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भोजपुरी मीडियाकर्मी भाषा व्याकरण भी जानें (1)

Amrendra Kumarभोजपुरी मीडिया से जुड़े लोगों, खासकर भोजपुरी चैनलों में जो काम कर रहे हैं और स्क्रिप्ट लिखते हैं, उन्हें भोजपुरी के सटीक शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से करना चाहिए। किसी जगह के पानी या बाढ़ के जलस्तर के संबंध में अगर ‘भर पोरसा’ या ‘हाथी डुबान’ पानी कहा जाए तो अच्छा लगेगा। ‘कमरभर’ और ‘छातीभर’ पानी तो कहा ही जाता है। इसी तरह दही बड़ा बनने के पूर्व केवल छान कर निकाले हुए पकौड़े को ‘कोरवर’ और आम के छोटे पौधे को ‘अमोला’ कहना भोजपुरी भाषा में प्रचलित है।

Amrendra Kumarभोजपुरी मीडिया से जुड़े लोगों, खासकर भोजपुरी चैनलों में जो काम कर रहे हैं और स्क्रिप्ट लिखते हैं, उन्हें भोजपुरी के सटीक शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से करना चाहिए। किसी जगह के पानी या बाढ़ के जलस्तर के संबंध में अगर ‘भर पोरसा’ या ‘हाथी डुबान’ पानी कहा जाए तो अच्छा लगेगा। ‘कमरभर’ और ‘छातीभर’ पानी तो कहा ही जाता है। इसी तरह दही बड़ा बनने के पूर्व केवल छान कर निकाले हुए पकौड़े को ‘कोरवर’ और आम के छोटे पौधे को ‘अमोला’ कहना भोजपुरी भाषा में प्रचलित है।

‘बिल्लौरी’ आंख के लिए ‘बिलरअंक्खा’ और हल्के पीले के लिए ‘पियराह’ शब्द का प्रयोग करना भोजपुरी भाषा के साथ न्याय करना होगा। मीडियाकर्मियों को ऐसे ही सैकड़ों शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। वृक्ष की पतला डाली को ‘डेहुंगी’ कहना ज्यादा उचित होगा। भोजपुरी चैनलों के लोग कीचड़ के लिए अगर ‘हांच’ और ‘पांकी’ शब्दों का प्रयोग करें तो उचित होगा। यह तभी संभव है जब भोजपुरी भाषा के चैनलों में काम करने वाले मीडियाकर्मी भोजपुरी भाषा और साहित्य से परिचित होने के साथ-साथ भोजपुरी के व्याकरण और शब्द-संपदा की जानकारी रखें।

डा. ग्रियर्सन ने भारतीय भाषाओं पर महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया” नामक ग्रंथ में भोजपुरी भाषा पर भी लिखा गया है। इसके बाद भारतीय भाषा वैज्ञानिकों ने भोजपुरी के व्याकरण पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इनमें डा. नलिनी मोहन सान्याल, डा. सुनीति कुमार एवं डा. उदयनारायण तिवारी, डा. विश्ववनाथ प्रसाद एवं डा. रामविलास शर्मा महत्वपूर्ण हैं। कई अन्य व्यक्तियों ने भी भोजपुरी भाषा व व्याकरण पर शोध कार्य किया है। डा. रसिक बिहारी ओझा “निर्भीक” और डा. शुकदेव सिंह ने भी भोजपुरी व्याकरण पर अपनी पुस्तकों क्रमश: ”भोजपुरी  शब्दानुशासन” व ”भोजपुरी और हिन्दी का तुलनात्मक अध्ययन” मे जो बातें लिखीं हैं, उससे भोजपुरी का व्याकरण लिखने वालों को नई दिशा मिलेगी। साथ ही भोजपुरी से जुड़े लोग भी इन पुस्तकों से लाभान्वित होंगे।

डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने भी अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ”भोजपुरी व्याकरण, शब्दकोश और अनुवाद की समस्या” में भोजपुरी भाषा की शब्द संपदा और इस भाषा के विकास एवं समृद्धि की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा कर एक ऐसा महत्वपूर्ण शोधात्मक कार्य किया है, जो भोजपुरी से जुड़े लोगों को नई दृष्टि देती है।


लेखक अमरेंद्र कुमार बिहार के सासाराम जिले के निवासी हैं। वे हिंदी के प्राध्यापक रहे, बाद में सक्रिय पत्रकारिता की ओर मुड़ गए। वे कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रहे। अमरेंद्र जी ने पत्रकारिता पर कई किताबें भी लिखी हैं। उनसे संपर्क 09990606904 के जरिए किया जा सकता है।

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