पेड न्यूज के मामले को अब बड़े कैनवास पर देखने का वक्त आ गया है, लेकिन बाजारवाद और पूंजी की जंजीरों ने पत्रकारों को कुछ इस कदर जकड़ लिया है कि आगे बढ़कर आवाज उठाने वाले इस समाज के सबसे तजुर्बेकार और विशिष्ट पदों पर विराजमान लोग इस मुद्दे को अपने वसूलों तो दूर ख्यालों में भी पनाह नहीं देना चाहते। विडंबना उनके साथ भी है जो नौकरी की शुरुआत करने से कुछ महीनों पहले तक बड़े विचारों की पत्रकारिता करने की सोच के साथ इस पेशे में आए थे।
अफसोस, उनमें से ज्यादातर के वसूल भी एसी की ठंडक और चकाचक रौशनी के साथ मखमली कालीन वाले कमरे में ऑन टेबल टी सिस्टम की चुस्कियों की गुलाम हो गई है, लेकिन ये वो दौर है जिस दौर के पुरोधाओं की गलती का खामियाजा ना सिर्फ देश की अस्सी फीसदी आबादी को बुरी तरह भुगतना होगा, बल्कि मुंह पर ताला डालकर बैठे संपादक पिताओं की संतानों को, बुद्धिजीवी की बजाय सौ फीसदी श्रमजीवी लेखक की वैकेन्सी पर, दिहाड़ी करनी होगी।
पत्रकारों की निगरानी में तैनात इंजीनियरों द्वारा पारित नक्शे से इधर-उधर कलम चलाने पर नौकरी खोने के साथ-साथ हर्जाना और जान देने तक के काल में जो चर्चा होगी, उसमें सिर्फ हमारे वरिष्ठजनों की खिलाफ बददुआएं ही होंगी। हालांकि इतिहास लिखा जाएगा तो इनकी भूमिका खलनायक की नहीं बल्कि हीरो की होगी, क्योंकि सच का सार नए सिलेबस में खुद-ब-खुद बदल जाएगा।
हमारे वरिष्ठजन मुझ नाचीज जितनी भी समझ नहीं रखते या फिर मैं ही नासमझ हूं, मुझे ये सवाल भी बहुत सता रहा है। पत्रकार बंधु जिस किसी के पास मेरे निम्नलिखित सवालों का जवाब होगा या फिर अगर आपको ये सवाल बकवास भी लगता होगा, तो भी मेरी समझ बढ़ाने में मदद करें।
1. क्या अपने घर का खर्च चलाने के लिए आतातायियों के समर्थन में निरीह जनता के ‘क्रूर शोषण का साझीदार’ बनाना सही है?
2. क्या लोकतंत्र से आस लगाए देश की अस्सी फीसदी आबादी की ‘आंखों’ का, पैसों की गोद में गहरी नींद सो जाना और फिर उसी का हो जाना उसके नीचतई की इंतेहा नहीं?
3. कारपोरेट वकीलों की तरह ‘जनता के वकीलों’ की धनलोलुपता को क्या पत्रकारिता के किसी नियम और सिद्धांत के तहत जायज ठहराया जा सकता है?
4. टकटकी लगाकर अखबार पढ़ने वाली तथा साथ ही कान और आंख लगाकर समाचार चैनलों से उम्मीद लगाए बैठी जनता को झूठे तर्कों से सच का आईना दिखाना गद्दारी नहीं? ( ऐसे में क्या पत्रकार शब्द का इस्तेमाल भी जयचंद और विभीषण के पर्यायवाची के तौर पर शुरु नहीं कर देना चाहिए)
5. जुगाड़ कल्चर की मार झेल रहे व्यवस्था में बौद्धिक स्वाभिमान को कुचलते हुए, योग्य लोगों की जगह मुद्रा और मालजुगाड़ी लोगों को इस पेशे में जगह देना क्या खुद को बलात्कारियों के हवाले करने जैसी बात नहीं?
6. संचार क्रांति के नाम पर मुनाफे की नीयत से मीडिया संस्थानों को लाइसेंस देकर क्या सरकार पत्रकारिता के वजूद को समाप्त करने की साजिश नहीं कर रही? (ज्यादा मीडिया हाउस होने से पैदा हुई प्रतिस्पर्धा में ब्रेकिंग न्यूज के लिए झूठ या भ्रांतियों का सहारा लिया जा रहा है, इससे सम्मान का पर्याय पत्रकार अब मक्कारी का उदाहरण बनता जा रहा है )
7. क्या गरिमा, सच और संघर्ष जैसे कई शब्दों के आवरण में संतुष्टि पाता पत्रकार प्रोफेश्नलिज्म नामक शब्द से खुद को संतुष्ट करने की नाकाम कोशिश में नहीं जुटा गया है?
8. विद्रोह और जनआंदोलन से जुड़ी खबरों की जगह बिकाऊ खबरें परोसकर पत्रकार जिस समाज का पैरवीकार बन गया है, ये उसे गर्त में धकेल रहा है या फिर किसी और गहरे कुएं में?
9. क्या हमारी गलतियों ने हमें इस मुकाम तक पहुंचा दिया है कि हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते?
10. क्या खुद को ऊंचा उठाने की चाह में लोकतंत्र के सिपाहियों ने पत्रकारिता को इतना नीचे नहीं गिरा दिया है कि इसे दी गई लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की उपाधि खारिज कर देनी चाहिए?
साथियों, ये सभी सवाल मुझे लगातार परेशान कर रहे हैं। मेरी परेशानी का निदान करने के अलावा अगर आप अपनी परेशानी और उससे पार पाने के उपायों से भी मुझे अवगत कराते तो अच्छा होता। ये सवाल इसलिए अहम है क्योंकि लगातार कई संस्थाओं से योग्य पत्रकारों और संपादकों को पेड न्यूज का जुगाड़ नहीं कर पाने और उसका विरोध करने पर किनारे करने की कवायद शुरु हो जाती है। ऐसे में ये सोचना भी जरुरी है कि आप कहां खड़े रहना चाहते हैं, ‘अस्सी फीसदी आबादी की उम्मीदों की लहरों पर’, या फिर ‘दूसरे पाले में?’
लेखक प्रभात पाण्डेय पिछले सात साल से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अपनी बेबाक लेखनी के जरिए समय-समय पर मीडियाकर्मियों को विचार-विमर्श के लिए उपस्थित होते रहते हैं।












DHIRENDRA KUMAR
November 17, 2010 at 6:21 am
प्रभात जी आपने जो दस सवाल खड़ें किए हैं…वो थोड़ा बड़ा हो गया है…मेरे हिसाब से सवाल की जद में सिर्फ इतनी ही बात होनी चाहिए थी..कि…वरिष्ठ लोगों में से कितने इस पत्रकारिता के बाजार में सिर्फ इसलिए बने हुए हैं कि अब वो किसी दूसरे बाजार के लायक नहीं रहे…जानकारी के अभाव में सिर्फ इसलिए वरिष्ठ के पद पर बने हुए हैं कि उन्होंने पत्रकारिता तब शुरू की थी जब पत्र के आकार से जनता को सीधा वस्ता नहीं होता था..या कहें कि लोकतंत्र का पहला स्तंभ के पास लोकतंत्र का चौथा स्तंभ का कोई माएने नहीं था…कह सकते हैं पत्रकारिता के जरिए सत्ता की दलाली की जा रही थी..और आज यही दलाली की आदत इन्हें वरिष्ठ के कुर्सी पर आसीन किए हुए हैं..नहीं तो ज्ञान और जनसरोकारो के मामले में 74 के पावरफुल चश्मे से बिहार के समाज को नहीं देखा जा सकता है…जमाना तेजी से बदल रहा है…तकनीकी के साथ समाज और विकास के साथ भावना को जोड़ना होगा…याद रहे मुद्दा छूटना नहीं चाहिए..ये चुनौती है…अब बयानबहादुरों के बयान को कलमबद्द कर के पत्रकार नहीं बना और रहा जा सकता है..खबरों को तोड़ने मड़ोरने का जमाना भी लद गया..नई पीढ़ी ज्ञान पिपाशु है…साथ ही शोध भी चाहिए…तभी सूबे के जनता के दिल को जीता जा सकता है…बाजार आपके पीछे होगा..आगे चलने के लिए कदम आगे बढ़ाने की जहमत तो उठानी होगी..पीछे से आगे नहीं बढ़ा जा सकता…श्रमजीविओ की श्रम की कद्र हो..आगे रास्ता शीशे की तरह साफ है
dhanish sharma
November 17, 2010 at 7:37 am
reporter subki class lata hain.or apna unki class la li.good.
RAMAN SHRIVASTAVA
November 17, 2010 at 10:28 am
भाई दिल कि बात जुबान पर ले ही आये
Rakesh pandey, Raipur
November 17, 2010 at 10:46 am
Now a days there is no mission in journalism. It’s only a proffession. All editors and reporters are tools for industrialist to boost their business. It’s the true reallity of todays journalism. They never recquire a brillient scholar for reporting or editing. They recquire only those man who act for the benifit of the organization not for the common. The day will arrive when the newspapers and chhanels will loss their credibilty and people will buy news papers only to wipeout the litter not for news.We all have to think regarding this serious issue. Thanx for ten questions. Littile bit the words used in it is not sounds very good., but OK.
shailendra parashar
November 17, 2010 at 3:30 pm
kami to hai bhai tav hi to aaj hmari kalam ki awaz dav chuki h or es busniss patrkarta ki line m bohat compitson paida ho gaya h to aj sav kuchh jayag sa ho gaya h a sav hm ap khatam nahi kr sakte esko to sarkar hi khatam kr sakegi qki aj 1oo main se ek patrkar keval rupaye kamane ke liye banana chahte h?
kumar kalpit
November 17, 2010 at 8:06 pm
prabhat ji ab patrakarita kahan rah gayi hai.field me dalali rah gai hai to desk par babugiri. pahle shahityakar log akhbar nikala karte the ab sarab ke karobari yaa baniya akhbar nikal rahen hai. pahale akhbar misan tha aab ho gaya hai.yaise me yah ummid kaio karte hai ki akhbar se kranti ho jayegi.
yashovardhan nayak tikamgarh.
November 18, 2010 at 2:07 am
यशवंत जी ,टीकमगढ़ जिले से प्रकाशित “अवन्ती सहारा” नाम के अखबार की सम्पादक श्रीमती सुमित्रा राजपूत को छः माह की सजा और सौ रूपये के अर्थदंड से दण्डित किया गया. श्रीमती राजपूत के खिलाफ इक्कीस जनवरी 2002 को मानहानि का इस्तगासा अदालत में पेश किया गया था .सीनिअर एडवोकेट बाबूलाल यादव ने पीड़ित पक्ष की पैरवी की थी .श्री दशरथ सिंह यादव के आवेदन पर अदालत ने मामला 3325 / 2008 क्रमांक पर धारा 499 , 500 भा.द.वि .के तहत अपराध दर्ज किया गया था .श्रीमती सुमित्रा राजपूत के अख़बार के खिलाफ इसी प्रकार के अन्य प्रकरण चल रहे है .
kd
November 18, 2010 at 5:57 am
sawal bahut hain lekin palan utna hi muskil
kd
November 18, 2010 at 6:00 am
sawal bahut hain, nidan muskil