
दीपक अग्रवाल
सरलता की प्रतिमूर्ति : अतुल जी के बुलावे पर पहले तो मैं हिचकिचाया, लेकिन फिर कोटद्वार से बस में सवार होकर मेरठ के लिए चल दिया। असल में उस दौर की पत्रकारिता मिशनरी थी, हम पैसे के लिए नहीं बल्कि लोगों को जागरूक करने और आंदोलन खड़ा करने के लिए पत्रकारिता कर रहे थे। शराब माफिया की साजिश का शिकार हुए पत्रकार स्व. उमेश डोभाल भी हमारे दौर में शामिल थे। किसी व्यक्ति के इशारे पर नाचना या पत्रकारिता करना हमें कतई मंजूर नहीं था। अतुल जी ने मेरे अंदर की आग को पहचाना। मेरठ आफिस में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर उनसे चर्चा हुई। इस दौरान हम दोनों इतने सहज हो गए कि जब उन्होंने डेस्क पर काम करने का आफर दिया, तो मैं चाहते हुए भी टाल न सका। समय बीतता गया गया और दो साल सफलतापूर्वक निकल गए। मैंने उन्हें हमेशा बड़े भाई के समान माना और भाईसाहब ही कहा।
प्रयोगधर्मी : अतुल जी के प्रयोग करने की क्षमता का मैं शुरुआत से ही कायल रहा हूं। मुझे परखने के लिए उन्होंने रिपोर्टिंग के लिए तैयार किया और फिर बुलंदशहर भेज दिया। उस समय काला आम चौराहे पर अमर उजाला का आफिस हुआ करता था। अतुल जी के कहने पर मैं रिपोर्टिंग के लिए बुलंदशहर तो आ गया, लेकिन मेरे पास कोई साधन नहीं था। उस समय स्कूटर लेना अपने बूते की बात नहीं थी। शायद अतुल जी ने यह कमी भांप ली। उस समय मोबाइल नहीं होते थे। अतुल जी पीएनटी से फोन करके मुझे मेरठ बुलाया। जब मैं मेरठ पहुंचा तो वह आफिस में नहीं थे। उन्होंने मुझे अपनी जिप्सी से कोठी में बुलवा लिया। हाल-चाल पूछा और परेशानी की बात छेड़ते ही रिपोर्टिंग के साधन की कमी का जिक्र किया। उस समय मुझे मात्र 1300 रुपये पगार मिलती थी। बातचीत करते-करते वह भाभी जी की ओर मुखातिब हुए और दो अंगुलियां उठाकर आलमारी से पैसे लाने को कहा। कुछ ही देर में भाभी जी नोटों की दो गड्डियों के साथ हमारे सामने थीं। अतुल जी से 20 हजार की नकदी देते हुए मुझसे स्कूटर लेकर ठीक ढंग से काम करने को कहा। मेरे काफी मना करने के बाद भी उनकी जिद के आगे मेरी एक न चली। हांलाकि यह पैसे बाद में मैंने किश्तों में चुका दिया, लेकिन उनकी इस मदद से मेरा काम बहुत आसान हो गया। उनमें जो सहजता और सरलता थी, वह बिरले ही व्यक्तित्व में मिलती है। राजुल जी में उनकी झलक देखी जा सकती है।
अंधविश्वास : अतुल जी पहले तो किसी पर विश्वास करते नहीं थे और जब करते थे तो उसे सब कुछ सौंप देते थे। उस पर अंधविश्वास करते थे। हरियाणा में फेल होने का सबसे बड़ा कारण भी यही था। सन् 2000 में जब हरियाणा लांचिंग हुई, तो मेरठ से तैयार की गई टीम में मुझे भी भेजा गया। अतुल जी के निर्देशन में अमर उजाल ने पूरे हरियाणा को जीत लिया था, लेकिन कुछ अपने ही लोगों ने उन्हें धोखा दे दिया। भास्कर ने अमर उजाला के कुछ अधिकारियों को खरीद लिया। ऐसी आंधी चली कि अमर उजाला सिमटता चला गया, जो आज तक नहीं उभर पाया है। इस दौरान अखबार पर मानहानि के कई मामले दर्ज हुए। हरियाणा में जब अखबार गिर रहा था तो मैंने उन्हें सचेत किया था, लेकिन उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया। हालांकि बाद में उन्होंने मुझे बताया- ‘दीपक तुम्हारा शक सही था।’
कर्मचारी हितैषी : हरियाणा में रहते मैं भी मानहानि के एक मामले में फंस गया। अतुल जी जानते थे कि इसके लिए मैं दोषी नहीं हूं। इसके बावजूद मैं आत्मग्लानि महसूस करता था। इस मामले में ही मुझे तीन दिन जेल में भी रहना पड़ा था। अतुल जी इससे इतने चिंतित थे कि हर रोज जेल से मेरी खैर-खबर लेते रहते थे। मैंने भी उनसे वादा किया था कि चाहे संस्थान में कितना भी शोषण हो जाए मैं मुकदमेबाजी को खत्म करने के बाद ही अमर उजाला को बाय-बाय कहूंगा। बाद में मैंने किया भी वही। सन् 2007 में हल्द्वानी से अमर उजाला से विदा लेने के बाद जब में नोएडा आफिस में अतुल जी से मिलने पहुंचा, तो वे बोले-‘तुम तो मुझसे भी बड़े जिद्दी निकले’।
लेखक दीपक अग्रवाल हिन्दुस्तान, आगरा में चीफ सब एडिटर हैं.












surendranath sinha
January 17, 2011 at 4:28 pm
bahut thik likha hai apne.atulji jaise udyami,karmath,samajhdar,aur sath hi manviya punjipati viral hi hote hain.unki atma jahan hogi,param shanti me hogi.wah vastavik karmayogi the.
unke chote bhai rajulji,jinpar ab amarujala ka daromadar a para hai,bhi asadharan vyakti hain.ve jara low profile hain lekin karmathta naitikta aur vyapar buddhi me atulji se 19 nahi.vah avashya apane akhbar ko nayi unchaiyan de payenge.
vineet sharma
January 13, 2011 at 6:11 am
sahi kaha aapne