: यही हाल रहा तो इस अख़बार को अपने ही किसी पेज पर सेव हिंदी (हिंदी बचाओ) का विज्ञापन छापना पड़ेगा : नवभारत टाइम्स (मुंबई) में आज छपी एक खबर का शीर्षक है- “वर्किंग विमन रात भर जाग कर बना रही चकली”. अच्छा होता यदि इसका शीर्षक ‘कामकाजी महिलायें रातभर जग कर बना रही चकली” होता. निःसंदेह नवभारत टाइम्स उर्फ nbt हिंदी का प्रतिष्ठित और हिन्दीभाषियो में लोकप्रिय अख़बार है. पर मेरी समझ में नहीं आता की इसे “हिंगलिश पेपर” बनाने पर क्यों तुले हैं. मेरा मानना है कि हिंदी को शुद्धतावादियों से बचाने की जरूरत है.
पर इसके लिए हिंदी को हिंगलिश बनाने की जरूरत समझ में नही आती. यह अख़बार राजनीति को पोलटिक्स, गिरफ़्तारी को अरेस्ट लिखता है, जो हिंदीभासियो को जरा भी नहीं भाता. अब जिसको राजनीति शब्द का मतलब समझ में नहीं आता, वह हिंदी अखबार पढ़ेगा ही क्यों, वह भी तब जब इस शहर में इंग्लिश के अख़बार लगभग मुफ्त में मिलते है. नवभारत टाइम्स की इस भाषा को लेकर अख़बार के प्रबंधन का यह तर्क हो सकता है कि यह युवा वर्ग की भाषा है. अख़बार को युवाओं से जोड़ने के लिए यह सब किया जा रहा है. पर मुझे यह तर्क इसलिए गले नहीं उतरता क्योंकि जिस अंग्रेजी मानसिकता वाल़े युवाओं का तर्क दिया जाता है, वह हिंगलिश वाला नहीं बल्कि इंग्लिश वाला न्यूज़ पेपर पढ़ते हैं.
इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती की अखबार की भाषाशैली सरल होनी चाहिए. अख़बार को सुबह के लिए प्रातःकाल लिखने की जरूरत नहीं है पर इसका मतलब यह भी नहीं की इसके लिए हिंदी के अख़बार मार्निंग लिखें. हमें मराठी समाचार पत्रों से सीख लेनी चाहिए. आखिर इसी शहर से निकलने वाल़े उसी टाइम्स ग्रुप के मराठी अख़बार महाराष्ट्र टाइम्स के लिए प्रबंधन का यह तर्क क्यों नहीं होता. आज भी इस शहर से निकलने वाल़े महाराष्ट्र टाइम्स सहित मराठी के अन्य अखबारों को अंग्रेजी शब्दों की बैसाखी की जरूरत नहीं पड़ती. उनके पास हर चीज के लिए अपना शब्द है और दूसरी तरफ हिंदी के अख़बार राजनीति व चुनाव जैसे प्रचलित शब्दों के लिए पोलटिक्स व इलेक्सन लिख रहे हैं. हां, अंग्रेजी के कई शब्द हिंदी में इस तरह घुल-मिल गए हैं कि उन्हें अपनाने में हिचक नहीं होनी चाहिए. जैसे पृष्ठ की जगह पेज, लेकिन लगता है नवभारत टाइम्स तो हिंदी को ख़त्म करने पर तुला है. यही स्थिति रही तो इस अख़बार को अपने ही किसी पेज पर सेव हिंदी (हिंदी को बचाओ) का विज्ञापन छापना पड़ेगा. टाइम्स प्रबंधन को चाहिए की नवभारत टाइम्स को भी अंग्रेजी में निकाले. इसके नाम में तो अंग्रेजीयत (nbt) आ ही गयी है.
मुंबई से विवेक कुमार की रिपोर्ट












neeraj jha
November 5, 2010 at 1:23 am
edilye to assam aur north east me khun bikane wala yah akhbar aaj bajar se gayad ho gaya
dr ms parihar
November 5, 2010 at 1:29 am
आदरणीय यशवंत जी, वस्तुत अखबार उत्पाद बन गये हैं। जिस तरह दुकानदार अपने माल को अधिक बेचने के लिए पैकिंग बदलता रहता है, लगभग वही ढर्रा अखबार अपना रहे हैं। यह बेवकूफी नवभारत टाइम्स तक ही सीमित नहीं है अपितु लगभग सभी अखबार ऐसा कर रहे हैं। अधिकांश अखबारों कें संपादक व पत्रकार तेल मालिश करके इस पद पर आये हैं। उनका काम मालिकों व उनके पालते लोगों की हां में हां मिलाना है
vinay singh
November 5, 2010 at 2:55 am
navbharat times to sach me hindi ki band baja raha hai……kuch to sharm karo bhai logo…
akhil
November 5, 2010 at 3:51 am
sahi he english me nikalo NBT
vinay singh
November 5, 2010 at 3:53 am
sach hai, nbt hindi ke sath acha nahi kar raha hai. bhagvan inhe sadbudhi do……….
Rupesh
November 5, 2010 at 4:41 am
Mr Vivek Kumar, NBT English aur Hindi ka bastardized version hai, maaloom? Is newspaper ka editor kaun hai, kya aapko maaloom? Ye newspaper India me ek new type ki Hindi ko popularize karta hai, maaloom? Nahi to, Mr sameer Jain Lala se pooch lo, ask him my friend. Hindi aur English sisters hai, samjha. Mr Obama Bombay aata hai, to Hindi kaise padega, bolo? Uskoo bhi to ek Hindi newspaper padhna mangta, India ka newspaper, samjha? Tum Hindi, Hindi rota hai, kya tum western UP ke Meerut, ghaziabad me diwaal par “15 Din me Angrezi Sikhen” ka ad nahin dekha? Wo isliye ki UP, Bihar, North India ka ladka-ladki log English seekhna mangta, tabhi call centres wala unko naukri dega. Aise me NBT unko bahut bahut help karega. Jo NBT padega, wo aanewale generation ko Hinglish sikhayega. Isse rona mat, yeh achhi baat hai. Jab hamara prime minister theek se Hindi nahin pad sakta, jab hamara Home Minister Hindi ka ek sentence bolke smile karta hai, to us time tum kyun nahin bolta? Hain? NBT ko NBT rahne do. Sameer Lala ise aisa hi banakar rakhega, aur jab is paper ka archives 20 years baad wala generation padhega,to woh unke prati grateful hoga. Sachhidanand Hiranand Vatsyayan, Rajendra Mathur, Vidyaniwas (or Vidyavinash??) Mishra ko kaun poochta? Hain? Jab globalization aa gaya, toh kyun Hindi Hindi karta rahta? TOI ka Adsales wala NBT ka editor ban sakta, kyunki woh bhi bastardized Hindi bolta. Kyunki woh bhi mentally bastardized hai. samjha?
J
November 5, 2010 at 6:12 am
Is akhabar me “times” ak angharaji sabd hai.>:(;D