
सय्यद मजहर हुसैन
मायावती की पुलिस ने बस्ती में निर्दोषों, असहायों पर न सिर्फ अत्याचार किया है बल्कि न्याय व मानवीयता के मूलभूत सिद्धांतों के परे जाकर सरेआम रिश्वतखोरी की कोशिश की है. बस्ती जिले में थानों पर तैनात अधिकारी बिना मोटी रकम लिये कोई काम नहीं करते. यहां गलत और सही, दोनों काम कराने के लिए पैसा देना पड़ता है. अगर सही काम कराने के लिए आपने पैसा नहीं दिया तो निर्दोष होते हुये भी आपको जेल की हवा खानी पड़ सकती है. यहां की पुलिस आम आदमी तो आम आदमी, अब पत्रकारों से भी पैसे के लिये मुंह खोल देती है. अभी 24 जनवरी की बात है. बस्ती कोतवाली में एक महिला थाना है.
16 जनवरी को दहेज उत्पीड़न का एक मामला दर्ज हुआ था. लेकिन फौरन बाद लड़की और लड़का पक्ष के लोगों ने पंचायती सुलह कर लिया. दोनों पक्ष सुलहनामा तथा एक अप्लीकेशन के साथ थाने गये. यहां महिला थानाध्यक्ष सुनीता त्रिपाठी ने सुलहनामा की बात सुनते ही आव देखा न ताव, लड़के के पिता को लाकअप में बंद कर दिया और लड़की और उसकी विधवा मां को थाने में बिठा लिया. फिर महिला थानेदार सुनीता ने मां-बेटी से कहा कि अगर तुम सुलह करोगी तो तुमको भी बन्द कर दूंगी. बेचारी दोनों, थाने में डर से बैठी रह गयीं. चूंकि वह दोनों पक्ष मेरे परीचित थे, समझौता भी हम लोगों ने ही आपस में बिठा कर कराया था, तो मैं थाने में जा पहुंचा.
महिला थानाध्यक्ष को अपना परिचय दिया और सुलह हो जाने पर क्यों बन्द कर दिया, सब सवाल पूछा. इस पर महिला थानेदार मुझे अलग ले गई और कहा कि मैं छोड़ दूंगी लेकिन आप थोड़ा टाइट रहें, और कुछ करा दें. सच बताऊं, महिला थानेदार की इस हिम्मत पर मुझे काफी आश्चर्य हुआ. मैंने उनसे कहा कि मेरे बारे में आप नहीं जानतीं, आप पता कर लें, मैं पैसे की बात नहीं करता, न पैसे लेता हूं, और न ही देता हूं. इतना सब सुनने के बाद भी वह महिला थानेदार उसे छोड़ने के लिये तैयार नहीं हुई. मैं जैसे ही कोतवाली प्रांगण में पहुंचा तो कोतवाल एसएन सिंह और पुरानी बस्ती थाने के थानेदार क्षत्रजीत सिंह बैठ कर धूप सेंक रहे थे.
कोतवाल ने देखते ही मुझे बुलाकर बैठा लिया. इसी बीच महिला थानेदार और लड़की और उसकी मां भी आ गयीं. मैंने मां-बेटी से कहा कि तुम लोग जाओ और एफीडेविट बनवा लो. तभी महिला थानेदार ने कोतवाल से कहा- ”ये मीडिया से हैं और पैरवी करने आये हैं. एक बार तो इस औरत ने मुकदमा दर्ज कराया और एक बार समझौता करने आ गई, अब कैसे समझौता करा दूं.” इतना सुनते ही पुरानी बस्ती थाना के थानेदार क्षत्रजीत सिंह बूढ़ी लाचार औरत से बोल पड़े- ”समझौते की फीस जानती हो?” चूंकि बूढ़ी औरत कम सुनती है तो उसकी बेटी ने कहा कि क्या? तो उन्होंने कहा कि समझौता कराने की फीस पचास हजार रूपया है, पैसा मंगवा लो और ले जाओ. इतना सुनते ही मैं हैरान रह गया कि कोतवाल और एसओ मुझे जानते हैं और मेरे सामने ही पैसे की बात कर रहे हैं. मैंने गुस्से में कहा कि पैसे की बात मैं नही करता, जो करना हो कर दें.
पैसा न पाकर एसओ महिला थाना सुनीता त्रिपाठी ने बेकसूर नूर मोहम्मद का चालान कर दिया. लेकिन लड़की पक्ष की एफीडेविट पर दूसरे दिन जमानत हो गयी. लेकिन पुलिस की यह कारस्तानी देख दुख होता है. सच कहूं, मेरे जीवन का यह पहला अवसर था 12 साल की पत्रकारिता में मुझसे किसी ने हिम्मत नहीं की कि पैसे की बात कर ले. क्योंकि मैं इस चक्कर में कभी नहीं रहता. इसीलिये हमेशा क्रायसिस में रहता हूं. लेकिन सुकून में हूं कि कभी किसी का गला नहीं काटा, हां मदद जरूर की है. उस दिन से लेकर आज तक मेरे दिमाग में वही बात तैर रही है, न दिल को सुकून मिल रहा है, न ही चैन. मैंने किसी अधिकारी से इस बात की शिकायत नहीं की, सिर्फ इस कारण की मैं उस भ्रष्ट अधिकारियों को सबक सिखाना चाहता हूं, लेकिन कैसे, यह समझ में नही आता. हां, अगर उस समय मेरे पास स्पाई कैमरा होता तो स्टिंग जरूर कर देता. इसका मुझे हमेशा अफसोस रहेगा. लेकिन पुलिस इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि इसमें सुधार लाना नामुमकिन है.
सय्यद मजहर हुसैन
पत्रकार
बस्ती












इमरान ज़हीर, मुरादाबाद
January 27, 2011 at 10:29 am
मजहर भाई, वाकई चौका देने वाली खबर है| सबसे अधिक आश्चर्य मुझे ये पढ़ कर हुआ की जानते हुए भी की आप एक पत्रकार हो उसके बाद भी आपसे ऐसी बात करने का साहस किया गया| पुलिस के इस साहस से एक बात और साफ़ होती है की कही न कही हमारे पत्रकार समाज में कोई ऐसा ऐसा पत्रकार है जो इनकी चापलूसी और इनसे पैसे खाता हो| ऐसा भी संभव है की शायेद इन पुलिस वालो ने भी आपको उन पत्रकारों की तरह समझ लिया हो और ऐसे शब्दों का प्रयोग कर बैठे| आपकी इमानदारी और अपने कर्तव्यों के प्रति वचनबद्ध होने पर आपको सलाम| [b][/b][b][/b]
Indian Citizen
January 27, 2011 at 2:07 pm
यह आलम तो न जाने कब से है…
pooja
January 27, 2011 at 11:52 pm
padhkar bahut dukh huwa.
awanish yadav
January 28, 2011 at 1:03 am
Majhar ji, Aub samay bahut badal gaya hai. Humaray kai saathi kewal yahi kar rahay hain. Isiliye aisa huwa.Aur rahi baat sting operation ki to voh kabhi dobaara kiya ja sakta hai.poori taiyari ke saath.Mera carrier jab Amar Ujala mein bamuskil 3 month ka tha tab hi sting kar diya tha.us samay thanay ke munsi ne paise mangay thay akhbar ki gaddi ke driver se main photo kheenchi letay huway aur bhir voh pair pakad kar gidgidata hai.mainay usko excuse kar diya.lekin aaj bhi yadi voh kahin mil jata hai to aukat mein baat karta hai.
Bhagat Singh
January 28, 2011 at 11:56 am
हमे इन राक्षसों से एक होकर लड़ने की जरूरत है | अपने शहर में पास का भारत स्वाभिमान ऑफिस तलाश करे औए काम में जुट जाएँ | ये एक एक करके नहीं ख़तम होंगे इनकी जड़ ढूदकर उसको काटना पड़ेगा | ज्यादा जानकारी के लिए http://www.bharatswabiman.org aur http://www.rajivdixit.com पर जाएँ | यह भारत को हर दिशा से सुधारने का सामाजिक आन्दोलन है | देश जागने को है आखिर कब तक वह अंगड़ाई लेता रहेगा |
Nirvikar
January 28, 2011 at 2:52 pm
It is not new, this activity of UP Police is going on for last 15yrs. Since Majhar husain is a reporter the police personnel normally avoid such activity before a honest reporter. Now in all police stations of UP this is going on unabated. The SHO and inspectors get done their transfers to a police station of good earnings by paying hefty sum to top bosses and beside it they have to pay a fixed amount every month to the top officer of that city, and in exchange of it they have been allowed to earn through all right and wrongs.
Vijeyta Bhargava
January 28, 2011 at 3:48 pm
Mazhar Bahi, UP police ki duplicate copy MP me DAMOH Police hai, yaha se 3 MLA Minister hai par Damoh MP ki Crime capital ban gai hai, Kisi bhi investigating agency se investigate karwa le yaha be gunah jail me hai ya court ke chakkar laga rahe hai or gunahgar mouj kar rahe hai
RAJESH SIDHANA
January 28, 2011 at 5:31 pm
यह कारस्तानी देख दुख होता है, आपकी इमानदारी और अपने कर्तव्यों के प्रति वचनबद्ध होने पर आपको सलाम| RAJESH SIDHANA, AMRITSAR 09878886787
Tim
January 29, 2011 at 10:51 am
Azadi ke 63 years baad bhi aaj khakhi vardi ( Police) ki vo ijjat nahi jo Hari vardi ( Force) ki hai or kala coat ( Advocates and judges) ki vo ijjat nahi jo safed appren ( Doctor ) ki hai. or inka swabhiman bhi marr chuka hai chhiiiiiiiiiiiiiiii
amresh
February 11, 2011 at 11:28 am
Bhashan dene ke liye sab taiyar rahte hain, karnewala koi naihin
jai prakash journalist
March 3, 2011 at 9:14 am
Are Abhi ek maamla aur saamne aaya hai mahila so ka wah fir ek se paise maang rahi thi lekin Police ke aala adhikari jaan kar anjaan bane huye hai