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”कल गाड़ी टेस्‍ट के लिए वीकली ऑफ लेता था, अब टेस्‍ट न करने के लिए लेता हूं”

: न किसी से शिकायत ना कोई गम : 2004 में जब पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करके फ्री हुआ तो मन में बस एक ही उत्सुकता थी कि फटाफट कहीं नौकरी लग जाए। अपने दोस्त अनिल के साथ मिलकर मैंने फ्रीलॉंसिंग करना शुरू किया। दैनिक जागरण के दिल्ली जागरण सप्लीमेंट में मेरा पहला आर्टिकल हुमायूं टोंब का प्रकाशित हुआ। इसे इस पुलआउट में प्रमुखता से लीड के रूप में जगह दी गई थी। उस समय जागरण में कार्यरत राजेंद्र त्यागी जी ने मुझे थोड़ा बहुत काम देना शुरू कर दिया। इसके बाद शभूनाथ सिंह जी के सहयोग से हिन्दुस्तान और प्रसून लतांत जी के माध्यम से जनसत्ता तथा राष्ट्रीय सहारा जैसे अखबारों में जमकर फ्रीलांसिंग की।

: न किसी से शिकायत ना कोई गम : 2004 में जब पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करके फ्री हुआ तो मन में बस एक ही उत्सुकता थी कि फटाफट कहीं नौकरी लग जाए। अपने दोस्त अनिल के साथ मिलकर मैंने फ्रीलॉंसिंग करना शुरू किया। दैनिक जागरण के दिल्ली जागरण सप्लीमेंट में मेरा पहला आर्टिकल हुमायूं टोंब का प्रकाशित हुआ। इसे इस पुलआउट में प्रमुखता से लीड के रूप में जगह दी गई थी। उस समय जागरण में कार्यरत राजेंद्र त्यागी जी ने मुझे थोड़ा बहुत काम देना शुरू कर दिया। इसके बाद शभूनाथ सिंह जी के सहयोग से हिन्दुस्तान और प्रसून लतांत जी के माध्यम से जनसत्ता तथा राष्ट्रीय सहारा जैसे अखबारों में जमकर फ्रीलांसिंग की।

नौकरी की तलाश के लिए उस हर जगह तक गया जहां से जुगाड़ लगाकर किसी संस्थान में प्रवेश पा सकूं। उस समय दो बार अपनी मेहनत से अमर उजाला में टेस्ट पास किया लेकिन दुर्भाग्यवश मुझे उस संस्थान में नौकरी नहीं मिली। अंतत: पांच महीने के फ्रीलांसिंग के बाद दैनिक जागरण में अजय धोंडियाल जी के माध्यम से सुदामा पाठक जी ने मुझे नौकरी दे दी। मैं वहां पर रिटेनर था और 1000 रुपये मेरा फिक्स था। रिटेनर स्ट्रिंगर का वह रूप होता है जिसे नापकर पैसे मिलते हैं, इसका साफ मतलब है कि जितना काम करोगे उतना पैसा मिलेगा। पहले महीने मुझे सिर्फ 3500 रुपये मिले थे। इसके बाद में तो 10 हजार रुपये महीने तक का भी एक बार आंकड़ा छुआ था। ब्रजेश सिंह जी मेरे पहले बॉस थे उनके सहयोग से मुझे मेडिकल, क्राइम और इंडस्ट्री जैसी बीट देखने को मिली।

काम के तरफ से उन्होंने मुझे खूब बढ़ाया क्योंकि मैं नया था इसलिए इससे अधिक मैं उम्मीद भी नहीं कर रहा था। थोडे़ दिन बाद मेरा छह हजार रुपये पगार फिक्स हो गया। उस समय आप जानकर हैरान होंगे इस फिक्स पगार से मैं इतना खुश था, जितना बाद में बडी तनख्वाह पाकर मैं खुश नहीं हुआ। मैं लोकल रिपोर्टिंग में था, नेशनल ब्यूरो में जाने का सपना देखा करता था। जब मेरा सपना पूरा होता नहीं दिखा तो मेरा मन पढ़ाई की ओर मुड़ा और मैंने एमबीए करने का सोचा और उसमें अपनी गॉडमदर के सहयोग से प्रवेश ले लिया। सपने पूरे होते न देख मैंने शर्तें रखनी बंद कर दीं। थोड़े दिन बाद जागरण में एक बदलाव हुआ और ब्रजेश सिंह की जगह अनिल निगम नोएडा के प्रभारी बनकर आ गए। इस समय तक मुझे चीजें समझ में आनी लगी थीं और भगवान की वजह से मिली आर्थिक मजबूती ने मुझे फैसला लेने का साहस दे दिया था। मैंने एक महीने बाद ही ढाई साल की जागरण की नौकरी को अलविदा कह दिया। उस अमर उजाला ने, जिसमें मैंने दो बार टेस्ट पास किया था, मुझे इस बार बिना टेस्ट के ही नौकरी दे दी। इसका पूरा श्रेय शशि शेखर जी को गया।

अमित

इस संस्थान में रहकर न मैंने सिर्फ काम सीखा बल्कि अपनी पढ़ाई भी पूरी कर ली। एक मोटरसाइकिल का माडिफिकेशन करवाकर चौपट कर दिया। एक लाख रुपये से अधिक उस पर लगाए जो कि डूब गए। लेकिन मेरे इस शौक ने मेरी जिंदगी बदल दी। कहते हैं कि अगर कोई चीज दिल से चाही जाए तो उसे पूरा करवाने के लिए कायनात भी पीछे लग जाती है। आपको यह फिल्मी डायलॉग लग सकता है पर मेरे लिए यह सच साबित हुआ। शशि शेखर जी ने मुझे हिंदुस्तान में ऑटो पर कॉलम लिखने की अनुमति दे दी। यह बात उन्होंने मुझे बुलाकर नहीं बताई पर सबने यही कहा कि उनके कहने पर मैं यह कॉलम लिख रहा हूं। ऑटो की मुझे सिर्फ इतनी समझ थी कि गाड़ी चलती है उसमें पेट्रोल या फिर डीजल लगता है। लेकिन मेरे जज्बे ने मुझे ऑटो पत्रकार बना दिया। मैंने टूर किए खूब गाडिय़ां चलाईं। लेकिन एक कमी खल रही थी जिससे लग रहा था कि अभी इसमें कुछ बाकी है।

हिंदुस्तान का माहौल बदला कुछ लोगों को मुझसे जलन हुई तो कुछ परेशान हो गए। अचानक मैंने जब इस्तीफा दे दिया तब पता चला कि मेरे पास कोई नौकरी ही नहीं है। कुछ लोगों ने बोला जो तुम्हारे साथ हुआ है वह किसी अच्छी चीज के लिए हुआ है। मुझे तब लगता कि अब मेरे पास नौकरी नहीं है तो लोग मुझे खुश करने के लिए ऐसा तो बोलेंगे ही। पर सच में ऐसा हुआ और मैं उन सभी लोगों का कायल हो गया जिनकी वजह से मैंने हिन्दुस्तान छोडा था। सुधांशु श्रीवास्तव, प्रताप सोमवंशी भले ही ये लोग मेरे नौकरी के काल बने थे, लेकिन मेरे लिए इनकी छवि किसी देवता से कम नहीं है। शशि शेखर से कोई शिकायत इसलिए नहीं थी क्योंकि इस बंदे ने मेरे साथ कभी कुछ बुरा नहीं किया।

जब मैं हिंदुस्तान के एचआर प्रमुख मोहम्मद शहबर से बात कर रहा था तो उस समय सिर्फ यही बोला कि मैं युवा हूं मुझे नौकरी की चिंता नहीं है। इससे बढि़या और अच्छी नौकरी लेकर आपको दिखाउंगा। उस समय यह आवेश में निकले डायलॉग थे, जिसका परिणाम मैं हिंदुस्तान की अंतिम बार सीढियां उतरकर भूल गया। डेढ़ महीने बाद मेरे साथ ऐसा ही हुआ और जिन मोटरसाइकिलों और कारों के शौक की वजह से मैंने नौकरी छोड़ी थी, वही मेरी जिंदगी बन गए। मैंने शानदार तरीके से ओवरड्राइव मैग्जीन ज्वाइन कर लिया। इस मैग्जीन का हिंदी संस्करण लॉंच करवाया। इसके बाद मुझे समझ में आया कि एक समय था, जब मैं अपने वीकली ऑफ के दिन अपने पैसे का पेट्रोल भरवाकर गाडियां टेस्ट किया करता था और अब मेरे पास इतनी गाडिय़ां और पेट्रोल है कि मुझे गाडिय़ां न चलानी पड़े उसके लिए वीकली ऑफ लेता हूं। यह किस्मत-किस्मत की बात है। जब मुझे नौकरी नेटवर्क 18 में मिली तब एचआर ने साफ शब्दों में यह कहा कि मैं पहला हिंदी पत्रकार हूं जिसने ऑटो पर हिंदी में कॉलम लिखना शुरू किया। इन शब्दों ने मुझे गर्व का अहसास करवाया और उन लोगों को धन्यवाद कहने पर विवश कर दिया जिसकी वजह से मुझे यह मुकाम मिला।

अमित

मुझे अपने साथ घटी इस महत्वपूर्ण घटना से यह पता चल गया कि कोई किसी के साथ बुरा नहीं कर सकता अगर उसमें ईमानदारी छिपी है। मैंने अपने कई करीबी लोगों को हिंदुस्तान में उनके खराब आचरण की वजह से खोया है तो उनके आशीर्वाद से उससे इतना अधिक पाया है, जिसकी वे सपने में भी कल्पना नहीं कर सकते। गाडिय़ां मेरी दोस्त हैं उनके साथ मैं डेटिंग करता हूं, उनके साथ जिंदगी जीता हूं। मुझे पता है कि एक बहुत बड़ा बाजार पहली हिंदी की ऑटो मैग्जीन पाकर खुश है। मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने एक ऐसे सेगमेंट को हाईलाइट किया, जिसके बारे में अभी हिंदी पत्रकारिता के कुछ बूढे़ और कलुषित मानसिकता वाले वरिष्ठ पत्रकार अपनी सीमित सोच से बाहर निकलकर नहीं पहुंच पा रहे।

मैंने एमबीए इसलिए नहीं किया था कि मुझे जाकर किसी कंपनी में नौकरी करनी है बल्कि इसलिए किया था जिससे मैं अपनी पत्रकारिता को बाजार के अनुरूप ढाल सकूं। मैं इसमें सफल भी हुआ हूं। मुझे बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि बाजार की जरूरत को हिंदी अखबार पूरी तरह से नकार रहे हैं। पर क्या करें उनकी मजबूरी है, वे ऑटो पत्रकारिता तब शुरू करेंगे जब उन्हें इसकी समझ रखने वाले लोग मिलेंगे।

जब मैं मुंबई से पुणे की ओर गाड़ी चलाकर जा रहा होता हूं तब अक्सर यह सोचता हूं कि भगवान की यह दुनिया कितनी दिलचस्प है, जिसमें कभी भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है। यह वही शहर (मुंबई) है जहां पर मेरे पिता जी ने संघर्ष के सिवा कुछ नहीं पाया और मैं अब तक इसको न जाने कितनी बार सिर्फ चार महीने में अपनी मोटरसाइकिल और गाड़ी से नाप चुका हूं। एक बार मन करता है कि जब दिल्ली जाऊं तो कुछ घंटे निकालकर मैं अपने उन भूतपूर्व चाहने वालों से मिलने जाऊं, भले ही वे लोग मुझे पसंद न करें पर मैं उनको धन्यवाद बोलकर आऊं। मजाक नहीं कर रहा हूं दिल से बोल रहा हूं। आज सबके आशीर्वाद से मुझे एक ऐसी जीवनसाथी भी मिल गई है जिस पर मुझे गर्व होता है। सच कहूं जिंदगी लव यू यार!!! अंत में मैं बस इतना ही कहूंगा कि किसी में वह दम नहीं है जो किसी के हौसले को तोड़ सके, ऐसा करने वाला जब बाद में सोचेगा तो उसे अपने आप से नफरत हो जाएगी, क्योंकि यह दुनिया है ही ऐसी करवट लेने में वक्त नहीं लगाती। यहां सबको सबकी जरूरत है, आज नहीं तो कल फिर किसी मोड़ पर एक साथ बस के इंतजार में खड़े मिलेंगे। सब मुसाफिर हैं यहां फिर भला मैं क्यों किसी से नाराज रहूं। जिन गाडिय़ों के शौक ने मेरी नौकरी छूटी थी उन्हीं गाडिय़ों ने मुझे अपनी दुनिया का साथी बना लिया।

लेखक अमित द्विवेदी ऑटो पत्रकार हैं और मुंबई ओवर ड्राइव मैगजीन में सीनियर करेस्‍पांडेंट हैं.

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0 Comments

  1. Abhay Tripathi

    February 25, 2011 at 4:28 am

    अमित जी बहुत ही रोचक है आपके संघर्ष का दौर….अच्छा लगा आपके बारे में पढ़कर।

  2. sikanderhayat

    February 25, 2011 at 11:54 am

    aap ek kabil aadmi ha bahut badia baat ha bharat aaj kabil logo se hi bara pada ha charo taraf talented log dekhaye padte ha isi baat ko harivanh g ne apne taza lekh me bataya taakin desh ko aaj jarurat mahan logo ki ha jo ek badia naukri sunder bive or sunder bangle ko nahi balki vayvastha parivertan k leye junooni ho bina apne leye kuch soche bina apne liye kuch mange isi ko mahanta kehte ha vo kaha se aayege ?

  3. एस एन द्विवेदी

    February 25, 2011 at 2:42 pm

    बहुत सुंदर अमित….बधाई

  4. tumhara dost

    February 25, 2011 at 3:23 pm

    amit, tum acche aadmi ho yaar, tumhari acchi baat ye hai ki tum apni insaaniyat nahi khote kabhi, hamesha insaan bane rahte ho….yaar chahe us ladke ko bachana ho, ya kisi ki madad karna tum kabhi dusron ka bhala karne se peeche nahi hatthe ho…..accha laga jaankar ki tumne shaadi bhi kar li….good….tumhare sath accha accha ho ….apna naam nahi disclouse karna chahta…..

  5. Rohitashwa Mishra

    February 28, 2011 at 7:55 am

    Amit bhai Shaandaar……..
    Mere shubkamnaye aapke sath hain, Ek sher Arj kar raha hoon…..

    Manjile Unhi ko Milti Hain, Jinke Hoosko Mein Jaan Hoti Hain..
    Pankh Lagane se kya hota hai, Hosaalo se Udan hoti Hai…..

  6. Pratima Pandey

    February 28, 2011 at 8:46 am

    Amit..aapki ye jeevangatha aur sangharsh ko padh kar bohot accha laga aisa laga nahi jis dost ko main jaanti hun uske baare mein padh rahi hun aisa laga jaise main koi film dekh rahi hun aapki aur meri soch ek jaisi hi hai tabhi to hum dost hain 🙂 best of luck shaadi k liye aur future k liye nidhi jee se zarur milwaaiyega aaj aapki bhavnaao ko padh kar aisa laga jaise media jagat mein taazgi mehsus hui ho..sadaa aise hi acche kaam karte raho God bless you..:)

  7. Pratima Pandey

    February 28, 2011 at 8:47 am

    Amit..aapki ye jeevangatha aur sangharsh ko padh kar bohot accha laga aisa laga nahi jis dost ko main jaanti hun uske baare mein padh rahi hun aisa laga jaise main koi film dekh rahi hun aapki aur meri soch ek jaisi hi hai tabhi to hum dost hain 🙂 best of luck shaadi k liye aur future k liye nidhi jee se zarur milwaaiyega aaj aapki bhavnaao ko padh kar aisa laga jaise media jagat mein taazgi mehsus hui ho..sadaa aise hi acche kaam karte raho God bless you..:)

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