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अब राजस्‍थान को तोड़ने की साजिश!

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि राजस्थानी बोली मधुर अर्थात बेहद मीठी है, जिससे सुनना हर किसी को सुखद अनुभव देता है, लेकिन इस मीठी बोली में कही जाने वाली बात को पूरी तरह से समझे बिना इसके बोले और सुने जाने का कोई मतलब नहीं है. राज्य के आधे से अधिक उन जिलों में भी राजस्थानी बोली को सम्पूर्ण आदर और सम्मान तो प्रदान किया जाता है, जहॉं पर इसे समझा और बोला भी नहीं जा सकता है, लेकिन राजस्थानी को जबरन थोपे जाने के प्रति भयंकर आक्रोश भी व्याप्त है.

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि राजस्थानी बोली मधुर अर्थात बेहद मीठी है, जिससे सुनना हर किसी को सुखद अनुभव देता है, लेकिन इस मीठी बोली में कही जाने वाली बात को पूरी तरह से समझे बिना इसके बोले और सुने जाने का कोई मतलब नहीं है. राज्य के आधे से अधिक उन जिलों में भी राजस्थानी बोली को सम्पूर्ण आदर और सम्मान तो प्रदान किया जाता है, जहॉं पर इसे समझा और बोला भी नहीं जा सकता है, लेकिन राजस्थानी को जबरन थोपे जाने के प्रति भयंकर आक्रोश भी व्याप्त है.

विद्यार्थी वर्ग पर राजस्थानी बोली को, राजस्थानी भाषा के नाम पर जबरन थोपे जाने को उत्तरी, पूर्व एवं दक्षिणी राजस्थान के लोग कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते. इसके उपरान्त भी देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में भाषा के नाम पर वर्षों से कुटिल राजनीति चलाई जा रही है, जिसे राज्य की भाषाई संस्कृति से पूरी तरह से नावाकिफ पूर्व मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में जमकर हवा दी थी. अब इसी राजस्थानी बोली की आग में समय-सयम पर कुछेक छुटभैये साहित्यकार एवं राजनेता घी डालते रहते हैं और राजस्थानी के नाम पर राज्य के दो टुकड़े करने पर आमादा हैं.

जबकि इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण और समझने वाली बात ये है कि जिस देश और राज्य में राष्ट्रीय स्तर पर बोली जाने वाली हिन्दी भाषा तक को दरकिनार करके अफसरशाही द्वारा हर क्षेत्र में लगातार अंग्रेजी को बढावा दिया जा रहा है, वहॉं पर कुछ लोगों द्वारा टुकड़ों-टुकड़ों में, भिन्न-भिन्न प्रकार से बोली जाने वाली कथित राजस्थानी बोली को, राजस्थानी भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के नाम पर तुलनात्मक रूप से शान्त राजस्थान के आम लोगों को राजनेताओं और कुछ कथित साहित्यकारों द्वारा सोद्देश्य भड़काने का काम किया जा रहा है. जिसके परिणाम निश्‍चित तौर पर दु:खद होने वाले हैं.

21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस पर राज्य के कुछ मुठ्ठीभर लोगों द्वारा राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के नाम पर जगह-जगह धरने देने का खूब नाटक किया गया. इस दौरान स्वनामधन्य कथित महान साहित्यकारों, रचनाकारों के साथ-साथ जोशीले युवाओं को भी मीडिया के माध्यम से सामने लाया गया. धरने में कथित रूप से मानव श्रृंखला बनाकर राजस्थानी को लुप्त होने से बचाने का संदेश भी दिया. राज्य के बड़े समाचार-पत्रों पर काबिज पश्‍चिमी राजस्थान के पत्रकारों ने इस खबर को बढ़ा-चढ़ाकर प्रकाशित भी किया और यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया मानो राजस्थानी बोली को राजस्थानी भाषा के रूप में मान्यता नहीं दी गयी तो जैसे राजस्थान का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा.

यहॉं पर सबसे महत्वपूर्ण और समझने वाली बात ये है कि सभी दलों के राजनेता तो ये चाहते हैं कि राजस्थान के दो टुकड़े होने पर दो मुख्यमन्त्री, दो-राज्यपाल और अनेक मन्त्रियों के पदों में वृद्धि होगी. अफसरशाही भी चाहती है कि राज्य के टुकड़े होने से ढेरों सचिवों के पदों में वृद्धि होगी. मीडिया भी चाहता है कि दो राज्य बनने से दोहरे विज्ञापन मिलेंगे और दोहरी राजनीति एवं दोहरे भ्रष्टाचार की गंगा बहेगी जिसमें जमकर नहाने का अवसर मिलेगा.

इसलिये इनकी ओर से बिना सोचे-समझे राजस्थानी बोली को राजस्थानी भाषा के रूप में राज्य पर थोपे जाने की वकालत की जा रही है. यदि इस मूर्खतापूर्ण प्रयास के विरुद्ध उत्तरी, पूर्वी एवं दक्षिणी राजस्थान के लोगों में विरोधस्वरूप आन्दोलन खड़ा हो गया तो राज्य के सौहार्दपूर्ण माहौल में आग लगना तय है.

राज्य के राजनेता तो यही चाहते हैं कि राज्य के लोग एक-दूसरे के विरुद्ध सड़कों पर उतरें, हिंसा भड़के और आपस में घमासान हो, ताकि उन्हें राज्य में राजस्थानी को मान्यता प्रदान करने का राजनैतिक अवसर मिल सके या राजस्थानी को अस्वीकार किये जाने पर पूर्वी एवं पश्‍चिमी राजस्थान के नाम पर राज्य के दो टुकड़े करने का अवसर मिल सके. इन हालातों में राज्य के धीर, गम्भीर, संवेदनशील और समझदार लोगों को राजनेताओं, अफसरशाही एवं कुछेक कथित सहित्यकारों की इस गहरी साजिश को नाकाम करना होगा अन्यथा परिणाम भयावह होंगे और कम से कम राज्य के दो टुकड़े होना तय है! क्या हम राजस्थान के टुकड़े करने को तैयार हैं?

लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ होम्योपैथ चिकित्सक तथा मानव व्यवहारशास्त्री,मीणा विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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0 Comments

  1. Lila Dhar Sharma

    February 23, 2011 at 10:29 am

    मै डाक्‍टर साहब की बात से पुरी तरह से सहमत हुं । राजस्‍थान के कुछ छुट भैया नेता और कुछ साहित्‍यकार इस बात की पैरोकारी कर रहे है कि राजस्‍थानी भाषा को मान्‍यता दी जाए,कुछ लोग उस भाषा को मान्‍यता देने की बात कर रहे है जो राजस्‍थान के कुछ हिस्‍सों में ही बोली जा रही है। राजस्‍थानी भाषा को मान्‍यता को लेकर नाटक करने वालो से इमानदारी से पुछा जाए की आप धरनो व प्रदर्शनों के अलाव भी कभी राजस्‍थानी भाषा बोलते है,सच यही सामने आएगा की कोई नही फिर क्‍यों ऐसे ओछे हथकंडे अपनाकर अपने आप को फायदा पहुंचाते हुए राजस्‍थान में आराजकता फैलाने का काम कर रहें है। डाक्‍टर साहब आपने मिडिया के बारे में गलत कहा है क्‍यो कि मिडिया के लोग ऐसा नही सोचते की उन्‍हे दोहरा लाभ मिलेगा और रही बात बडी खबरों को छापना तो अगर शहर में कही भी कुछ भी होता है तो उसे जनता तक पहुंचाने का काम करता है और इस मामले में भी यही हो रहा है ।

  2. govind goyal

    February 23, 2011 at 11:02 am

    bilkul sach hai aapki baat. aisa hee hai. thanks. keep it up.

  3. J.S.Parmar

    February 23, 2011 at 3:40 pm

    पुरुशोतम जी में आपसे १% भी सहमत नहीं हू …आप राजस्थान के इतिहास के बारे में ज्यादा नहीं जानते तो क्रप्या ऐसी टिपण्णी न कीजिये ये आपके रुतबे को १% भी शोभा नहीं देता ….में कोई साहित्याकार तो नहीं है लेकिंन मेरा वजूद राजस्थान से ही जुडा है और में ये कतई बर्दास्त नहीं कर सकता के कोई भी आदमी अपनी मात्भाषा (Mother language) को गाली दे…..आप सिर्फ कुछ टूटे फूटे लोगो की वाह वाही लूटने के लिए ये सब लिख रहे है …..

  4. हनवंतसिंघ

    February 23, 2011 at 4:13 pm

    डा. मीणा, तुम जैसे लोग नहीं चाहते की राजस्थान प्रगती करें और अगर दक्षिण-पुर्व वालें आंदोलन नहीं भी करेंगे तो तुम जैसे लोग जरुर करवा दोगे. मेवाड़ दक्षिण में आता है. कोटा उत्तर में. सब जगह ये आंदोलन तेज हो रहा है. मै खुद दक्षिण राजस्थान के फालना से हूं (सायद नाम सुना होगा). राजस्थानी कि आज जो हालत है वो अगर आने वाले ५० सालों तक रही तो राजस्थानी भाषा का अस्तित्व खतरें में पड़ जायेगा. हर साल हजारों भाषायें लुप्त हो रही है और यही हाल रहा तो राजस्थानी भी ५० सालों में लुप्त हो जायेगी.

    पता नहीं तुम जैसे दोगले लोग राजस्थान में क्यों जन्म लेते है. जिस मां का तुमने दुध पिया और जिस भाषा में तुमने लोरियां सुनी उसी अपनी मां की भाषा के बारे मे टुटने फुटने का खतरा लेकर क्यों राग अलाप रहे हो.

    हिंदी राजस्थान पर थोपी गयी है और आज 60 बरसों मे पुरे राजस्थान मे अगर ये परायी भाषा अपनत्व पा सकती है तो राजस्थानी क्यॊं नहीं. कब सुधरेंगे तुम जैसे गद्दार लोग.

  5. rakesh mutha

    February 23, 2011 at 4:35 pm

    aaderniya dr purosottam ji ka aalekh padha …..achha lagaa ki hindi bhasha ke baare mein unhone chinta vyakt ki …rashtra bhasha ke hote hue bhi english ke bolbaale ke baare mein unki chinta bahut saargarbhit hai …..kshetriya bhasha ke baare mein unke vichar magar utne udaar nahi ….eske kaaran samajh nahi aaye ?matra bhasha diwas per pure rajasthan mein saman roop se sabhiu rajasthaniyo ne ek swar mein ye kaha ki hindi hamari rastra bhasha bhasha hai hum uskaa samman kerte hai ..magar ye samman hum tabhi sayad sachhe dil se puri shardhha se v nistha se ker ppayenge jab hame hamari matra bhasha kaa samman mil sake ….mera ddagistaan kitaab viswa prasidh kitab hai uske lekhak rasool hamjatov ye likhte hai ki jo apni bhasha ka samman nahi ker sakta apni matra bhsah ko bhul anya bhasha ka saammna kerte hue use bhul jaaye uski soch v uskaa sanskaar vivechna ke yogya hai …pure raajasthan mein meera ko maaf kere pure viswa meibn meera ko padha jaata hai …..uske padhe jaane se kisi ko koi aitraaj nahi ?usko padh ker uske anuvaad ker hum apne ko sahityik kehlaane ki hod mein lag jaate hai rajasthani geeto ko sunker uske sangeet mein jhoomna pura viswa chahta hai pure raajasthan ke pahnave v uske nrityo ke kaaran desh kaa peryatan viswamanchitra mein aata hai to hame manjoor hai magar es bhasha ko 8 vi anusuchi mein shaamil kiya jana pasand nahi dr saheb kripiya punah vichaar kere …jhara prem se soche ?aap kaha tak sahi hai ?rajasthani ki manyata rajasthan ke tukde nahi kerayegi kabhi bhi kyuki rajasthani shabdkosh viswa kaa sabse bada shabdkosh hai …..rajashtani rajasthan ke sabhi elako ki boli se bani bhasha hai utter dakshin paschim kaa jhagdaa kahi nahi ye manski upaj hai jo es aandolan ko sahishnutaa se nahi samjhe jaane kaa perinaam hai …aap vidhawaan hai aapse apeksha hai ki aap apni vishal socjh mein sahishnutaa ka samavesh kere ek baar punah vichaar kere aap sahi maarg per sochne klag jayenge …aaj viswa mein hod lagi hai ki rajasthaNI UNKE LIYE CRAZE KAA VISHAY HAI …AUR AAPNE SWAYAN NE YE KAHA KI YE BAHUT MITHI BOLI HAI …TO KYA AAP BNAHI CHAHENGE KI ES MITHI BOLI KAA UCHIT SAMMAN HOGA MUJHE AAPKI POST SE YEHI SAMJH AAYA KI AAP UN RAJASTHANIYO KO BHI LAKAAR REHE HAI JO ES ANDOLAN MEIN SHAAMIL NAHI HAI AAPKI LALKAAR SAFAL HAI …RAJASTHAN KA BACHAA BACHHHA AAPKI POST PADH KER APNI MATRA BHASHA KE ES ANDOLAN SE JUDEGA MUJHE VISWAS HAI ..AAPKO BAHUT DHANYAAWAAD KI AAPNE ANDOLAN KO BAHUT ACHHI AUR SAHI SAMAY PER SAARTHAK HAWA DI …DHANYAWAAD

  6. girish lata

    February 24, 2011 at 5:38 am

    लेखक साब मेरा हर महीने राजस्थान के विभिन्न जिलों में आना जाना लगा रहता है,पर आज तक मुझे ऐसे लोग नहिओ मिले जो ये कहें की राजस्थानी भाषा हमारे ऊपर थोपी जा रही है, सच तोये है की हर युवा को वहां यही शिकायत है की केंद्रीय सरकार राजस्थानी भाषा को राज्य भाषा का दर्जा न दे कर अन्याय कर रही है वहा के लोगों के साथ.मुझे लगता है आप ये मनगढ़ंत लेखनी लिखना बांध कर दें तो अच्हा होगा.

  7. BHANWAR CHARAN

    February 24, 2011 at 9:39 am

    doctor sab…mayar bhasa ke beena prdesh gunga hai….mujhe lagta hai tum rajasthan mool ke nahi ho…tum log hamara kha rahe ho aur hamare ghar mai hamari matribhasa ka virodh kar rahe ho…es bhasa ka virodh karane sai pehale ek bar eske sahitya par nazar dalkar dekhna..aur mairi to ye badi hasarat hai ki hamari matribhasa ka virodh karne valo ka mai ,,TENTOOVA,, dabane ka punya loot saku…tumhare andar ratti bhar ki bhi sham hai to rajasthan chodkar chale jao..vaise tum nahi bhi jaoge to bhi hum hamare prdesh ko tumhare jaiso ki sajhish ki bhent nahi chadhne denge aur raj. ko hamesha ek rakhenge…JAI RAJASTHAN..JAI RAJASTHANI.

  8. Dr. S.D.Charan

    February 24, 2011 at 4:03 pm

    राजस्थान और राजस्थानी को तोड़ने बात करने वालों की हड्डी पसली तोड़ दी जाए तो इस समस्या का समाधान हो सकता है. राजस्थानी को भाषा का दर्जा तभी मिल सकेगा जब दोगलों को नेस्नाबूद कर दिया जायेगा.

  9. Dr. S.D.Charan

    February 24, 2011 at 4:04 pm

    राजस्थान और राजस्थानी को तोड़ने बात करने वालों की हड्डी पसली तोड़ दी जाए तो इस समस्या का समाधान हो सकता है. राजस्थानी को भाषा का दर्जा तभी मिल सकेगा जब दोगलों को नेस्नाबूद कर दिया जायेगा.

  10. Dr. S.D.Charan

    February 24, 2011 at 4:05 pm

    राजस्थान और राजस्थानी को तोड़ने बात करने वालों की हड्डी पसली तोड़ दी जाए तो इस समस्या का समाधान हो सकता है. राजस्थानी को भाषा का दर्जा तभी मिल सकेगा जब दोगलों को नेस्नाबूद कर दिया जायेगा.

  11. vinod saraswat

    February 25, 2011 at 5:34 pm

    राजस्थान रे माय इस्सा लूण हरामिया सारु कोई ठोड कोनी. इस्सा सिरफिरया लोग इज राजस्थान ने तोड़ण री बात कर सके. पण इण सू पैली इण लोगा री कड़तू भांग देवणी चाईजे. रेई बात राजस्थानी भाषा री तो वा अठे री जण -गण री भाषा छे. अर इस्सा लोग कित्ता ही पग पीटा करलो, फिटापो करलो, ओ रथ अबे रुके कोनी. ओ रथ अबे रुके कोनी, थे लाख फिटापा करलो, आ तो इयु इज चालसी थे मारग दूजो पकडलो. तो भाई डाक्टर तने कोई बास्ता नाला चोखा लागे तो उठे जा परो. अठे लूण हरामी बण ने क्यू भोगनियो भुवावे?

  12. vinod saraswat

    February 25, 2011 at 5:49 pm

    एक बात इण पोस्ट ने छापनिया इण रा धणी भी आ बात कान खोल ने सुण ले के राजस्थान में राजस्थानी रो विरोध बर्दास्त सू बारे छे. राजस्थान में विरोध राजस्थानी रो नी हिंदी रो हु रेयो छे. अर राजस्थान रा लोग माने के वारे माथे भारत री सरकार एक क़ाले क़ानून रे जबके चोर बारने सू जोरामर्दी थरपदी. राजस्थान री विधान सभा सू आज तकात इस्सो कोई प्रस्ताव पारित नी व्हियो के हिंदी अठे री भाषा छे. १९५६ रे राज भाषा विधेयक ने एक अध्यादेश रे जबके राजस्थान माथे थरप दियो. दूजी बात राजस्थानी री विधान सभा २००३ में राजस्थानी भाषा सारु एक प्रस्ताव सर्व सम्मति सू पारित करयो छे. जिका लोग राजस्थानी भाषा रे माथे आंगली उठावे वे लोग राजस्थान री विधान सभा अर राजस्थान रे जन-गण-मन री अवमानना करे. उपर एक भाई लीलाधर शर्मा जिको अपणे आपने मीडिया रो ठेकेदार समझे उन ने भी आ बात समझ लेवनी चाईजे के राजस्थान रे माय राजस्थानी रो विरोध कर ने क्यू लूण हरामी बणे ?

  13. vinod saraswat

    February 26, 2011 at 6:52 am

    जै आप लोगा रो भरोसो इण लोकतंत्र माथे छे. अर आप लोग भारत ने एक देस मानो छो अर राजस्थान ने इण रो एक प्रांत मानो. तद उण प्रांत री विधान सभा रे सर्वसम्मति रे प्रस्ताव ने क्यू नी मानो छो? अर राजस्थानी भाषा माथे आंगली उठावन रो अधिकार थाने किण दियो? जद सू इण प्रदेश रो गठन विहयो तद सू राजस्थानी री बात राजस्थान री विधान सभा में उठती रेई छे. १९९३ में भी राजस्थान री विधान सभा में २०० सदस्या माय सू १९७ सदस्य इण भाषा री मानता रे पख में ह़ा. फगत तीन लोग इण रे पख में नी ह़ा. तद रा मुख्य मंत्री भेरो सिंघ जी इण तीन लोगा रे विरोध ने देख”र लारे पड़ग्या अर केयो के जिण दिन सदन सर्वसम्मत व्हेला उन दिन राजस्थानी रो प्रस्ताव पारित कराला. बात आयी गयी हुगी. फेर इण रे ठीक १० साल पछे. २००३ में अशोक जी गहलोत राजस्थान री विधान सभा सू सर्वसम्मति सू प्रस्ताव पारित करवाय ने ओ जस्जोग काम करयो. तो फेर थे लोग किस्से खेत री मूली छो. जिका राजस्थानी भाषा रे माथे आंगली उठाय ने लूण हराम बण रेया छो? सो हुंसियार खबरदार- राजस्थानी भाषा रो विरोध करणों बंद करो अर थाने राजस्थानी भाषा ने सुहावे तो थे चावो तो राजस्थान छोड़ ने जाय सको. नींतर थारे जिसा लोगा ने धका देयने काढना पड़ेला. सो वगत्सर चेत ज्यावो तो ठीक है. नींतर भोग्निया भुविजता वगत नी लागेला. जै राजस्थान, जै राजस्थानी.

  14. Dr. S.D. Charan

    February 26, 2011 at 5:38 pm

    राजस्थानी नै कदेई भाषाई दर्जो कोनी मिल सकेला जदि आपां सगला जणा मिल र ईं जनगणना मायं मातृभाषा लै कॉलम मै राजस्थानी रो नाम नी भर्यो…
    आपके यहाँ आने वाले प्रगणक से कहकर परिवार सूचि में कॉलम नंबर १० में मातृभाषा के रूप में राजस्थानी का नाम भरवाएं तथा जांच लें कि प्रगणक ने राजस्थानी भर दिया है या नहीं .

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