: असंपादित मैटर छपने से इतना गुस्साए कि सबकी ऐसी-तैसी कर डाली : एक बड़े अखबार के दिल्ली आफिस में कल बड़ा बवाल हो गया. बुजुर्ग संपादक ने हर एक को दौड़ा रखा था. हुआ यह कि बुजुर्ग संपादक के एक करीबी मित्र का कालम अखबार में अक्सर छपता रहता है और करीबी मित्र जोश में अक्सर लंबी-लंबी फेंक देते हैं अपने कालम में. बुजुर्ग संपादक अपने करीबी मित्र की मित्रता का खयाल कर उनके लिखे को कायदे से संपादित कर देते हैं ताकि कोई उंगली न उठा सके.
पर कल जो कुछ छपा अखबार में, वो संपादित कालम नहीं, बल्कि असंपादित था. यह भूलवश हुआ या जानबूझकर किया गया, यह तो नहीं पता लेकिन जो छप गया सो छप गया. अखबार कोई वेबसाइट तो है नहीं कि एक बार छपने के बाद दुबारा उसे मोडीफाइ कर दो या जरूरत पड़ने पर अनपब्लिश या रिमूव कर दो, सो छप चुका मैटर दूर तक पहुंचा और होने लगा हंगामा. इस कालम में कालमनिस्ट ”भाई” ने शिवसेना की ऐसी तैसी कर रखी थी. असंपादित मैटर छप जाने के बाद कुछ फोन संपादक के पास आए तो उनका माथा ठनका. उन्होंने पढ़ा तो उनके हाथ के तोते उड़ गए. वो छपा नहीं था जो उन्होंने छापने के लिए दिया था. छप गया था वो जो ओरीजनल लिखकर आया था. संपादक का पारा बहुत तेजी से टॉप पर पहुंच गया और लगे गुर्राने-गरजने. उन्होंने परशुराम के अंदाज में अपने आफिस वालों को एक-एक कर गरियाने लगे. दे तेरी की ले तेरी की माहौल में हर शख्स सन्न. मिश्रा जी बेचारे ज्यादा गाली खा गए. नौकरी और उम्र, दोनों को ध्यान में रखकर वरिष्ठ मिश्रा जी अपने बुजुर्ग संपादक की गालियां खाकर भी चुप रह जाते हैं.
तो कल इस अखबार के दफ्तर में भयाक्रांत टाइप माहौल था. बुजुर्ग संपादक हर किसी की क्लास ले रहे थे. खुद को बेवकूफ चिरकुट घोषित कर रहे थे क्योंकि उन्होंने ऐलानिया कहा कि वे यहां बेवकूफों के बीच फंस गए हैं इसलिए वे भी चिरकुट हो गए हैं. मंच से बड़ी बड़ी बातें करने वाले इस बुजुर्ग संपादक का असल रूप कोई आफिस में देख ले तो वहीं आत्महत्या कर ले या पत्रकारिता से तौबा कर ले. मानवीय गरिमा के कखग को ये संपादक लोग घर पर छोड़कर आते हैं क्योंकि इन्हें लगता है कि जो आफिस है, वो जन्मना उनके नाम का है और आगे भी रहेगा. इसी कारण वे यहां काम करने वालों को दिल-दिमाग रखने वाले इंसान कम, भेड़-बकरी-मुर्गा टाइप जीव ज्यादा मानते हैं जिनके साथ चाहे जो कर लो, कह दो, वे कतई रिएक्ट नहीं करेंगे. दरअसल यह रूप किसी एक बड़े संपादक का नहीं है. ज्यादातर बड़े संपादकों का है. और, ये हिप्पोक्रेट किस्म के संपादक अपने आचरण और अपने लेखन में बेहद डिफरेंट किस्म के होते हैं. वे जीवन कोई और जीते हैं और मंचों पर, पोर्टलों पर, अखबारों में अपने श्रीमुख से बड़ी बड़ी कुछ और तरह की बातें पेलते-ठेलते रहते हैं. धन्य हैं हमारे बुजुर्ग होते जा रहे संपादक लोग.
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राजेश पांडे
February 16, 2011 at 2:28 am
ये वाकया माननीय श्रवण गर्ग जी से जुड़ा हुआ लगता है। हरिमोहन मिश्रा जी तो बेचारे इंडिया टुडे की नौकरी छोड़कर फंस गए हैं। माननीय श्रवण गर्ग जी एक नंबर के चूतिए टाइप आदमी हैं। अपने को फन्ने खां समझते हैं। भास्कर में एक शरद द्विवेदी हुआ करते थे। मालिकों से आंख में आंख मिलाकर बात करते थे। लिहाजा श्रवण जी की चूतियई को उनके सामने ही धो डालते थे। अब शरद जी रहे नही…श्रवण जी को खुला आकाश मिला है। लेकिन वे भूल गए हैं कि अब ऑस्ट्रेलिया दौरे के बाद माननीय सुधीर जी उनकी भी विदाई करने वाले हैं। तब वे सिर्फ चिरकुट ही रह जाएंगे. बेवकूफ बेचारे तब शायद उन्हें नमस्कार भी न करें।