक्रिया का बहिष्कार किया था। एकमात्र कंपनी बॉयोटेक सॉल्यूशन ने ही इसके लिए टेंडर भरा था। एम्स प्रशासन ने भी सारे नियम कानूनों को दरकिनार करते हुए उस कंपनी को टेंडर जारी कर दिया।
भारत सरकार के नियमों के अनुसार, यदि किसी टेंडर में केवल एक कंपनी आती है, तो उसे टेंडर जारी नहीं किया जा सकता। ऐसे में संस्थान को कम से कम तीन बार टेंडर निकालना पड़ता है। यदि इसके बावजूद भी वही कंपनी रहती है, तो उस एकमात्र कंपनी को टेंडर जारी किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि जिस कंपनी को यह टेंडर दिया गया है, उस कंपनी के एक पार्टनर प्रणव त्रिपाठी के चाचा दिल्ली की मुख्यमंत्री के कार्यालय में प्रमुख सचिव पीके त्रिपाठी हैं। अस्पताल के टेंडर की सारी प्रक्रिया अस्पताल के सीनियर डॉ. एस. आर्य की देखरेख में हुई। इस संबंध में जब डॉ. आर्य से संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि वह इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं देना चाहते। उनके यहां पर स्टोर डिपार्टमेंट ने यह टेंडर किया है।
दिल्ली से जे. पीयूष की रिपोर्ट











