जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सुभाष राय जो पिछले कई दशक से आगरा में रहते हुए विभिन्न अखबारों में बड़ों पदों पर काम कर चुके हैं, के आगरा स्थित निवास से चोरी हो गई। इस खबर को 14-11-10 के अंक में अमर उजाला ने पेज-4 पर न्यूज डायरी कॉलम में इस तरह प्रकाशित किया है- ”शास्त्रीपुरम में सूने घर से लाखों की चोरी : आगरा। थाना सिकंदरा क्षेत्र िस्थत शास्त्रीपुरम में चोरों ने वरिष्ठ पत्रकार के घर के ताले तोड़कर ढाई लाख रुपये के जेवरात और नगदी साफ कर दी। शास्त्रीपुरम के ए ब्लाक में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुभाष राय लखनऊ में कार्यरत हैं। उनकी पत्नी डा. शशि 10 नवंबर को लखनऊ गई थीं।
शनिवार की सुबह लौटीं तो घर के ताले टूटे पडे थे। चोरों ने अंदर के कमरे में ताले तोडकर प्रवेश कर लिया। इसके बाद अलमािरयों को ताले तोड़कर करीब ढाई लाख रुपये की कीमत के सोने चांदी के जेवरात और सात हजार कैश समेत अन्य सामान साफ कर दिया।”
हिन्दुस्तान ने 14-11-10 के अंक में पेज-7 पर खबर इस तरह दी है- ”शास्त्रीपुरम में चोरी : आगरा। शास्त्रीपुरम(िसकंदरा) में चोरों ने एक पत्रकार के बंद मकान में धावा बोल दिया। दीवार फांदकर मकान के ताले चटकाए और लाखों के आभूषण, तीन दर्जन चांदी के सिक्के और हजारों की नगदी बटोर ले गए। शनिवार की सुबह उनकी पत्नी घर लौटी तो वारदात पता चली। वरिष्ठ पत्रकार सुभाष राय एमआईजी 158 में रहते हैं। वे लखनऊ में एक समाचारपत्र कार्यरत हैं।”
दोनों ही अखबारों ने यह नहीं लिखा कि सुभाष राय जनसंदेश टाइम्स लखनऊ के संपादक हैं। इस तरह लिखा है जैसे सुभाष राय कोई दिहाड़ी कर्मचारी हों। इन अखबारों को पता होना चाहिए कि सुभाष राय अमर उजाला आगरा के संपादक रहे हैं। वे डीएलए, आगरा के संपादक विचार थे। उनके सिखाए कई पत्रकार नाम कमा रहे हैं। हिन्दुस्तान की खबर में तो वाक्य ही गलत है। लिखा है- वे एक समाचारपत्र कार्यरत हैं। कायदे से समाचारपत्र में कार्यरत होना चाहिए। दो कॉलम की खबर ”इलाज न दिलाने पर जेल अधीक्षक दोषी” के साथ शास्त्रीपुरम में चोरी खबर को घुसेड़ा गया है। इसके चलते खबर ढूंढनी पड़ी। लगता है इन अखबारों के संपादक तो कभी अखबार बदलेंगे ही नहीं। लगता है कभी उनके यहां कोई हादसा होगा ही नहीं। लगता है उन्हें कभी खबर छपवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बात यह है कि टुच्चे नेताओं, गली छाप छोकरों की खबरें तो पदनाम समेत छापी जाती हैं, एक संपादक के यहां चोरी होती है तो इस तरह खबर दी गई जैसे वह ढलाई कारखाने में काम करते हैं। मीडिया समुदाय के लिए यह प्रवृत्ति घातक और खतरनाक है.
आगरा के एक सुधी पाठक द्वारा भेजे गए पत्र












Dipti Sikarwar
November 15, 2010 at 10:49 am
Narrowmided newspaper are doing this this from a ling time, recently a teacher of United Management Group Allahabad died in an acident, it’s hindi newspaper United Bharat did;nt publish a single line. Whey these organisation fear, and from whom?
UPENDRA RAI
November 16, 2010 at 4:41 am
अखबारों में काम करने वालो में दिल नाम कि कोई चीज नहीं रह गई। लोग भूल जाते हैं कि ऐसी घटना सुभाष राय पर ही नहीं उनपर भी घट सकती है।
उपेन्द्र राय
mo no. 09452248330
avinash aacharya
November 16, 2010 at 8:29 am
Rai sahab Babu Vishnu Rai paradkar ki peedhi ke aakhiri patrkaar hai. akhbaaron ko unkey baarey me kam se kam ek page jaroor chapna chahiye tha.
akash rai
November 16, 2010 at 10:50 am
patkarta mai kuch jummedaar log news ko news ki tarh na chaap kar weus ki tarh
chaapte aaye hai .
girish pankaj
November 16, 2010 at 3:00 pm
अखबार जगत मे बहुत-से लोग दुर्भावना से ग्रस्त रहते है. सुभाष जी के घर हुई चोरी की जैसी खबर छपी है, उस पर केवल हँसा और उसके बाद अफसोस ही ज़ाहिर किया जा सकता है, कि ऐसा भी होता है. रायपुर से लेकर आगरा तक हर जगह मीडिया में ऐसे लोग घुसे हुए हैं, जो केवल ईर्ष्या ही जीते है. अगर कोई वरिष्ठ पत्रकार मर भी जाये तो लोगों की कोशिश रहती है, कि चार लाइन में खबर निपटा दी जाये, ताकि उसका ज्यादा ‘नाम’ न हो जाये. ज़हरभरा मन लेकर पत्रकारिता करने वाले लोग पहले भी थे और आज भी है. यह चरित्र-सा बन गया है. मैं जब एक अखबार को छोड़ कर दूसरे अखबार का ‘नगरप्रमुख’ बना तो, मेरे पूर्व अखबार के संपादक से जुडी एक खबर छपने आई. आदत के मुताबिक सामने बैठे रिपोर्टर ने पूछा- ”संपादक का नाम उड़ा दूं?” मैंने कहा- ”हरगिज नहीं. जब तक मैं हूँ, किसी भी पत्रकार का नाम नहीं. कटेगा.” मै सामाजिक-साहित्यिक दुनिया में निरंतर सक्रिय रहता हूँ. आयोजनों की खबरें छपने जाती है. लेकिन जब समाचार छपता है, तो मेरा नाम गायब रहता है. मुझे हँसी आती है. हँस कर रह जाता हूँ. क्योंकि मैं पत्रकारों की मानसिकता को जनता हूँ. सब ऐसे नहीं होते. जो सृजनशील होते है, वे उदार होते है, जो पत्रकारिता को अपने स्वार्थ-सिद्धि के लिये इस्तेमाल करने आये हैं और जो सृजन विरोधी है, कुंठित हैं, वे और कुछ नहीं कर सकते, तो किसी का नाम काट कर ही संतुष्ट हो लेते हैं. सुभाष राय जी का अपना एक कद है. वे पत्रकार हैं, और लेखक भी है. एक बड़े अखबार के संपादक भी हो गए है. ये सब देख कर न जाने कितने लोगो का हाज़मा बिगड़ गया होगा. अब मौक़ा मिला, तो चोरी की खबर के बहाने अपनी कुंठा निकाल रहे है. लेकिन इससे श्री राय को फर्क नहीं पडेगा, हाँ, इसा खबर से लोगों का चेहरा ही सामने आ गया.
akash
November 16, 2010 at 3:46 pm
subhas ji ko bhi kuch pase bhijwa dene the to khabar achi lag jati.
अविनाश वाचस्पति
November 17, 2010 at 3:25 pm
बेहद अफसोजनक. दोनो खबरे.
Rekha Srivastava
November 18, 2010 at 7:25 am
ये अखबार के तथाकथित पत्रकार घटना कहीं घटे और उसको घटित कहीं और करवा दें ये भी कोई बड़ी बात नहीं है. ये अखबार वाले अलग अलग घटनाओं को कवर करके आपस में बाँट लेते हैं. सामान्य ज्ञान इतना दृढ होता है कि कौन क्या है इसकी जानकारी भी उन्हें हो ये आवश्यक नहीं है.
Rekha Srivastava
November 18, 2010 at 7:26 am
ये अखबार के तथाकथित पत्रकार घटना कहीं घटे और उसको घटित कहीं और करवा दें ये भी कोई बड़ी बात नहीं है. ये अखबार वाले अलग अलग घटनाओं को कवर करके आपस में बाँट लेते हैं. सामान्य ज्ञान इतना दृढ होता है कि कौन क्या है इसकी जानकारी भी उन्हें हो ये आवश्यक नहीं है.
satyendra
November 18, 2010 at 11:40 am
yah akhabari duniya ka sach hai
jitendra singh rana
November 22, 2010 at 8:40 am
बेहद अफसोजनक क्योंकि मैं पत्रकारों की मानसिकता को जनता हूँ. सब ऐसे नहीं होते. जो सृजनशील होते है, वे उदार होते है, जो पत्रकारिता को अपने स्वार्थ-सिद्धि के लिये इस्तेमाल करने आये हैं और जो सृजन विरोधी है, कुंठित हैं, वे और कुछ नहीं कर सकते, तो किसी का नाम काट कर ही संतुष्ट हो लेते हैं. सुभाष राय जी का अपना एक कद है. वे पत्रकार हैं, और लेखक भी है. एक बड़े अखबार के संपादक भी हो गए है. ये सब देख कर न जाने कितने लोगो का हाज़मा बिगड़ गया होगा. अब मौक़ा मिला, तो चोरी की खबर के बहाने अपनी कुंठा निकाल रहे है. लेकिन इससे श्री राय को फर्क नहीं पडेगा, हाँ, इसा खबर से लोगों का चेहरा ही सामने आ गया.