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नोएडा फिल्म सिटी में ‘कार-ओ-बार’ बंद!

: कप्तान साहब से टीवी जर्नलिस्टों की अपील- जरा जल्दी रेट फाइनल कर लें : नोएडा में फिल्म सिटी है और फिल्म सिटी में ही तमाम न्यूज चैनलों और प्रोडक्शन हाउसेज के दफ्तर हैं। छोटी सी दुनिया है कुछ अलग ढंग की। दफ्तर में दफ्तरी माहौल है… कुछ तलब लगी तो बाहर निकल आए। तमाम चाय, पान, सिगरेट, की दुकाने हुआ करती थीं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से सारी दुकानें बंद हो गई हैं, रेहड़ियां हटा दी गई हैं। ये चाय पान की दुकानें समाजवाद की प्रतीक थीं। बौद्धिक जुगाली का भी अच्छा सेंटर। अलग अलग चैनलों के लोग इन्हीं चाय की दुकानों पर मिलते थे, एक दूसरे का हाल जानते थे, कुछ सुनते थे, कुछ सुनाते थे।

: कप्तान साहब से टीवी जर्नलिस्टों की अपील- जरा जल्दी रेट फाइनल कर लें : नोएडा में फिल्म सिटी है और फिल्म सिटी में ही तमाम न्यूज चैनलों और प्रोडक्शन हाउसेज के दफ्तर हैं। छोटी सी दुनिया है कुछ अलग ढंग की। दफ्तर में दफ्तरी माहौल है… कुछ तलब लगी तो बाहर निकल आए। तमाम चाय, पान, सिगरेट, की दुकाने हुआ करती थीं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से सारी दुकानें बंद हो गई हैं, रेहड़ियां हटा दी गई हैं। ये चाय पान की दुकानें समाजवाद की प्रतीक थीं। बौद्धिक जुगाली का भी अच्छा सेंटर। अलग अलग चैनलों के लोग इन्हीं चाय की दुकानों पर मिलते थे, एक दूसरे का हाल जानते थे, कुछ सुनते थे, कुछ सुनाते थे।

चाय बहाना बन जाती थी, आए दिन मुलाकात हो जाया करती थी। तमाम चैनलों के संपादक भी इन चाय की दुकानों पर घंटों बतियाते दिखाई पड़ते थे। यानी यहां छोटे बड़े, ऊंच नीच का कोई भेद नहीं था। काम से वक्त निकालकर कुछ दिल्लगी भी इन दुकानों पर हो जाती थी। लिट्टी और समोसे की दुकान पर तो इतनी भीड़ होती थी कि पूछिए मत। कभी भी वो मांग के हिसाब से आपूर्ति नहीं कर पाता था।

शाम ढलने के बाद फिल्म सिटी रंगीन हो जाया करती थी। कारोबार का दौर शुरू हो जाता था, कहीं और नहीं जाना, इन्हीं दुकानों पर सारा माल मौजूद होता था। सोडा, पानी, नमकीन, सिगरेट..। सब कुछ। जिसकी जैसी शिफ्ट छूटी, काम शुरू। कुछ गुबार निकले, कुछ गीत संगीत हुआ। यानी फिल्म सिटी अठारह घंटे गुलजार। चाय पानी, सोडा, नमकीन, सिगरेट, मसाला बेचकर उन तमाम लोगों का पेट पलता था, जो यूपी बिहार से रोजी रोटी के लिए यहां आए हैं।

अभी सब कुछ ठप है। फिल्म सिटी वीरान हो गई है। साल में एक दो बार ऐसा ही होता है। ये दुकानें हटवा दी जाती हैं। जब भी यहां वसूली का रेट बढ़ाना होता है, ऐसा ही होता है। एक चाय वाला मिला, पूछा कि क्या बात है, क्यों हट गईं तुम्हारी दुकानें। बड़ी मासूमियत से बोला कि नए एसएसपी आए हैं, अब फिर से नया रेट लगेगा। अभी तक फिल्म सिटी से एक लाख रुपये महीने जाता था, अब देखिए नए कप्तान साहब कितने में मानते हैं।

ये कप्तान साहब पर आरोप नहीं है। हम लोग बखूबी जानते हैं कि पैसे देकर ही ये चाय और लिट्टी की दुकानें यहां पर चलती हैं। तंत्र ऐसा है कि कोई किसी की मदद नहीं कर सकता। वो कमाकर खुश हैं और ये अपनी कमाई का हिस्सा पहुंचाकर खुश हैं। अच्छे समधी हैं। समधियाना निभ भी रहा है। हमने कई बार देखा है यहां के पुलिसवाले हराम में खा पीकर चल देते हैं, पैसे नहीं देते। दुकान वाले बाद में उन्हें गालियां देकर मन हल्का कर लेते हैं। बेचारे और करें भी क्या।

खैर..। फिल्म सिटी उदास है। लोग दफ्तर से बाहर नहीं निकल रहे हैं। शिफ्ट छूटी तो घर के लिए निकल लिए। जो लोग सिगरेट के शौकीन हैं, लेकिन पैकेट नहीं रखते, उनकी बड़ी सांसत है। जो लोग पैकेट रखते हैं वो और भी सांसत में हैं। क्योंकि मांगने वालों की भीड़ ज्यादा है। अब ब्रांड अहम नहीं है। बस कुछ मिल जाए, दो फूंक मार लें। यानी सिस्टम ठप पड़ा है। फिल्म सिटी की लाइफ लाइन चौपट हो चली है।

अगर नए कप्तान साहब ने फर्ज निभाते हुए ये दुकानें हटवाई हैं तो मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि जरा अट्टा में भी कुछ प्रबंध कर लें। मेन बाजार के बीचोबीच शराब की दुकान है, हर पव्वे, अद्धे और बोतल पर दस रुपये एक्स्ट्रा लिया जाता है। वहीं सामने मयखाना चलता है। देर रात तक चलता है। पुलिसवाले भाई साहब भी होते हैं, मस्त हो जाते हैं। लाखों की रोजाना की कमाई है। वहां के दुकानदारों की मानें तो पुलिस को मोटा चढ़ावा जाता है। तो अगर कप्तान साहब कुछ नया करना चाहते हैं तो उसी को बंद करवा दें, काहे बेचारे छोटे कामकाजियों के पेट पर लात मार रहे हैं।

और अगर रेट फाइनल करने वाली बात सही है, तो फाइनल कर लें, क्योंकि तलबगारों की तड़प बढ़ती जा रही है। रहा सवाल भ्रष्टाचार का तो हम खाद्यान घोटाला बरदाश्त कर रहे हैं, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला बरदाश्त कर रहे हैं। आपका ये चाय लिट्टी घोटाला भी बरदाश्त कर लेंगे। बस जरा जल्दी कर लीजिए कप्तान साहब।

(कार-ओ-बार बंद होने से आहत कई टीवी जर्नलिस्टों की तरफ से लिखित, संपादित और अग्रेषित पत्र. उनका कहना है कि इस पत्र को फिल्म सिटी में काम करने वाले तमाम पीड़ित पत्रकारों के स्वहित में जारी माना जाए)

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0 Comments

  1. vivek

    December 9, 2010 at 11:49 am

    बहुत खूब क्या लिखा है………

    मन को छू गया………………………

  2. manu

    December 9, 2010 at 1:22 pm

    क्या बात..क्या बात..बहुत अच्छा

  3. preeti bisht

    December 9, 2010 at 1:40 pm

    Hmesha kamjor ka hi gala kaata jata hai,,.. baki jo taqatwar hote hain unhe to sab salam karte hain..

  4. rahul

    December 9, 2010 at 3:45 pm

    शर्म आनी चाहिए इस लेख को लिखने वालों को.. पत्रकार हैं तो क्या गलत चीज को सही ठहराएंगे खुलेआम शराब पीने की स्टोरी चलाते हुए तो बड़े खुश होते होगें ये पत्रकार ..और जब खुद पीते है तो सब न्याय संगत हो जाता है वाह रे. ईमानदार प्राणियों और जिन भाई साहब ने ये लिखा है उन्होने अट्टा का जिक्र क्यों कर दिया बहुत से पत्रकारों का तो ये नया ठिकाना होगा, तो फिर उसे भी बदस्तूर जारी रहने दीजिए.. इस वाहियात लेख के लिए बहुत बहुत शुक्रिया विकृत मानसिकता का शानदार नमूना है ये

  5. gaurinath

    December 9, 2010 at 7:26 pm

    bahi hum to taras gaye hai dukano ke khulne ko….gaon ka chauraha sa mil jata tha dukano ke aas paas… ab to DHAR144 lage hoo aisa lagta hai …

  6. अजित त्रिपाठी

    December 10, 2010 at 9:06 am

    राहुल..पगला गए है,उन्हें इस लेख में अय्याशी दिख रही है…उन गरीबों की लाचारी नहीं..जो अमनी कमाई का आधा हिस्सा खाकी की भेंट चढ़ा देते हैं…

  7. SANDEEP SRIVASTAVA

    December 10, 2010 at 10:18 am

    bhai vah, koi tv journalist rate taye karni ki baat kase ker sakta hai…. police valo ke paisa lene ka puri tarah se virod hona chahiya…. tv journalist to kaptan sahab ke samne bade asahay se najar aa rahe hai…. he bhagvan aaj kya halat ho gayi patrakaro ki?????????

  8. Kundan Kritagya

    December 11, 2010 at 8:56 am

    Is Story Mein Ek Varga Shoshak Ka Hai Aur Do Varga Shoshit Ka……. Dono Shoshit Vargon Ki Apni Apni Peera Hai….. Aur Jahan Shoshit Vyaktiyon Ki Itni Sankhya Ho…… Wahan Shoshak Varg Ka Raaj( Gunda Raaj) Jyada Nahi Chalata….. Jago Grahak Jago……

  9. raajdoot fatfati

    December 11, 2010 at 12:25 pm

    ;D इंडियन एक्सप्रेस ने आज ध्यान बांटने के लिए दिग्विजय-करकरे वाली स्टोरी छापी। बासी कढ़ी में उबाल क्योंकि दिग्गी ये सब कई दफ़ा कह चुके हैं। दरअसल, कल रात ही दो बड़ी स्टोरी आ चुकी थीं। पहली- कांग्रेस पर विकिलीक्स का खुलासा और दूसरी- आउटलुक के पास राडियागेट से जुड़े 800 नए टेप। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के शेखर गुप्ता ने पूरा ज़ोर लगा दिया कि फ़ायनेंशियल एक्सप्रेस के मैंनेजिंग एडीटर एम.के.वेणु (नीरा राडिया के परमसखा) और एनडीटीवी (जहां शेखर वाक द टाक शो करते हैं) की बरखा दत्त को बचाया जाए। इंडियन एक्सप्रेस कहां से कहां आ गया। हे गोयनका सुनो।

    भड़ास जी, बरखा वाला नया टेप यहां है.. आउटलुक पर
    http://www.outlookindia.com/article.aspx?268626
    http://www.outlookindia.com/

  10. mintu singh

    February 10, 2011 at 11:14 am

    jin logo ko apane boss ko salami dene ke liye sarab party dena padrata tha un logo ke liye dukan hatane se bahut aaram huaa hai zee news ke cameraman ke boss maitu ji ko to apana ab paket halka karana padrega kyon ki apane cameramano se bahut jyada party liya karate the

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