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यूरोपीय संघ देखेगा बिनायक सेन के मुकदमे की सुनवाई

[caption id="attachment_19070" align="alignleft" width="68"]मदन कुमार तिवारीमदन कुमार तिवारी[/caption]यूरोपीय संघ ने अपने पर्यवेक्षकों की एक टीम को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन के मुकदमे की सुनवाई को देखने के लिये भेजने का फ़ैसला किया है। टीम में यूरोपीय यूनियन के सभी छह देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। विदेश मंत्रालय को इस संबंध में एक अनुरोध प्राप्त हुआ है, जिसे विदेश मंत्रालय ने छत्‍तीसगढ सरकार को अग्रसारित कर दिया है। सुनवाई सोमवार को होनेवाली है। छत्‍तीसगढ़ सरकार ने उच्च न्यायालय को इसकी सूचना देते हुये निर्णय लेने का आग्रह किया हैं।

मदन कुमार तिवारी

मदन कुमार तिवारी

यूरोपीय संघ ने अपने पर्यवेक्षकों की एक टीम को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन के मुकदमे की सुनवाई को देखने के लिये भेजने का फ़ैसला किया है। टीम में यूरोपीय यूनियन के सभी छह देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। विदेश मंत्रालय को इस संबंध में एक अनुरोध प्राप्त हुआ है, जिसे विदेश मंत्रालय ने छत्‍तीसगढ सरकार को अग्रसारित कर दिया है। सुनवाई सोमवार को होनेवाली है। छत्‍तीसगढ़ सरकार ने उच्च न्यायालय को इसकी सूचना देते हुये निर्णय लेने का आग्रह किया हैं।

मैंने याहू तथा अन्य साइट पर देखा कि हमारे तथाकथित देशभक्‍त मित्रों को यूरोपीय संघ की यह कार्यवाही नागवार लगी है। इससे वह सारे लोग, जिनका कभी पुलिस और न्यायालय की ज्यादतियों से पाला नहीं पड़ा है या जो जानबूझकर अपने मुल्क की न्यायायिक व्यवस्था की कमियों को स्वीकार नही करना चाहते हैं, यूरोपीय संघ के इस फ़ैसले को भारत की न्यायिक व्यवस्था पर लागाये गये अभियोग की तरह देख रहे हैं। यहां मैं बता देना चाहता हूं कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन उच्च न्यायालय की कार्यवाही को देखना चाहता है तो उसे एक पास बनवाना पड़ता है उच्च न्यायालय के अंदर प्रवेश के लिये। आज ही बिनायक सेन जी के मुकदमे की सुनवाई होनी है।

लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के निवासी हैं. पेशे से अधिवक्ता हैं. 1997 से वे वकालत कर रहे हैं. अखबारों में लिखते रहते हैं. ब्लागिंग का शौक है. अपने आसपास के परिवेश पर संवेदनशील और सतर्क निगाह रखने वाले मदन अक्सर मीडिया और समाज से जुड़े घटनाओं-विषयों पर बेबाक टिप्पणी करते रहते हैं.

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0 Comments

  1. mahesh sinha

    January 24, 2011 at 8:42 am

    यूरोपियन यूनियन को क्या इस देश में केवल एक ही मामला दिखा रहा है ?
    उनका और बिनायक सेन का क्या संबंध है। बिनायक सेन की पहुँच जरूर लंबी है !!

  2. girish kesharwani

    January 24, 2011 at 10:13 am

    आदरणीय मदन कुमार तिवारी जी

    जनता डॉ. बिनायक सेन की सुनवाई में यूरोपियन संघ की भाग लेने का विरोधी नहीं है,यहाँ सवाल यह उठता है की स्वतंत्रता के पचास साल के इतिहास में यह पहला अवसर है जिसमें यूरोपीय संघ को ऐसा क्या लगा की वे डॉ. साहब की कार्यवाही देखने के लिए बेचैन हैं, जब नक्सलियों द्वारा हमारे जवानों और आम नागरिकों का कत्लेआम किया जाता है तो यही यूरोपीय संघ इसे भारत का आंतरिक मामला कहकर चुप बैठ जाते हैं. मेरा मतलब किसी को नक्सली समर्थक या नक्सली कहना नहीं है, मेरा कहने का तात्पर्य यह है यह भारत का आतंरिक मामला है इसमें कोई भी बहार के देश दखलंदाजी करे तो इसमें देश की विश्वसनीयत पर प्रश्न चिन्ह लगना लाजमी है | यदि डॉ. बिनायक सेन को निचली अदालत में न्याय नहीं मिला तो जरुरी नहीं की उपरी अदालत में भी न्याय नहीं मिलेगा | डॉ. बिनायक सेन यदि निर्दोष हैं तो जरुर उनको न्याय मिलेगा |

  3. madan kumar tiwary

    January 24, 2011 at 11:31 am

    महेश भाई मैं आपकी इस बात से सहमत हूं की इस देश में केवल एक हीं मामला नही है । लेकिन ् यूरोपीय संघ को इस एक केस को देखने की जरुरत क्यों महसुस हुई यह भी तो सोचिये । वस्तुत: यह केस हमारे देश के तानाशही कानून का उदाहरण है। आप भादवि की धारा १२४ ए पढ लें आपको लगेगा की उस धारा के प्रावधानों के अनुसार हम आप हर वह शख्स जो सरकार की नितियों से सहमत नही है , मुल्क का गद्दार है । रही बात बिनायक सेन की लंबी पहुंच की तो कभी बिनायक सेन से न मिलने के बावजूद अगर मेरे जैसा व्यक्ति भी व्यथित है और उनके पक्ष में आवाज उठा रहा है , पुरे विश्व से आवाज उठ रही है , मतलब कुछ तो है । निश्चित हीं लंबी पहुंच है बिनायक सेन जी की ।

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