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दुख-दर्द

एक जज से दुखी दो महिलाएं (भाग-एक)

: भरी अदालत में कपड़े उतारने पर क्‍यों मजबूर हुई रॉ की पूर्व अधिकारी निशा प्रिया भाटिया : निशा ने तत्‍कालीन संयुक्‍त सचिव और सचिव पर लगाया था यौन शोषण का आरोप : सुप्रीम कोर्ट, पीएमओ और महिला आयोग में भी लगाई थी गुहार : न्‍याय न मिलने पर पीएमओ के सामने खुदकुशी का भी प्रयास किया : देश की सबसे महत्वपूर्ण खुफिया एजेंसी रॉ की पूर्व महिला अधिकारी, जिसने विभाग में अपनी प्रशासनिक कार्यकुशलता से सबको हैरान कर दिया था, आखिर भरी अदालत में अर्धनग्न होने के लिए क्यों मजबूर हुई।

: भरी अदालत में कपड़े उतारने पर क्‍यों मजबूर हुई रॉ की पूर्व अधिकारी निशा प्रिया भाटिया : निशा ने तत्‍कालीन संयुक्‍त सचिव और सचिव पर लगाया था यौन शोषण का आरोप : सुप्रीम कोर्ट, पीएमओ और महिला आयोग में भी लगाई थी गुहार : न्‍याय न मिलने पर पीएमओ के सामने खुदकुशी का भी प्रयास किया : देश की सबसे महत्वपूर्ण खुफिया एजेंसी रॉ की पूर्व महिला अधिकारी, जिसने विभाग में अपनी प्रशासनिक कार्यकुशलता से सबको हैरान कर दिया था, आखिर भरी अदालत में अर्धनग्न होने के लिए क्यों मजबूर हुई।

हालांकि हाईकोर्ट ने पहली नजर में इस पूर्व महिला अधिकारी की मानसिक स्थिति को ठीक न मानते हुए शाहदरा स्थित मानव व्यवहार व संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) भेजने का आदेश दे दिया, जहां उन्हें भर्ती कर लिया गया है। बेहद प्रतिभाशाली यह पूर्व महिला अधिकारी क्या वाकई में मानसिक झंझावातों के चलते अपना दिमागी संतुलन खो चुकी है, इसकी रिपोर्ट तो इहबास ही देगा। दरअसल, पूर्व महिला अधिकारी निशा प्रिया भाटिया ने हाईकोर्ट में पटियाला हाउस अदालत के तत्कालीन एसीएमएम अजय पांडेय व एक अन्य मजिस्ट्रेट के खिलाफ शिकायत कर रखी थी। साथ ही उनकी मांग थी कि उनके खिलाफ वर्ष 2008 में पीएमओ के समक्ष खुदकुशी के प्रयास का जो मामला अदालत में चल रहा है, उसका जल्द से जल्द निपटारा किया जाए। बाद में हाईकोर्ट में उन्होंने एसीएमएम अजय पांडे के खिलाफ अपनी शिकायत तो जारी रखी लेकिन मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट प्रीतम सिंह का नाम हटवा दिया। न्यायमूर्ति अजीत भरिहोक की पीठ के समक्ष दायर मामले में निशा प्रिया भाटिया ने आरोप लगाया है कि तत्कालीन एसीएमएम अजय पांडेय बजाय उनकी शिकायत सुनने के, उन्हें रविंद्रनाथ टैगोर व स्वामी विवेकानंद के किस्से सुनाते रहे, जिनका पूरा सार यह था कि समाज के कल्याण के लिए लड़ाई जारी रखो।

निशा ने हाईकोर्ट के प्रशासनिक विभाग में अजय पांडेय के खिलाफ यह शिकायत कर रखी थी कि वह 6 मई 2009 को उनकी अदालत में पेश हुई थी, लेकिन सुनवाई करने के बजाए उन्होंने यह कहा कि वह अगली तारीख डालने जा रहे हैं। इस पर निशा ने अनुरोध किया वह उनके मामले की सुनवाई करें और उनकी तत्कालीन रॉ सचिव अशोक चतुव्रेदी व संयुक्त सचिव सुनील उके के खिलाफ जो 232 पृष्ठों की सेक्सुअल हरॉसमेंट की शिकायत है, उसे भी रिकार्ड पर ले लें। लेकिन अदालत ने पहले तो ऐसा करने से मना कर दिया लेकिन बाद में वह दस्तावेज ले लिए और सरकारी वकील से भी कहा कि वह भी एक प्रति रख लें। इसके बाद इस मामले की सुनवाई के लिए 4 जुलाई 2009 की तारीख लगा दी गई। चार जुलाई को जब निशा अपने मामले की सुनवाई के लिए इंतजार कर रही थीं, तभी सरकारी वकील अंजू राठी राना ने उन्हें बताया कि 2 जुलाई को उनके पास एक महिला का फोन आया था, जिसने बताया कि वह रॉ से बोल रही है। यह फोन उनके मोबाइल पर आया था और प्राइवेट नंबर शो कर रहा था। सरकारी वकील ने बताया कि फोन करने वाली महिला ने अपना नाम तारा बताया और वह केस के बारे में पूछ रही थी। इस पर निशा ने अदालत से कहा कि वह अपना केस लड़ना चाहती है।

निशा का एसीएमएम के खिलाफ यह आरोप है कि उन्होंने बिना किसी चार्जशीट के महिला कांस्टेबल से पकड़वा कर उन्हें नारी निकेतन भेजने का आदेश कर दिया। हालांकि अदालत के रिकार्ड के अनुसार जब उस दिन सुनवाई शुरू हुई तो निशा ने शोर मचाना शुरू कर दिया और कहा कि ‘यह मामला आज खत्म नहीं होता तो वह अपना जीवन आज ही खत्म कर देगी और किसी बिल्डिंग से कूद जाएगी। उसने चिल्ला कर कहा कि आज के बाद हिंदुस्तान की रूह कांपेगी और मैं हर औरत को इंसाफ दिलाउंगी।’ निशा को आपे से बाहर होता देख अदालत ने निशा को समझाने की कोशिश की लेकिन तब भी बात नहीं बनी तो सुरक्षा के मद्देनजर उन्हें नारी निकेतन भेजने की बात कही। निशा की इसी शिकायत की बाबत बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट में सुनवाई होनी थी लेकिन तारीख आगे बढ़ाने के चलते निशा ने भरी अदालत में वह हरकत कर डाली, जिसे कोई सभ्य समाज मान्यता नहीं देता। निशा की मानसिक स्थिति क्या है, इसकी रिपोर्ट इहबास को अगली सुनवाई के दिन हाईकोर्ट में पेश करनी है।

सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ी रॉ की पूर्व महिला अधिकारी निशा प्रिया भाटिया क्या वास्तव में अपनी सोच-समझ खो चुकी थीं या अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर लगाए यौन उत्पीड़न की शिकायत पर कोई कार्रवाई न होने से इतना परेशान हो गई थीं कि व्यवस्था से उनका मोहभंग हो गया। जब उनके द्वारा की गई शिकायत पर आरोपितों के खिलाफ कुछ नहीं किया गया तो वह अपना आपा खो बैठीं और पीएमओ के समक्ष खुदकुशी का प्रयास तक कर बैठीं। इस मामले में उनके खिलाफ आत्महत्या की कोशिश करने का मामला दर्ज हो गया और जब वह अदालत पहुंची तो उन्हें लगा कि उसका विभाग वहां भी अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा है। निशा के अनुसार लाख गुहार करने पर भी उनकी शिकायत नहीं सुनी गई और अदालत ने उन्हें ही नारी निकेतन भेजने का आदेश दे दिया।

अदालत के इस रवैये से त्रस्त होने के बाद उन्होंने तत्कालीन एसीएमएम अजय पांडेय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णनन से भी न्याय की गुहार की। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को 28 नवम्बर 2009 को लिखी शिकायत में उन्होंने कहा कि वह रॉ में 1987 बैच की क्लास वन अफसर है। अक्टूबर 2007 में उसने विभाग के सचिव अशोक चतुव्रेदी के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी। शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। मेरा संघर्ष इसलिए था कि विभाग में महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिले। न्याय न मिलने पर मैं पीएमओ के समक्ष खुदकुशी का प्रयास तक कर बैठी। इस बाबत दर्ज धारा 309 के तहत जब मामला तत्कालीन एसीएमएम अजय पांडेय की अदालत में चल रहा था तो उनका व्यवहार गैर जिम्मेदाराना व अदालत के मानदंडों के अनुरूप नहीं रहा। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को लिखी शिकायत में 4 जुलाई 2009 की घटना बताते हुए निशा ने कहा कि बिना चार्जशीट व संबंधित दस्तावेज दिए हुए अदालत ने वहां मौजूद सरकारी वकील डाक्टर अंजू राना राठी को कहा कि मुझे नारी निकेतन भेजने का इंतजाम किया जाए।

निशा भाटिया ने आरोप लगाया कि एसीएमएम ने जानबूझ कर ऐसा आदेश लिखवाना शुरू कर दिया ताकि उसे नारी निकेतन भेज दिया जाए। निशा का आरोप है कि यह सब सजा उसे सिर्फ इसलिए दी जा रही है, क्योंकि उसने अशोक चतुव्रेदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। पत्र में निशा ने कहा है कि उसने तत्कालीन एसीएमएम के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है, जिसमें कहा गया है कि एसीएमएम ने प्रेरित होकर दुर्भावना के तहत उसे ह्यूमिलेट किया है। पत्र में एसीएमएम के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग करते हुए यह भी आरोप लगाया गया है कि एक भी सुनवाई कानून के दायरे में नहीं की गई है। पत्र में कहा गया कि मुझे नारी निकेतन सिर्फ इसलिए भेजा गया, क्योंकि मेरे विभाग से तत्कालीन सरकारी वकील के पास फोन आ गया था। पत्र में कहा गया है कि यह बात झकझोर देने वाली है कि एक न्यायिक अधिकारी बजाय न्याय करने के अदालत में बैठ कर एक यौन उत्पीड़न की शिकार बनी महिला को आध्यात्मिक गुरु की तरह उपदेश दे रहा है। इसके साथ ही शिकायत में एसीएमएम द्वारा दिए आदेशों की प्रति भी शामिल की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जवाब देते हुए कहा कि फिलहाल मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में लंबित है, इसलिए कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

रॉ की पूर्व महिला अधिकारी निशा प्रिया भाटिया ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत पर जांच कराने के लिए हर संभव कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, यूपीए चेयरमैन सोनिया गांधी, राष्ट्रीय महिला आयोग, तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबउल्लाह आदि सबसे फरियाद की थी लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। इस बीच रॉ से उन्हें न सिर्फ निलंबित कर दिया गया, बल्कि रिटायरमेंट लेने की सलाह भी दी गई। यह ब्यौरा निशा भाटिया ने हाईकोर्ट में दायर अपनी मूल याचिका (तत्कालीन एसीएमएम अजय पांडेय व अन्य के खिलाफ) में दिया है। निशा का आरोप है कि रॉ के एक सीनियर अधिकारी ने ही उनका यौन उत्पीड़न किया। यह अधिकारी उनके साथ सेंट स्टीफंस कॉलेज में था। अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच के लिए उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी लेकिन गोपनीयता के नाम पर उन्हें जांच रिपोर्ट नहीं दी गई।

हाईकोर्ट में एसीएमएम अजय पांडेय व अन्य के खिलाफ दायर याचिका में निशा भाटिया ने कहा है कि उनका विभाग में सेवा का बीस साल का बेहतरीन रिकार्ड है। उनकी दो बेटियां हैं, जिनकी उम्र 20 व 17 साल है। उन्होंने विभाग में सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन ऑफ वूमेन एम्लाइज के विषय पर 26 अक्टूबर 2007 को एक ज्ञापन दिया था। उनकी मांग थी कि सुप्रीम कोर्ट के विशाखा मामले में दिए निर्देश को विभाग में भी लागू किया जाए। इसके बाद उन्होंने 2007 में विभाग के सचिव अशोक चतुव्रेदी व अन्य के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी। 18 व 20 दिसम्बर 2007 को उन्हें विभाग से दो पत्र मिले, जिसमें उन्हें सबूतों के साथ पेश होने को कहा गया। इस पर उन्होंने इसलिए पेश होने से इनकार कर दिया था, क्योंकि जांच कमेटी मेंबर चतुव्रेदी से पद में जूनियर थे। निशा की हाईकोर्ट में दायर याचिका में दलील थी कि एक जूनियर अधिकारी अपने से सीनियर अधिकारी की जांच कैसे कर सकता है, जबकि इसमें किसी र्थड पार्टी (स्वयंसेवी संस्था) को भी शामिल नहीं किया गया। इसके बाद उन्हें पता चला कि उनके फोन की टैपिंग की जा रही है। इस पर उन्होंने अपनी शिकायत की बाबत प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की। 10 अप्रैल 2008 को सेक्रेटरी (पीजी एंड कूड) डा. रेणुका विनाथन ने उन्हें समन कर ऑफिस में बुलाया और कहा कि उनकी शिकायत पर जांच शुरू कर दी गई है। इस बीच 23 जुलाई 2008 को उनके ऑफिस में यह आरोप लगाते हुए रेड की गई कि स्थापित नियमों का पालन नहीं किया गया है। इसकी शिकायत राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती गिरिजा व्यास को की गई, जिस पर उन्होंने मदद करने का आश्वासन दिया।

याचिका में कहा गया कि 20 व 31 अगस्त 2008 के बीच उनसे आधिकारिक जिम्मेदारियां ले ली गई और उनके ऑफिस को सील कर दिया गया, जिसमें उनका निजी सामान भी था। जब उन्होंने ऑफिस में प्रवेश करना चाहा तो एसएबी कमांडरों ने उन्हें रोक दिया। बाद में उन्हें मार्च 2009 में जांच कमेटी की सदस्य इंदू अग्निहोत्री ने बताया कि उनकी शिकायत पर जांच 31 जनवरी 2009 को पूरी हो गई थी और उसके सीनियर अशोक चतुव्रेदी को दोषी नहीं पाया गया है। बाद में इस जांच रिपोर्ट की प्रति पाने के लिए राष्ट्रपति भवन स्थित पीजी एंड कूड विंग को पत्र व फोन से माध्यम से दरख्वास्त की गई, लेकिन जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो 2 अप्रैल 2009 को मुख्य सूचना अधिकारी के यहां जांच की प्रति देने का निर्देश देने की मांग निशा ने की। उनकी अर्जी को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया गया। इसके बाद परेशान होकर वह कैबिनेट सेक्रेटरी केएम चंद्रशेखर से भी मिली और उन्हें बताया कि यौन उत्पीड़न का विरोध करने पर उन्हें अशोक चतुव्रेदी के अनुमोदन पर नौकरी से डिसमिस कर दिया गया है। इस पर चंद्रशेखर ने आश्‍वासन दिया कि वे मामले को देखेंगे। इसी तरह के विभिन्न वायदों से तंग आकर आखिर में निशा ने पीएमओ के समक्ष खुदकुशी का प्रयास किया, जिसके चलते उनके खिलाफ थाने में मामला दर्ज कर लिया गया। फिलहाल यह मामला हाईकोर्ट में लंबित है और मामले की सुनवाई जारी है। रॉ की पूर्व महिला अधिकारी द्वारा लगाए गए विभिन्न लोगों के खिलाफ आरोप में कितनी सचाई है यह तो हाईकोर्ट के फैसले से ही पता चलेगा। (साभार : राष्‍ट्रीय सहारा)

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0 Comments

  1. madan kumar tiwary

    January 25, 2011 at 5:47 am

    उत्पीडन किसे कहते हैं , शायद न्यायालय और अधिकारियों को नही मालूम है । पुरे प्रकरण को पढने के बाद मेरा मानना है की अगर निशा प्रिया भाटिया को इस सारे केस मुकदमें के पहले से कोई मानसिक रोग था तो फ़िर वह विभाग में इतने दिनों तक कार्य कैसे करती रहीं । उन सभी प्रोजेकट जिसपर निशा ने कार्य किया है और उनमें कोई खामी नही पाई गई मतलब निशा न्याय की आस में दौडते -दौडते मानसिक संतुलन खो बैठी । सारे लोग , न्यायिक अधिकारी से लेकर मंत्री, प्रधान मंत्री , महिला आयोग , यानी जिनके -जिनके पास निशा फ़रियाद लेकर गई थी वे सभी निशा की इस अवस्था , जब उसे उच्च न्यायालय में कपडे खोलने और प्रधान मंत्री आवास के समक्ष आत्म हत्या का प्रयास करने के लिये मजबुर होना पडे , के लिये जिम्मेवार हैं। अरुंधती भी न्याय मिलने में देर के कaारण न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिये अवमानना की सजा भोग चुकी हैं , एक दिन के कारावास के रुप में । लेकिन अरुंधती ने उच्चततम न्यायालय को नंगा कर दिया था जब कुछ सौ रुपये का जुर्माना भरने की बजाय एक दिन की जेल की सजा काटने का विकल्प चुना । सडी -गली न्यायिक व्यवस्था है हमारी । अपने देश के न्यायालय और जजों को देखकर इसा को सलीब पर लटकाने का फ़ैसला सुनाने वाले याद आते हैं।

  2. नागरिक

    January 25, 2011 at 3:41 pm

    कितना दुखी होगी वह महिला.. कारण जो भी रहा हो..

  3. Gaurav Yadav

    January 25, 2011 at 8:20 pm

    न्यायालय की अवमानना को ढाल बनाकर ऐसे नियम बना दिए गए हैं जिससे हर आम-ओ-ख़ास न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ बोलने से डरता है। यहाँ तक कि मीडिया को भी कोर्ट रूम में प्रवेश करने और न्यायिक कार्यवाही के बारे में बोलने की मनाही है। जब तक कोई आयोग बनाकर न्यायिक अवमानना के इन नियमों में संशोधन नहीं किया जाएगा इस तरह आक्रोश जताने वाले पीड़ित सामने आते रहेंगे।

  4. Dr. mukesh Tiwari naiduniariporte anjad dist badawani

    January 30, 2011 at 12:35 pm

    sir cout se pidit female kaha aawaj lagayegi aap hi bataeye

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