
तफहीम खान
अपने साथियों को अपनी विवशता बता पाने में भी शर्म आती थी। परंतु 16 वर्षों का साथ था, सो छोड़ने में तनिक झिझक भी हो रही थी। इसी उधेड़बुन में लगभग एक वर्ष का समय लग गया। आखिर निर्णय मैंने ले ही लिया। मुझे आज लगता है कि शायद यह फैसला मुझे कुछ और पहले कर लेना चाहिये था। मेरे कुछ साथियों को मेरे इस निर्णय से तकलीफ भी हुई है, मैं उन सबकी भावनाओं का सम्मान करता हूं।
निर्णय से पूर्व इस विषय पर मैंने कई बार अपनी पीड़ा अपने दोस्त पंकज दीक्षित से बांटी। उनसे दैनिक जागरण छोड़ने के बाद आगे के सफर के विषय में भी चर्चा हुई। उन्होंने मुझे अपने न्यूज पोर्टल जेएनआई से जुड़ने का आफर दिया। शायद इस तरह मुझे इस निर्णय पर पहुंचने में उन्होंने ने मेरी मदद की। दोस्तों हम लोग जेएनआई के माध्यम से मिलते रहेंगे। पत्रकारिता के इस सफर में हम आपके साथ थे और आगे भी साथ रहेंगे।
आपका
तफहीम खान












anoop
February 2, 2011 at 8:12 am
Bilkuk shi kiya apnai. jagran frrukabad mai sirf aik aadmi ka rakail ho gya hai. yha jagran mai jo pandey chaingai, vhi chpega. bhlai pandey ji jhoot hi chpyai jai.
abhishek
February 2, 2011 at 3:01 pm
Ye galat baat hai bhaisaahab aap ektarfa samachar dete hai ye pankaj dixit bahut bada laphandar hai ye samajhiye dalali karta hai patrakarita ke naam par aur aap iss pahloo ko chipa rahe hai
shashi mohan
February 23, 2011 at 10:44 am
bilkul sahi kiya aapne….jagran lko me hote to 2 saal pahle hi nikal lete