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ब्लैकमेल करके धन कमाने के लिए अखबार छाप रहे हैं लोग

[caption id="attachment_18349" align="alignleft" width="63"]भूपेंद्र सिंह गर्गवंशीभूपेंद्र सिंह गर्गवंशी[/caption]हमारे शहर के कुछ बिगड़े हुए रईस हैं। पुराने जमाने में आधा शहर इन्हीं की खतौनी में दर्ज था। जमाना बदला जमींदारी चली गई, फिर ये लोग क्या करें यह किसी की समझ में नही आया। अंग्रेजों ने देश छोड़ दिया था, हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों को भगाने का कार्य अच्छे ढंग से किया था। ये लोग नहीं चाहते थे कि अंग्रेजी राज का समापन हो। खैर! अब जब कि हम पूर्णरूप से स्वतन्त्र देश के निवासी बन गए हैं तब इन जमींदारों के सामने ऐशो-आराम को लेकर दिक्कतें आने लगी।

भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी

भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी

हमारे शहर के कुछ बिगड़े हुए रईस हैं। पुराने जमाने में आधा शहर इन्हीं की खतौनी में दर्ज था। जमाना बदला जमींदारी चली गई, फिर ये लोग क्या करें यह किसी की समझ में नही आया। अंग्रेजों ने देश छोड़ दिया था, हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों को भगाने का कार्य अच्छे ढंग से किया था। ये लोग नहीं चाहते थे कि अंग्रेजी राज का समापन हो। खैर! अब जब कि हम पूर्णरूप से स्वतन्त्र देश के निवासी बन गए हैं तब इन जमींदारों के सामने ऐशो-आराम को लेकर दिक्कतें आने लगी।

कहने वालों के अनुसार इस समय इन कथित जमींदारों का नाम ही रह गया है, ये बेचारे बनकर रह गए हैं। कोई दुआ-सलाम तक नहीं करने वाला। कहा जाता है कि इनका भी एक जमाना था- जब आम लोग इनके परदादाओं के सामने से होकर गुजरने से भय खाते थे। तब देश आजाद नहीं हुआ था। आम आदमी इन जमींदारों का रिआया कहलाता था। इनका प्रभुत्व हुआ करता था। इन्हीं में से कई ऐसे थे जो नवाबों की जिन्दगी जीते थे। बड़े प्रभावशाली थे। जमाना बदल गया 15 अगस्त 1947 में देश स्वतन्त्र हो गया। अंग्रेज अपने मुल्क चले गए और देश में लोकतन्त्र बहाल हो गया। 1952 से इनकी जमींदारी भी चली गई, राज-रियासत समाप्त होने लगीं। फिर भी इनके पूर्वजों का रूतबा कुछेक वर्षों तक कायम था। और जमाना ऐसा पलटा कि जो लोग चाँदी-सोने के पात्रों में भोजन करते थे, उनके घरों में चूल्हें तक नहीं जलने की नौबत आ गई।

इसी को कालचक्र का प्रभाव कहते हैं। पॉलिटिक्स में भी फेल हो गए। फिर पिछले ढाई दशक से जब पॉलिटिकल काउण्ट डाउन शुरू हुआ तब से ये लोग एकदम से बेचारे हो गए। चूँकि जमींदार रह चुके थे इसलिए उनके हाव-भाव से झलकता था कि रस्सी जल गई मगर ऐंठन न गई। फिर उन्हीं में से कुछ लोगों ने जीने के लिए व्यवसाय शुरू करके पैसा कमाना शुरू कर दिया। हवेलियां बियावान होने लगीं। कइयों की बिक गई। नवधनिको ने अच्छी कीमत देकर खरीद लिया। चाय की दुकान से फुटपाथ पर कपड़ा बेचने तक का कार्य करने वाले पुराने जमींदार राजनीति और मीडिया से भी जुड़ने लगे।

अकबर इलाहाबादी के शेर ‘‘न खींचों कमानों को न तलवार निकालो, गर दुश्मन हो मुकाबिल तो अखबार निकालो’’ से सबक लेते हुए ये लोग समाज में अपने वजूद के स्थायित्व के लिए अखबार भी निकालना शुरू कर दिए। अभी भी ये लोग समाज में जो प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए वह नहीं प्राप्त कर सके हैं। कारण यह बताया जाता है कि ये लोग बड़े ही स्वार्थी एवं लालची किस्म के हैं। ‘‘परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा नहीं सम अधमाई’’ जैसी पंक्तियाँ इन पर अक्षरशः लागू होती हैं। धरम-करम में विश्वास नहीं करते हैं, बस अपने भले के लिए थाना पुलिस से लेकर सर्वोच्‍च  न्यायालय तक जा सकते हैं। ‘आया है सो जाएगा, राजा, रंक, फकीर’ जैसे वाक्यों को ये लोग शायद भूल ही गए हैं। इन्हें लोग बवाली कहते हैं। पीठ पीछे गालियाँ देते हैं। कम अक्ल होते हुए इस बिरादरी के कतिपय लोग लम्बी चौड़ी हांकते हैं जैसे देश का संविधान इन्हें कण्ठस्थ हो।

बहरहाल! इन जैसों के बारे में ज्यादा क्या कहूँ? ऐसे लोग तो लगभग हर जगह पाए जाते हैं। ऊपर वाला ऐसे लोगों से बचाए, मैं तो बच के रहता हूँ, वैसे एक बात बता दूं कि मैं क्षत्रिय हूं खांटी, मुझे किसी कोर्ट का डर नहीं। बांस कोर्ट से बड़ा कोर्ट कोई नहीं। एक बात और बता दूँ कि इस जाति के लोग बांस कोर्ट से ही डरते हैं। मेरी बिरादरी पहले ‘बांस कोर्ट’ को ही ‘प्रिफर’ करती है। इतना कहकर मिस्टर धाकड़ सिंह बोले डियर कलम घसीट मैं ऐसे अखबार वालों से नहीं डरता। उसके बारे में तो सभी जानते हैं कि वह अब अखबार निकालकर लोगों को ब्लैकमेल कर रहा है। कस्बे के कई लोग पीड़ित हो गए हैं, कई आभूषण विक्रेताओं का सेन्सेक्स डाउन हो गया है। धाकड़ सिंह ने कहा डियर अभी इस जाति के एक अखबार वाले को पैसों की जरूरत थी, तो उसने छापा कि हे गुमनाम पत्र प्रेषक आप साक्ष्य प्रस्तुत करें तो मैं अमुक स्वर्णाभूषण व्यवसाई के खिलाफ समाचार छापूंगा। बाद में पता चला कि व्यवसाई ने एक पेटी (मुम्बई के भाई की भाषा वाली) देकर समाचार न छापने का अनुरोध किया मामला रफा-दफा हो गया।

अब कस्बे के कई ऐसे लोग आजिज आ गए हैं जिनके खिलाफ वह अपने समाचार-पत्र में लिखकर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास करता है। धाकड़ सिंह ने कहा प्रिय अग्रज कलमघसीट यदि आप का वरदहस्त बना रहेगा तो एक न एक दिन मैं इस अखबार वाले की हड्डी-पसली तोड़कर रख दूंगा। इसकी आने वाली कई पीढ़ियां किसी का भयादोहन नहीं करेंगी। यार यह तो उसी खानदान का है जिसमें कितने चरित्रहीन, दुराचारी, अनाचारियों ने जन्म लिया था। चोर, डाकू, लफंगे, लुच्चों का वंशज है यह। जानते हैं ना इसके खानदान के लोग फ्रीडम फाइटर बने हुए हैं फर्जी नाम लिखाकर, जबकि हकीकत यह है कि वे लोग अंगेजों के पिट्ठू थे। कितनी औरतों की जिन्दगी खराब करके रख दिया था इनके बाप-दादाओं ने। अब देखो यह ससुरा अखबार निकालकर ‘ब्लैकमेलिंग’ के जरिए धन उगाही कर रहा है। ऊ का है कि अब सरऊ कै नक्शेबाजी हमीं मिटाऊँगा। इतना कहकर धाकड़ सिंह चुप हो गए और मैं भी अपना कार्य करने लगा।

लेखक भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी यूपी के अंबेडकरनगर जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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0 Comments

  1. BHARAT SINGH

    December 22, 2010 at 11:11 am

    bhaisab mmubarak ho aap ne ek niv dali. niv pad gai to bhawan ban hi jaega.

  2. syed husain akhtar

    December 22, 2010 at 1:52 pm

    janab aap ki baaton ka halkapan tabhi jhalak gaya jab aapne akber allahabadi ka sher ghalat likh diya.aap ke ilaque ke sabse bade zamindar majlisi saheb ko mai janta hun aur ye bhi janta hun ki wo na blackmailer hain aur na hi phatehaal.aap apni vyaktigat vyatha ko kripya sarvvyapi na banayen.Dhanyawad

  3. raja jani

    December 22, 2010 at 4:25 pm

    bhai saab har chhikke ke do pahalu hote h……….jaha acchhai hogi wah burai bhi nazar aayegi….sab kush yuhi chalega

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