देश का दुर्भाग्य देखिए कि सवा अरब जनता का सर्वोच्च प्रतिनिधि, दुनिया के सबसे बडे़ लोकतांत्रिक देश का मुखिया, देश की सबसे पुरानी और सबसे बडी राजनीतिक पार्टी से बना प्रधानमंत्री मजबूर है? जी हां। यह सच है और इससे भी दुखद यह कि यह बात खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वीकार की है। 15 फरवरी को जब यह पता चला कि प्रधानमंत्री मीडिया से मुखातिब होंगे तो महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे बडे़ मामलों से जूझ रही जनता को लगा कि शायद वे कुछ ऐसा बोलें जिससे राहत मिले, लेकिन बंधी मुट्ठी लाख की….यहां भी ऐसा ही हुआ।
प्रधानमंत्री जी पूरे समय बस यह कहते रहे कि वे ईमानदार हैं लेकिन मजबूर हैं। वे यह भी कह गए कि वे उतने बेईमान नहीं जितना उन्हें प्रचारित किया जा रहा है। बेईमान हैं, यह उन्होंने भी मान लिया। अब उस काले चेहरे को छिपाने के लिए गठबंधन का मुलम्मा बेमानी है। मुझे नहीं पता कि जो लोग आपसे प्रश्न पूछने के लिए वहां बैठे थे उनके मन में यह सवाल उठा या ऐसे सवालों को दबा दिया गया लेकिन मेरे कुछ सवाल जरूर हैं-
– प्रधानमंत्री ने आज जिन अहम मसलों पर बात की उनमें सबसे ऊपर रहा भ्रष्टाचार। पौने दो लाख करोड रुपए के 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में उनका यह कहना, ‘हमने ए. राजा को पत्र लिखा था। लेकिन ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की नीति पर मुझसे उनकी बात नहीं हुई।‘ क्या सही माना जाए? 2004 से राजा ने लूट मचा रखी थी और आठ साल आप धृतराष्ट्र बने बैठे रहे। क्या देश के प्रधानमंत्री को यह नहीं पता होना चाहिए कि उसकी सरकार क्या कर रही है। एक सामान्य आदमी (डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और सीताराम येचुरी) 2005 से कह रहे हैं कि 2जी मामले में गड़बड़ चल रही है लेकिन आप कहते हैं कि आपको पता नहीं था। अगर विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट का दबाव न होता तो क्या 2जी मामले में कार्रवाई होती? पीएम साहब क्या आप जनता की गाढ़ी कमाई के पौने दो करोड़ के गबन दोषी नहीं हैं?
– आप कहते हैं कि राजा को मंत्री डीएमके के कारण गठबंधन की मजबूरी में बनाया गया। आपकी यह सफाई व्यावहारिक रूप से सही हो सकती है लेकिन सैद्धांतिक और संविधानिक प्रावधान तो यही कहते हैं कि मंत्री प्रधानमंत्री की सूझबूझ और पसंद नापसंद से बनते हैं। (वैसे जिस मीडिया से आप मुखातिब थे उसी का कहना है कि आपकी कैबिनेट में कौन शामिल होगा इसे राडिया जैसे लोग भी तय करते हैं।) प्रधानमंत्री जी पद और गोपनीयता की शपथ लेते समय आपने संविधान और देश के प्रति उत्तरादियत्व निभाने का वायदा किया था, गठबंधन के प्रति नहीं।
– गठबंधन की मजबूरी का हवाला देकर आप ही साबित कर रहे हैं कि आपके लिए देश और संविधान से बडी आपकी सरकार हो गई थी। क्या भी आपको लगता है कि आपने अपनी शपथ पूरी की है? क्या यह दोष नहीं है? 2जी मामले में आपने गठबंधन की मजबूरी बताई लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में हुए भ्रष्टाचार और दुनिया पिटी भद़द के लिए कौन जिम्मेदार कौन है? क्या राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी का मामला सीधा आपसे जुडा नहीं है? लगभग आधा दर्जन बार तैयारियों के लिए बजट बढाया गया वह भी आपकी मंजूरी से।
– पीएम साहब का वर्षा जब कृषि सुखाने…जब लाखों-करोडों की लूट हो ही गई तो अब दिखावे की कार्रवाई से क्या फायदा? आपने आज फिर कहा कि महंगाई मार्च तक काबू में होगी। 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान भी आपने वादा किया था कि सरकार बनने के 100 दिन के अंदर महंगाई काबू में होगी, नतीजा सिफर। उसके बाद आप कम से कम एक दर्जन बार यही बयान दे चुके हैं लेकिन महंगाई में आपके बोल आग में घी जैसे हैं।
– पीएम साहब आपको 10 फीसदी की ग्रोथ रेट चाहिए और जनता को दो जून की रोटी, आपको आंकड़ों की बाजीगरी करनी है और जनता को परिवार पालना है। कभी निकलिए बाजार में और देखिए दाल, तेल, चावल, नमक, प्याज, लहसुन, सब्जी और पेट्रोल जैसी रोजमर्रा की चीजों के भाव क्या हैं? कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ तो नहीं पर गरीब के गाल पर जरूर पड़ रहा है। आपके मंत्री आए दिन महंगाई बढ़ाने वाले बयान देते हैं। उनपर आपकी लगाम नहीं। आखिर कब तक सहेंगे महंगाई की मार।
– आज प्रधानमंत्री ने एक और गंभीर बात कही कि –भाजपा अपने एक मंत्री पर हुई कार्रवाई का बदला निकाल रही है और जेपीसी पर हंगामा खड़ा कर रही है। उनका कहना था कि भाजपा सौदेबाजी कर रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी भाजपाई ने प्रधानमंत्री या कांग्रेस से सौदेबाजी की हिम्मत की तो उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्यों नहीं प्रधानमंत्री उसका नाम बताने की हिम्मत दिखाई? आखिर यहां कौन सा गठबंधन धर्म था पीएम साहब?
– आप सारी गड़बडि़यों, घोटालों का ठीकरा गठबंधन के माथे फोड़कर फारिग हो लिए लेकिन यह मत भूलिए की राजनीति के अंतिम लक्ष्य (सत्ता) तक पहुंचने के लिए आपको जनतंत्र के अंतिम सत्य (जनता) की चौखट पर ही जाना है। और जनता सब समझती है। बिहार के चुनाव बीतने बाद गंगा में ज्यादा पानी नहीं बहा है। अभी बंगाल, असम, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश आना बाकी है। भारत की सवा अरब जनता को मजबूर नहीं मजबूत प्रधानमंत्री चाहिए। ऐसी भी क्या मजबूरी?
लेखक प्रदीप कुमार पाण्डेय पत्रिका इंदौर से जुड़े हुए हैं.












brajmohan sharad
February 17, 2011 at 7:11 am
:'( “” kuchh to mazbooriya rahi hongi , yuhi koi bewafa nahi hota ” vaala sher yaad aa raha hai ..mere bhaarat mahaan ka mukhiya mazboor hai sunkar sharm aa rahi hai …brastachaariyo ,adharmiyo ke saath bane rahna mazboori hai …kaahe ki mazboori ? steefa deejiye …..
Milind V. Paturde
February 17, 2011 at 10:13 am
Helpless Prime Minister, please quit P.M. post and save Indian poors people, present goverment is not able to conduct the country properly.
Thanking you in anticipation
One of Indian citizen
govind goyal,sriganganagar
February 17, 2011 at 10:20 am
— चुटकी—
मजबूर नहीं
मजबूत
प्रधानमंत्री लाओ,
अरे! कोई तो
ये बात
सोनिया को
समझाओ।