Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

पत्रकारिता का तेवर बदल देगी वैकल्पिक मीडिया

पीकेपत्रकारिता में हम अब एक नई अवधारणा का उदय देख रहे हैं। इसे वैकल्पिक पत्रकारिता अथवा अल्टरनेटिव जर्नलिज्म का नाम दिया गया है। लेकिन वैकल्पिक पत्रकारिता को लेकर काफी संशय का माहौल है। स्थापित मीडियाकर्मी इसे छिछोरापन मानते हैं और कतिपय तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं। यही नहीं, वे यह भी मानते हैं कि इसमें अनुशासन और पेशेवर दृष्टिकोण का अभाव है, अत: वैकल्पिक पत्रकारिता को तथ्यात्मक पत्रकारिता मानना भूल है।

पीकेपत्रकारिता में हम अब एक नई अवधारणा का उदय देख रहे हैं। इसे वैकल्पिक पत्रकारिता अथवा अल्टरनेटिव जर्नलिज्म का नाम दिया गया है। लेकिन वैकल्पिक पत्रकारिता को लेकर काफी संशय का माहौल है। स्थापित मीडियाकर्मी इसे छिछोरापन मानते हैं और कतिपय तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं। यही नहीं, वे यह भी मानते हैं कि इसमें अनुशासन और पेशेवर दृष्टिकोण का अभाव है, अत: वैकल्पिक पत्रकारिता को तथ्यात्मक पत्रकारिता मानना भूल है।

हमें समझना होगा कि वैकल्पिक पत्रकारिता का जन्म कैसे हुआ। पत्रकारिता के अपने नियम हैं, अपनी सीमाएं हैं। आदमी कुत्ते को काट ले तो खबर बन जाती है, कोई दुर्घटना, कोई घोटाला, चोरी-डकैती-लूटपाट खबर है, महामारी खबर है, नेताजी का बयान खबर है, राखी सावंत खबर है, बिग बॉस खबर है, और भी बहुत कुछ खबर की सीमा में आता है। कोई किसी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करवा दे, तो वह खबर है, चाहे अभी जांच शुरू भी न हुई हो, चाहे आरोपी ने कुछ भी गलत न किया हो, तो भी सिर्फ एफआईआर दर्ज हो जाना ही खबर है। ये पत्रकारिता की खूबियां हैं, ये पत्रकारिता की सीमाएं हैं।

अभी तक वैकल्पिक पत्रकारिता को सिटीजन जर्नलिज्म से ही जोड़कर देखा जाता रहा है, जबकि वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। बहुत से अनुभवी पत्रकारों के अपने ब्लॉग हैं, जहां ऐसी खबरें और विश्लेषण उपलब्ध हैं जो अन्यत्र कहीं प्रकाशित नहीं हो पाते। सिटीज़न जर्नलिज्‍म और अल्टरनेटिव जर्नलिज्म में यही फर्क है कि सिटीज़न जर्नलिज्‍म ऐसे लोगों का प्रयास है, जो पत्रकारिता से कभी जुड़े नहीं रहे पर वे अपने आसपास की घटनाओं के प्रति जागरूक रहकर समाज को, अथवा मीडिया के माध्यम से समाज को उसकी सूचना देते हैं। उस पर अपनी राय व्यक्त करते हैं। दूसरी ओर, वैकल्पिक पत्रकारिता ऐसे अनुभवी लोगों की पत्रकारिता है, जो पत्रकारिता के बारे में गहराई से जानते हैं, लेकिन पत्रकारिता की मानक सीमाओं से आगे देखने की काबलियत और ज़ुर्रत रखते हैं। यह देश और समाज के विकास की पत्रकारिता है, स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशहाली की पत्रकारिता है।

वैकल्पिक पत्रकारिता, स्थापित पत्रकारिता की विरोधी नहीं है, यह उसके महत्व को कम करके आंकने का प्रयास भी नहीं है। वैकल्पिक पत्रकारिता, परंपरागत पत्रकारिता को सप्लीमेंट करती है, उसमें कुछ नया जोड़ती हैं, जो उसमें नहीं था, या कम था, और जिसकी समाज को आवश्यकता थी। वैसे ही जैसे आप भोजन के साथ-साथ न्यूट्रिएंट सप्लीमेंट्स लेते हैं ताकि आपके शरीर में पोषक तत्वों का सही संतुलन बना रहे और आप पूर्णत: स्वस्थ रहें। वैकल्पिक पत्रकारिता, परंपरागत पत्रकारिता के अभावों की पूर्ति करते हुए उसे और समृद्ध, स्वस्थ तथा और भी सुरुचिपूर्ण बना सकती है।

पारंपरिक पत्रकारिता में दो बड़े वर्ग उभर कर सामने आये हैं। एक बड़ा वर्ग नेगेटिव पत्रकारिता को पत्रकारिता मानता है, जो सिर्फ खामियां ढूंढऩे में विश्वास रखती है, जो मीडिया घरानों के अलावा बाकी सारी दुनिया को अपराधी, टैक्स चोर अथवा मुनाफाखोर मानकर चलती है, जबकि दूसरा वर्ग पेज-3 पत्रकारिता कर रहा है, जो मनभावन फीचर छापकर पाठकों को रिझाए रखता है। वैकल्पिक पत्रकारिता इससे अलग हटकर देश की असल समस्याओं पर गंभीर चर्चा के अलावा विकास और समृद्धि की पत्रकारिता पर भी ज़ोर दे रही है।

कुछ वर्ष पूर्व तक अखबारों में खबर का मतलब राजनीति की खबर हुआ करता था। प्रधानमंत्री ने क्या कहा, संसद में क्या हुआ, कौन सा कानून बना आदि ही समाचारों के विषय थे। उसके अलावा कुछ सामाजिक सरोकार की खबरें होती थीं। समय बदला और अखबारों ने खेल को ज्यादा महत्व देना शुरू किया। आज क्रिकेट के सीज़न में अखबारों के पेज के पेज क्रिकेट का जश्न मनाते हैं। इसी तरह से बहुत से अखबारों ने अब बिजनेस और कार्पोरेट खबरों को प्रमुखता से छापना आरंभ कर दिया है। फिर भी देखा गया है कि जो पत्रकार बिजनेस बीट पर नहीं हैं, वे इन खबरों का महत्व बहुत कम करके आंकते हैं। वे भूल जाते हैं कि शेयर मार्केट अब विश्व में तेज़ी और मंदी ला सकती है, वे भूल जाते हैं कि आर्थिक गतिविधियां हमारे जीवन का स्तर ऊंचा उठा सकती हैं। इससे भी बढक़र वे यह भी भूल जाते हैं कि पूंजी के अभाव में खुद उनके समाचार-पत्र बंद हो सकते हैं। कुछ मीडिया घराने जहां बिजनेस बीट की खबरों से पैसा कमाने की फिराक में हैं, वहीं ज्य़ादातर पत्रकार बिजनेस बीट की खबरों को महत्वहीन मानते हैं।

उदारवाद के बाद से भारतवर्ष में मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग का काफी विस्तार हुआ है। इस वर्ग की आय तेजी से बढ़ी है और बढ़ती महंगाई के बावजूद यह वर्ग महंगाई से त्रस्त नहीं दिखता और यह वर्ग बड़ी कारों, बड़े टीवी सेटों तथा आराम की अन्य वस्तुओं पर भी लट्टू हो रहा है। दूसरी ओर निम्न मध्यवर्ग और निम्न वर्ग महंगाई की चक्की में बुरी तरह पिस रहा है और उसे कोई राह नहीं सूझ रही। समस्या यह है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली इस वर्ग का जीवन स्तर सुधारने में सहायक नहीं है। इस वर्ग को गरीबी से निज़ात पाने का मार्गदर्शन नहीं मिलता और वे न केवल गरीब रह जाते हैं, बल्कि गरीबी की मानसिकता के कारण और भी गरीब होते चलते हैं और अमीरी के विरोधी बन जाते हैं। वे हर अमीर व्यक्ति को शोषक और भ्रष्ट मानकर उनके प्रति ही नहीं, अमीरी के प्रति भी घृणा का भाव पाल लेते हैं।

इसका एक ऐतिहासिक कारण भी है। हमारे देश में सांसारिक विषयों और मोह-माया के त्याग की बड़ी महत्ता रही है जिसके कारण धनोपार्जन को हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है। ‘जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान’ की धारणा पर चलने वाले भारतीयों ने गरीबी को महिमा मंडित किया या फिर अपनी गरीबी के लिए कभी समाज को, कभी किस्मत को दोष दिया, तो कभी ‘धन’ को ‘मिट्टी’ बता कर धनोपार्जन से मुंह मोड़ऩे का बहाना बना लिया। दुर्भाग्यवश दो सौ साल की लंबी गुलामी ने धन के मामले में हमें आत्म संतोषी ही नहीं पलायनवादी भी बनाया। परिणाम यह हुआ कि सामान्यजन यह मानकर चलते रहे कि ‘जो धन कमाता है वह गरीबों का खून चूसता है।’ यानी, धारणा यह बनी कि धन कमाना बुराई है। मीडियाकर्मी, खासकर भाषाई अखबारों से जुड़े पत्रकार भी जाने-अनजाने इस सोच के वाहक और पोषक बने। हमारे देश में 50 से 80 के दशक के बीच की हिंदी फिल्मों ने भी यही किया। यह गरीबी नहीं, गरीबी की मानसिकता है।

वैकल्पिक पत्रकारिता शोषण और अन्याय के विरोध तो करती है पर यह अमीरी और विकास की विरोधी नहीं है। इस रूप में वैकल्पिक पत्रकारिता को आप मिशन पत्रकारिता भी कह सकते हैं। गड़बड़ी यह है कि वैकल्पिक पत्रकारिता ज्यादातर वेब पत्रकारिता तक सीमित है। विभिन्न ब्लॉग और वेबसाइटें वैकल्पिक पत्रकारिता की वाहक तो हैं पर उनकी पहुंच अत्यंत सीमित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह धारा और मजबूत होगी और आने वाले कुछ वर्षों में यह पत्रकारिता के तेवर बदलने में सहायक होगी।

पीके खुराना का यह लेख उनके ब्‍लॉग माई इंडिया डॉट कॉम से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. DorseyBarbara32

    January 24, 2011 at 10:03 am

    Following my investigation, billions of people in the world receive the personal loans from good banks. So, there’s a good chance to find a car loan in any country.

  2. Khushdil Kaur

    January 24, 2011 at 2:51 pm

    खुराना जी अनुभवी संपादक हैं और उनके लेख सदैव सारगर्भित होते हैं। वेब पत्रकारिता पर उनका यह लेख उनकी जानदार कलम का एक और उदाहरण है।

    यह सचमुच पते की बात है कि देश में गरीबी तो है ही, गरीबी की मानसिकता उससे भी बड़ी समस्या है। मैं खुराना जी की इस बात से भी सहमत हूं कि बहुत से भाषाई पत्रकार गरीबी की मानसिकता के शिकार हैं। यदि हम भारतवर्ष को एक महाशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं तो हमें पहले गरीबी की मानसिकता से उबरना होगा।

    इतने बढिय़ा लेख के लिए आपको और खुराना जी को साधुवाद!

    खुशदिल कौर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...