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दुख-दर्द

छत्‍तीगढ़ के पत्रकार क्‍यों हैं बदमाशों के निशाने पर!

छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की दंश झेल रहा है. छत्तीसगढ़ में अब कलमकारों की हत्‍या का दाग भी लगने लगा है. इसका ताज़ा उदहारण बिलासपुर और रायपुर जिला का छुरा ब्लाक है. बीते वर्ष 19-20 दिसंबर के दरम्यानी बिलासपुर के पत्रकार सुशील पाठक की हत्या उस वक्त कर दी गयी, जब वे प्रेस के कार्य से फारिग होकर मध्य रात्रि को घर लौट रहे थे. इसकी गुत्थी सुलझाने में पुलिस अभी तक सफल नहीं हो पाई थी, ठीक उसके एक माह पश्चात रायपुर जिला के छुरा ब्लाक में पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या कर आरोपी फरार हो जाता है.

छत्तीसगढ़ नक्सलवाद की दंश झेल रहा है. छत्तीसगढ़ में अब कलमकारों की हत्‍या का दाग भी लगने लगा है. इसका ताज़ा उदहारण बिलासपुर और रायपुर जिला का छुरा ब्लाक है. बीते वर्ष 19-20 दिसंबर के दरम्यानी बिलासपुर के पत्रकार सुशील पाठक की हत्या उस वक्त कर दी गयी, जब वे प्रेस के कार्य से फारिग होकर मध्य रात्रि को घर लौट रहे थे. इसकी गुत्थी सुलझाने में पुलिस अभी तक सफल नहीं हो पाई थी, ठीक उसके एक माह पश्चात रायपुर जिला के छुरा ब्लाक में पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या कर आरोपी फरार हो जाता है.

छुरा के पत्रकार उमेश राजपूत निर्भीक, निडर, मिलनसार और हंसमुख स्वभाव के पत्रकार थे. वे क्षेत्र की जनहित से जुड़े मुद्दों को अपने पत्रकारिता के माध्यम से सरकार और जनता के बीच जोर-शोर से उठाया करते थे. अभी कुछ दिन पहले ही छुरा के नेत्र शिविर में ऑपरेशन के बाद एक मरीज की मौत होने की खबर को जोर-शोर से उठाया था, जिसकी वजह से नेत्र चिकित्सा सहायिका सरोज मिश्रा से उनका झगड़ा भी हुआ. बात हाथापाई तक पहुँच गई, सरोज मिश्रा ने उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी थी. जिसकी शिकायत मकतुल उमेश ने थाने में दर्ज भी कराया था. पुलिस ने शिकायत को हलके में लेते हुए उमेश की अर्जी पर कोई कार्रवाई नहीं किया. धमकी दिए जाने के चंद दिनों के बाद उमेश की हत्या हो जाना शक की सुई कहीं न कहीं सरोज की ओर चीख-चीख कर इशारा करती है. यह हत्या कहीं न कहीं उनकी संलिप्तता की ओर इशारा कर रहा है.

जिस वक्त उमेश के ऊपर फायर किया गया, उस वक्त उनके साथ उनके एक और पत्रकार साथी शिवकुमार वैष्णव उनके घर पर मौजूद थे. गोली चलने के दस मिनट बाद भी उनका किसी भी प्रकार से मदद के लिए गुहार न करना या किसी भी प्रकार से कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करना और पुलिस जांच में न पहुंचकर अपने परिवार सहित लापता हो जाना भी अनेक संदेहों को जन्म देता है.

मृतक की पत्नी के बताए अनुसार 14 जनवरी को नेत्र चिकित्सक सहायिका सरोज मिश्रा ने उनके पति को फोन पर बात कर उन्‍हें अपने दफ्तर बुलवाया. खबर छापे जाने के नाम पर उमेश के साथ झगडा कर उन्‍हें अपने सैंडल उतार कर मारने का प्रयास करते हुए जान से मारने की धमकी भी दी. मृतक के छोटे भाई के अनुसार यदि नक्सलियों को उनके भाई की हत्या करना होता तो वे कभी भी हत्या कर सकते थे. उनके बड़े भाई रोज देर रात को गाँव से घर आते थे.

मृतक के पड़ोसी ने बताया कि 22 जनवरी की शाम पौने सात बजे के आसपास जब वे घर में चाय पी रहे थे, तभी उसे जोर से धमाके की आवाज सुनाई दी. जैसे कोई पटाखा फूटा हो. जब धमाके की आवाज आयी तो वे समझे कि मोहल्ले में शादी हो रही है. तभी मृतक उमेश राजपूत की लड़की उनके पास पहुंची और उन्हें जानकारी दिया कि उनके पापा खून से लथपथ हैं, तब जाकर उन्होंने उसे हॉस्पिटल ले जाने की बात बताया.

छुरा अनुविभागीय पुलिस अधिकारी एआर बैरागी ने बताया कि हत्या की वजह अभी तक पता नहीं चल पाया है. उन्‍होंने पुलिस द्वारा पांच-छह बिन्दुओं पर विवेचना किये जाने और सभी बिन्दुओं पर गहराई से जांच किये जाने की जानकारी दिया. मकतुल के ऊपर गोली चलने वाले से उनका सीधे तौर पर दुश्मनी होने की बात पर असहमति जताते हुए उमेश राजपूत की हत्या को सुपारी किलिंग माना. उमेश की हत्या देशी पिस्तौल से होने की बात अधिकारी ने बताया. साथ ही अधिकारी ने सहायक नेत्र अधिकारी सरोज मिश्रा और उमेश के बीच विवाद होने की भी जानकारी दिया.

उमेश राजपूत की हत्या पर छुरा प्रेस क्लब के अध्यक्ष ने निंदा करते हुए कहा आज के समय में पत्रकार असुरक्षित हैं. पत्रकारों के साथ कुछ भी हो रहा है. शहर से लेकर गाँवों तक पत्रकारों की हत्या को उन्होंने दुःखद बताया. हत्या की वजह पता लगाने में पुलिस अभी तक असफल रही है, घटना 22 जनवरी शाम की है और हत्या के कारणों का पता न चल पाना पुलिस की कार्य कुशलता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है. गरियाबंद पुलिस अधीक्षक ने पत्रकारों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए छुरा थाना प्रभारी सीएल उइके को निलंबित कर पत्रकारों के आक्रोश को कम करने का प्रयास जरूर किया है. अब सवाल यह उठता है बिलासपुर में सुशील पाठक हत्याकांड में वहां के एसपी का तबादला किया गया, उसके बाद भी असल अपराधी पुलिस पकड़ से बाहर हैं. अब उमेश राजपूत की हत्या के बाद थानेदार के निलंबन से क्या असल अपराधी पुलिस की पकड़ में आ जायेंगे. इसका सीधा जवाब है नहीं. लगता है छत्‍तीसगढ़ में पुलिस का भय ख़त्म हो गया है. इसका सीधा फायदा अपराधी उठा रहे हैं और इस शांत फिजा में सुपारी किलिंग तेजी से फल-फूल रहा है.

लेखक गिरीश केशरवानी रायपुर में पत्रकार हैं.

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0 Comments

  1. madan kumar tiwary

    January 26, 2011 at 4:31 pm

    नक्सलवादी पत्रकारों की हत्या से परहेज करते हैं। शिव कुमार जब साथ थें तो उससे पुछताछ जरुरी है । सहायक नेत्र अधिकारी सरोज मिश्रा के खिलाफ़ उमेश ने रिपोर्ट लिखी थी , वह भी संदिग्ध हैं । पुलिस अगर चाहे तो आराम से हत्यारे का पता चल सकता है , दुर्भाग्य यह है कि पुलिस महकमा कभी भी संजिदगी के साथ जांच – पडताल नही करता ।

  2. Naresh Dongre, Nagpur.

    January 27, 2011 at 7:17 am

    शिव कुमार से kadaaise पुछताछ जरुरी है । सहायक नेत्र अधिकारी सरोज मिश्रा के खिलाफ़ उमेश ने रिपोर्ट लिखी थी , वह भी संदिग्ध हैं । पुलिस अगर चाहे तो हत्यारे का पता चल jald chal सकता है , दुर्भाग्य यह है कि पुलिस महकमा कभी भी संजिदगी के साथ जांच – पडताल नही करता । patrkaronki is prakarse hatyae hona gambhir bab hai.
    Naresh Dongre, Sr. Reporter, Sakaal Media Group, Nagpur.
    vv

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