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प्रभात खबर में यूपी की अफसरशाही पर एक जोरदार कार्टून

यूपी के पुलिस और प्रशासनिक अफसर पूरे देश में जोकर की तरह चित्रित हो रहे हैं. लगता है रीढ़ वाले और दमखम वाले अफसरों का दौर कम से कम यूपी में तो पूरी तरह खत्म हो गया है. अगर ईमानदार और स्वाभिमानी अफसर यूपी में होते तो जरूर सारे खतरे मोल लेकर आवाज बुलंद कर रहे होते, पब्लिक सर्वेंट्स को नेताओं के जूते तले रखे जाने की ऐतिहासिक नकारात्मक परिघटना को अकाट्य तर्कों, प्रमाणों, दस्तावेजों के जरिए चुनौती दे रहे होते.

यूपी के पुलिस और प्रशासनिक अफसर पूरे देश में जोकर की तरह चित्रित हो रहे हैं. लगता है रीढ़ वाले और दमखम वाले अफसरों का दौर कम से कम यूपी में तो पूरी तरह खत्म हो गया है. अगर ईमानदार और स्वाभिमानी अफसर यूपी में होते तो जरूर सारे खतरे मोल लेकर आवाज बुलंद कर रहे होते, पब्लिक सर्वेंट्स को नेताओं के जूते तले रखे जाने की ऐतिहासिक नकारात्मक परिघटना को अकाट्य तर्कों, प्रमाणों, दस्तावेजों के जरिए चुनौती दे रहे होते.

और यह सब करते हुए वे दरअसल लोकतंत्र व मनुष्यता को बचाए रखने के वैश्विक महायज्ञ में अपनी ओर से थोड़ी-बहुत आहुति दे रहे होते. लेकिन इन अफसरों की सोच इतनी सीमित है कि ये सिर्फ अपने बारे में, अपनी कुर्सी के बारे में, शासन-सत्ता में बने रहने से मिल रहे लाभों के बारे में और अपने परिजनों के बारे में सोचने से आगे नहीं सोच पाते. इतने निहित स्वार्थी और आत्मकेंद्रित अफसरों की फौज यूपी में कभी नहीं रही.

जो अफसरशाही की कमाई वाली मलाईदार मुख्यधारा में हैं, वे चारण बन चुके हैं और जो अलग-थलग हैं उनकी जुबान पर अज्ञात भयों से ताला लगा हुआ है. पता नहीं इन्हें किनसे डर लगता है, पर एक बार जब ये रोज-रोज भयग्रस्त होकर मरना बंद कर देंगे और तय कर लेंगे कि मरना एक ही दिन है तो जरूर उनकी बोली-बानी फूटेगी और सच के आइने से कुछ कलुषित लोगों के अहंकार को नष्ट कर उनकी असली औकात बताने का काम करेंगे. फिलहाल तो इस कार्टून को देखकर यूपी की बेहाल अफसरशाही के हालचाल को जानें.

मीडियावालों ने तो सब छाप ही दिया. ठीक है, अब मैं कहीं भी जाऊंगी तुम पीछे-पीछे एक बोरा मेरे जूते-चप्पल भी लेते चलना और सफाई करते रहना.


 

यहां यह भी कहना गलत न होगा कि ऐसा कार्टून छापने की हिम्मत प्रभात खबर जैसा अखबार ही रख सकता है. शायद इसका एक कारण ये भी हो कि ये अखबार यूपी से नहीं निकलता, सो उसे इस कार्टून को प्रकाशित करने में आसानी है लेकिन दूसरा पक्ष ये है कि प्रभात खबर में हरिवंश जैसे संपादक हैं जिनसे खुद नेता-मंत्री-अफसर डरते हैं, वे किसी से नहीं डरते क्योंकि वे पत्रकारिता के उन शीर्षतम लोगों में हैं जिन्होंने जीवन भर ईमानदारी और आदर्श के दामन को थामे रखा. इसी कारण हरिवंश को तहलका मैग्जीन ने झारखंड के अब तक के टाप टेन महानायकों में से एक माना है. क्या लखनऊ से प्रकाशित किसी अखबार में ये हिम्मत है कि वो मायावती व यूपी के अफसरों से जुड़े इस कार्टून को प्रकाशित कर सके? इसका जवाब खुद यूपी के पत्रकार और अफसर दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा. आमीन.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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0 Comments

  1. rajmani singh

    February 10, 2011 at 7:41 pm

    Yes Yes Yes Yes 100000000 Time. Prabhat Khabar Is a “AKHABAR NAHI AANDOLAN”

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