
रामसरूप अणखी
उनकी विलक्षण प्रतिभा का आंकलन करते हुए वक्ताओं ने लब्बोलुआब निकाला कि वाकई अणखी हिंदी साहित्य के लिए पंजाबी के दूत समान थे। यहां उल्लेखनीय है कि अणखी उन चुनिंदा पंजाबी लेखकों में शुमार हैं, जिनकी कई रचनाएं पाठकों के बीच इतनी लोकप्रिय हुई कि उनके हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित करने पड़े। इस साहित्यिक समारोह की अध्यक्षता संयुक्त रुप से नामवर लेखक-इतिहासविद मनमोहन बावा, पंजाबी ट्रिब्यून के मुख्य संपादक वरिंदर वालिया, यूनिस्टार पब्लिकेशन्स चंडीगढ़ के हरीश जैन, प्रसिद्ध नाटककार-लेखक प्रो. अजमेर औलख और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रो. अजय बसारिया ने की। इस दौरान अणखी की तीन चर्चित पुस्तकों का भी विमोचन किया गया। इनमें बलदेव बधान द्वारा संपादित और एनबीटी इंडिया द्वारा प्रकाशित 59 कहानी के संग्रह ‘चमसरुप अणखी दियां चौंणविया कहानियां’ के अलावा यूनिस्टार पब्लिकेशंस चंडीगढ़ द्वारा प्रकाशित उनका अंतिम व अधूरा उपन्यास ‘ पंड दी मिट्टी’ और कुलदीप मान द्वारा संपादित उनके दोस्त व सह-लेखक को समर्पित अपनी ‘मट्टी दा रूख’ शामिल रहीं। यह रचनात्मक कार्य कर वास्तव में अणखी के सह-लेखकों, प्रशंसकों और परिजनों ने उनकी साहित्यिक विरासत को सहजने का व्यवहारिक-संकल्प लिया।
इस दौरान श्री बावा ने अपने संबोधन में जज्बाती होकर यादों के पन्ने पलटते हुए कहा कि अणखी जैसा साहित्यकार कोई बिरला ही होगा, उस शख्स ने हमेशा जमीन से जुड़े़ और नवोदित लेखकों को प्रोत्साहित किया। बावा की यह टिप्पणी वास्तव में सामायिक लगी, जब इस दौर में हर कथित वरिष्ठ लेखक अपने समकक्ष किसी को नहीं देखना चाहता है। उन्होंने खुलासा किया कि शायद अणखी ही मालवा से ताल्लुक रखने वाले पहले साहित्यकार होंगे, जो खुद तो संघर्ष के दौर में गुमनाम रहे, लेकिन नामवर हुए तो उन्होंने अपने इलाके के जमीनी-दर्द को कलम के जरिए साहित्यिक-पटल पर बाखूबी उकेरा। श्री वालिया तो इतने भावुक हुए कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि कुल मिलाकर साहित्यिक-भाषा में अणखी और मालवा दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं। दरअसल मालवा के छोटे किसानों ने जो दिक्कतें उठाई, उनको अणखी ने ही बेहतर तरीके से समझा और कलम की जुबान से बाकायदा उनको एक उपन्यास की शक्ल दी। प्रो. औलख ने अपने तजुर्बे को बुनियाद बनाकर दोटूक कहा कि समाज को दिमाग में रखकर कलम चलाने वाले अणखी जैसे लेखक चुनिंदा ही हुए हैं। उन्होंने समाज के लिए साहित्य रचा, इसीलिए आज समाज में उनकी पहचान है।

डा. तेजवंत मान ने मालवा की विरासत को अपने जज्बातों में समेटते हुए बिना लाग-लपेट कहा कि अणखी अपनी रचनाओं में मलवाई भाषा को पूरी अहमियत देते थे और मलवाई भाषा हकीकत में पंजाबी साहित्य में अपना सम्मानजनक स्थान रखती है। यह अलग बात है कि मालवा की साहित्यिक विरासत की अहमियत को आम लोगों तक पहुंचाने का काम करने वाले अणखी सरीखे और लोग सामने नहीं आए। सीधी बात, इस साहित्यिक समारोह से चूंकि कोई राजनीतिक लाभ सीधे नहीं होने वाला था, लिहाजा यहां पर कोई सरकारी घोषणा और झूठे वादे नहीं किए गए। बहरहाल अणखी की साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए संकल्प लेने वाले प्रो. कुलवंत सिंह, सुखमिंदर भट्ठल, हरीश जैन, प्रो. नव संगीत, डा. तारा सिंह, डा. सुरजीत सिंह, डा. बलकार सिंह, डा. जगीर जगतार, हरभजन बाजवा सहित तमाम साहित्यप्रेमी इस मौके पर मौजूद थे। इस समागम में अपने जज्बात तो बहुत लोग जाहिर करना चाहते थे, लेकिन कहीं तो समापन करना ही था। लिहाजा सबका आभार जताते हुए स्व. अणखी के बेटे डा. क्रांति पाल ने रस्मी तौर पर अगले साल फिर इसी तरह गर्मजोशी के साथ मिलने का वादा किया।
इस समागम की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि यहां पर कोई राजनीतिक घोषणा नहीं की गई, जो अर्से तक पूरी ना हो सके। अणखी के बेटे डा. क्रांति पाल ने सीधे तौर पर कहा कि पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पंजाबी एमए में अव्वल आने वाले छात्र को रामसरूप अणखी अवार्ड दिया जाएगा। बेशक यह अवार्ड महज उस विजेता को 11 हजार रुपये का आर्थिक रुप से फायदा पहुंचाएगा, लेकिन साहित्यिक जगत में यह मालवा, पंजाब और देश के लिए एक गौरवपूर्ण सम्मान होगा। यहां उल्लेखनीय है कि स्व. अणखी ने पंजाब में बदहाली का शिकार छोटे किसानों-नशे की जकड़ में आती युवा पीढ़ी और आत्महत्या करते किसानों-नौजवानों को लेकर बड़ी शिद्दत से अपनी कलम चलाई। जिसका नतीजा यह है कि उनकी बरसी पर आज नामवर लोगों ने अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए। मंच का संचालन कर रहे साहित्य-प्रेमी अमरदीप गिल ने भावुक होकर स्व. अणखी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए अंत में बस यही कहा कि अगर सौभाग्य से अगली बार इस अवसर पर मुझे मंच संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई तो यही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।












Mubarak Ankhi
February 17, 2011 at 11:57 am
Bhut badhiya likha hai.. Ankhi ji ke liye yeh ek sacchi shardhanjli hai…