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दुख-दर्द

थानेदार साहब मैं आतंकवादी नहीं हूं

संजीवमेरे साथ पांवटा पुलिस के एसएचओ ने जो कुछ बर्ताव किया उसकी सफाई में भड़ास4मीडिया में आप सबके सामने इसलिए रख रहा हूं ताकि आप सबको भी यकीन हो कि मैं आतंकवादी नहीं हूं। मेरे पिता जिनके आगे में स्वर्गीय शब्द इसलिए नहीं लिख सकता क्योंकि हमें उन पर कफन तक डालने का अवसर नहीं मिला। क्या आप जानते हैं क्यों… क्योंकि वो असम राईफल्स में एक सैनिक थे। हमें उनकी लाश तक नसीब नहीं हुई तो फिर स्वर्गीय कहने का मतलब ही कहां उठता है। एसएचओ साहब आपको पांवटा पुलिस थाने में आए आज सिर्फ चार महीने हुए हैं लेकिन आपकी जानकारी के लिए हम आपको बताते हैं, जब आपकी पुलिस गहरी नींद सो रही थी और हिमाचल प्रदेश की बालाओं को फांस कर दलाल खरीद रहे थे, तब मैंने उनका असली चेहरा दुनिया के सामने रखा था, वो अलग बात है आपकी पुलिस ने उसका सारा श्रेय खुद ले लिया।

संजीवमेरे साथ पांवटा पुलिस के एसएचओ ने जो कुछ बर्ताव किया उसकी सफाई में भड़ास4मीडिया में आप सबके सामने इसलिए रख रहा हूं ताकि आप सबको भी यकीन हो कि मैं आतंकवादी नहीं हूं। मेरे पिता जिनके आगे में स्वर्गीय शब्द इसलिए नहीं लिख सकता क्योंकि हमें उन पर कफन तक डालने का अवसर नहीं मिला। क्या आप जानते हैं क्यों… क्योंकि वो असम राईफल्स में एक सैनिक थे। हमें उनकी लाश तक नसीब नहीं हुई तो फिर स्वर्गीय कहने का मतलब ही कहां उठता है। एसएचओ साहब आपको पांवटा पुलिस थाने में आए आज सिर्फ चार महीने हुए हैं लेकिन आपकी जानकारी के लिए हम आपको बताते हैं, जब आपकी पुलिस गहरी नींद सो रही थी और हिमाचल प्रदेश की बालाओं को फांस कर दलाल खरीद रहे थे, तब मैंने उनका असली चेहरा दुनिया के सामने रखा था, वो अलग बात है आपकी पुलिस ने उसका सारा श्रेय खुद ले लिया।

संजीवमैं ही वो इंसान हूं जब आपके विभाग के एक हेड कांस्टेबल घूस ले रहा था तब मैंने ही उसे बेनकाब किया था, आज वो नौकरी से हाथ धो बैठा है। कानून ने भी संजीव शर्मा के मत को सही माना। आगे भी सुनिये आपको हम आतंकवादी लगते हैं तो वो अलग बात है, लेकिन जब चुपचाप शेरों की नसबंदी हो रही थी, तब मैंने ही ये आवाज़ देश के नम्बर एक न्यूज़ चैनल पर वाईल्ड लाईफ विभाग की पोल खोली थी। जब पांवटा साहिब में एक नाबलिग लड़की का बलात्कार हो रहा था और आपके पुलिस कर्मचारी तमाशा देख रहे थे, तब मैंने ही सच्चाई कैमरे पर आपके विभाग को दिखाई थी।

मीडिया में दस साल से सेवा जरूर दे रहा हूं, आधा दर्जन मीडिया के बड़े घरानों में अपनी सेवा देने के बाद भी आज ज़मीन पर हूं। आप जैसे अधिकारी हमें हमारी औकात याद दिला ही देते हैं। दस साल सेवा देने के बाद भी अपने परिवार के लिए दस मीटर ज़मीन नहीं खरीद पाया हूं, यही मेरी असली औकात है। आप वर्दी का रौब दिखाते हैं और हमें खुद को पत्रकार कहने से भी तकलीफ होती है क्योंकि हमारे कुछ साथी आपकी सेवा में लगे हैं।

आपने उस दिन सच कहा था आप जैसा ऑफिसर मुझे कभी नहीं टकराया। यह सच है टकरना भी नहीं चाहिए, क्योंकि थोड़ा बहुत जो मुझे पुलिस पर विश्वास है शायद वो पहले ही उठ जाता। और आप जैसा ऑफिसर टकरा भी कैसे सकता है क्योंकि इस तरह के पुलिस ऑफिसरों का शायद हिमाचल तो क्या यूपी में भी जन्म तक नहीं हुआ होगा फिर टकराने का सवाल ही नहीं। अपनी सफाई मैं अपने सच्चे साथी भड़ास4मीडिया के माध्यम से रख रहा हूं क्योंकि प्रेस क्लब पांवटा साहिब तो आपकी सेवा में है…और रहेगा भी।

पांवटा प्रेस क्लब का पुलिस प्रेम

बात बीते गुरूवार की यानी एक दिसम्‍बर इस दिन पांवटा साहिब से बीस किलोमीटर दूर सतौन नाम के कस्बे में जो कुछ पत्रकारों के साथ हुआ उसने खाकी के खलनायक होने का सबूत दे दिया, लेकिन इसके बाद जो प्रेस क्लब पांवटा साहिब के पत्रकारों ने किया उसने उनकी नीयत और साख पर एक नहीं एक हजार सवाल खड़े कर दिये। पत्रकारों ने ये साबित करने में कोई कमी नहीं छोडी कि किस कदर पुलिस और प्रेस का प्यार होता है… वो अलग बात है जिन्हें पुलिस ने सरेबाजार जलील किया वो भी पत्रकार थे और उनकी ख़बर बनाने वाले भी पत्रकार ही थे।

दरअसल हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिला के पांवटा साहिब से बीस किलोमीटर की दूरी पर पत्थरों की सबसे बड़ी मंडी है। हिन्दी मासिक पत्रिका के न्यूज़ सब एडिटर संजीव शर्मा अपने परिवार के साथ किसी परिवारिक काम से जा रहे थे कि उन्होंने देखा खाकी के नशे में चूर पांवटा साहिब थाने के एसएचओ ने हिमाचल से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र के पत्रकार संजय कंवर को पकड़ रखा है। बीच बचाव में जब संजीव ने पुलिस से कारण पूछा तो वजह मोटरसाइकिल में लिखा प्रेस शब्द था। एसएचओ का कहना था कि प्रेस शब्द लिखवाने से पहले डीसी नाहन और पांवटा पुलिस से परमिशन लेनी होती है। इस बयान पर संजीव शर्मा ने विरोध जताया, उनका कहना था पुलिस विभाग इस तरह का कोई भी आदेश जारी नहीं कर सकता। क्योंकि उन्हें सूचना विभाग से ऐसी कोई भी जानकारी नहीं मिली है, अगर ऐसा है तो आप निसंकोच मोटरसाइकिल का चलान कर दें और कानूनी प्रक्रिया पूरी करें।

बस फिर क्या था पहले तो एक पत्रकार का बचाव जब एक पत्रकार ने किया तो पुलिस को ये बात रास नहीं आई। खाकी वर्दी के रौब को कम पड़ता देख उन्‍होंने अपने साथ आए पुलिस वालों को कहा इन्हें गाड़ी में डालो। पूरा बाजार पुलिस के खिलाफ सड़क पर उतर गया। इस बीच एसएचओ ने अपनी लाज बचाने के लिए ये तक कह दिया कि जिस गाड़ी में प्रेस लिखा होता है उसे चलाने संजीववाला आतंकवादी हो सकता है। इस शब्द को सुनते ही संजीव शर्मा ने एसएचओ से इन शब्दों को वापस लेने को कहा… हद तब हो गयी जब उन्‍होंने संजीव शर्मा को भी अरेस्ट करने के बात कही।

बीच बचाव में आये कस्बे के लोगों के सामने ही एसएचओ ने कहा कि तुम दोनों की पत्रकारिता तुम्हारे….. में डाल दूंगा, तुम्हे आज से पहले मुझ जैसा पुलिस ऑफिसर नहीं टकराया होगा। इस पूरे घटनाक्रम को सैकड़ों लोगों ने अपनी आंखों से देखा भी और पुलिस का भी विरोध भी किया। खाकी के इस हमले ने न तो संजीव शर्मा के हौसले को तोड़ा और न ही संजय कंवर के, क्योंकि वो अपनी जगह सही थे, यही नहीं डीएसपी पांवटा साहिब ने पुलिस के इस कारनामे पर खेद भी व्यक्त किया और कहा मीडिया आज़ाद है और पुलिस विभाग लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की कद्र करता है। उन्होंने कहा कि एसएचओ के खिलाफ मामला सही पाये जाने पर सख्त कार्रवाही होगी।

अब प्रेस और पुलिस प्रेम की गाथा भी सुनें इस पूरे घटनाक्रम का ब्यौरा संजय कंवर ने प्रेस क्लब पांवटा साहिब को दे दिया। अचानक एक आपात बैठक बुलाई गई। अब संजीव शर्मा और संजय को भी लगा कि प्रेस क्लब जरूर कोई कदम उठायेगा, लेकिन इस बार भी राजनीति प्रेस क्लब की नीयत पर हावी रही।

दरअसल हिमाचल के दैनिक समाचार पत्र आपका फैसला ने इस ख़बर को प्राथमिकता से छापा कि सतौन में दो पत्रकारों के साथ पुलिस ने दुर्व्यवहार किया और पुलिस की निंदा भी की। थोड़ा सा समय जरूर लगा लेकिन अगले दिन प्रेस क्लब ने अपना रंग दिखा ही दिया। सभी पत्रकारों ने अपने-अपने समाचर पत्रों को ख़बर भेज दी। जिसमें थाना प्रभारी का बयान प्रमुखता से छापा- ये सच है संजीव शर्मा के सामने जब एसएचओ एक पत्रकार को जलील कर रहा था तो वो बिना सोचे समझे उसके बचाव में उतर आये। लेकिन पांवटा प्रेस क्लब सिर्फ एसएचओ के प्रेम में उलझकर एक पत्रकार को एसएचओ के कहने पर आम आदमी और गंवार-नासमझ नज़र आया।

तकलीफ इस बात की नहीं है कि मीडिया वालों ने उन्हें आम आदमी कहा बल्कि तकलीफ इस बात की है कि जिस इंसान ने अपने परिवार को दांव पर लगा कर हिमाचल के इतिहास में पहला स्टिंग ऑपरेशान करके सैकड़ों हिमाचली बालाओं को हुस्न के दलालों के जाल में फंसने से बचाया और दलालों को बेनकाब करके उन्हें सलाखों के अन्दर पहुंचाया,  तब इन प्रेस वालों ने ही उसकी तारीफ के पुल बांधकर अपने समाचार पत्र के पहले पन्ने पर छापा था और मीडिया में कुछ अलग कर दिखाने के लिए शाबाशी भी दी थी। वही लोग उसी संजीव शर्मा को पत्रकार कहने तक में शर्म महसूस की, जिन्‍हें ये दस साल से जानते हैं। आखि़र एसएचओ के सामने मीडिया की क्या मजबूरी हो सकती है कि वो अपने साथी तक को भूल गये। सरोकारी पत्रकारिता पर यकीन रखने वाले संजीव पूरे सिरमौर जिला में पहले ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने कई नामी चैनलों में न्यूज़ एंकर और न्यूज़ प्रोड्यूसर तक की भूमिका निभाई। लेकिन जब उन्‍होंने फिर अपनी जन्म भूमि को कर्म भूमि बनाने की कोशिश की तब पांवटा प्रेस क्लब को वो रास नहीं आ रहे।

संजीव शर्मा

एडिटर इन चीफ

प्रगति मीडिया सर्विस

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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0 Comments

  1. sanjay

    December 7, 2010 at 6:07 am

    sanjeev sharma ji aap ka cell no.kaya hai ,

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