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तहलका के खिलाफ अवमानना की याचिका दायर

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में आज साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘तहलका’ के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गयी है। ‘तहलका’ पर यह आरोप लगाते हुए अवमानना याचिका दायर की गयी है कि इसके एक अंक में कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ मानहनि करने वाली टिप्पणी प्रकाशित हुई थी ।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में आज साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘तहलका’ के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गयी है। ‘तहलका’ पर यह आरोप लगाते हुए अवमानना याचिका दायर की गयी है कि इसके एक अंक में कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ मानहनि करने वाली टिप्पणी प्रकाशित हुई थी ।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुशील कुमार मिश्रा की ओर से ‘तहलका’ के खिलाफ दायर याचिका में पत्रिका के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई की मांग की गयी है। मिश्रा की दलील है कि ‘तहलका’ के 18 दिसंबर 2010 के अंक में उच्च न्यायालय के 35 न्यायाधीशों की तस्वीरें प्रकाशित की गयी हैं और इसमें उनकी ‘मानहानि’ करती टिप्पणियां भी प्रकाशित की गयी हैं। न्यायालय द्वारा बुधवार को इस याचिका पर सुनवाई किए जाने की संभावना है। साभार : भाषा

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0 Comments

  1. dr dk gupta

    January 20, 2011 at 11:37 am

    tehlaka ne jo kaha sach kaha . adalat ka matlab he aja deja leja tabaha hoja

  2. dr dk gupta

    January 20, 2011 at 11:35 am

    there is truth in tehalaka. adalat ka meaning aja deja leja tabaha hoja. i am with tehalaka.

  3. rajeshwar singh

    December 22, 2010 at 4:38 pm

    अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे, 35 न्यायाधीशों पर टिप्पणी. खुदा खैर करे..
    शुरुआत में आम लोगों की तरह मैं भी तहलका की बेबाकी का कायल था. पहले ही स्टिंग आपरेशन में तहलका को जो प्रसिद्धि मिली वो हर किसी के नसीब में नहीं होती. रातों रात तहलका का नाम देश के हर आदमी की जुबान पर आ गया. लेकिन जब नशा उतरा तो ये टीम फिर से कोई बड़ा खुलासा करने की कोशिश में लग गयी, इसी कोशिश में उन्होने कई खुलासे किये लेकिन शुरुआती सफलता को दोहरा नहीं सके. बड़ा खुलासा करने के अतिरेक में उन्होने कई बेदाग़ चरित्रों पर कीचड़ उछालने में भी गुरेज़ नहीं किया किया (इनके एक फर्जी स्टिंग के बारे में तो में १०० श्योर हूँ, देश की बड़ी जांच एजेंसी के हाथ उस स्टिंग में यूज किये गए व्यक्ति तक पहुँच चुके हैं, उसी व्यक्ति से जुड़ा एक मामला अदालत में है, इसलिए और ज्यादा विस्तार में जाना उचित नहीं होगा).
    इस बार मामला न्यायाधीशों की मानहानि का है. हालाँकि मैंने अभी ‘तहलका’ का 18 दिसंबर 2010 अंक नहीं पढ़ा है लेकिन तहलका की सत्य के साथ खिलवाड़ कर पर पॉपुलरिटी पाने की फितरत से वाकिफ हूँ…..न्यायाधीशों पर की गई टिप्पणियों में अगर वाकई ऐसा कुछ है जो गलत है तो समझो हो गया तहल….का

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