![]()
भागलपुर में जुटी चोर कवि को सराहने वाले कवियों की जमात. उत्तर प्रदेश के गोंडा निवासी जनकवि अदम गोंडवी तीस साल पहले लिख चुके थे ये लाइनें- ”काजू भुने प्लेट में ह्विस्की गिलास में, उतरा है रामराज विधायक निवास में” पर कवि सम्मेलन में इसे शंकर कैमूरी ने अपनी कविता बता कर बटोरी जोरदार तालियां.
भागलपुर में सबौर के छोटी बाजार वाले सामुदायिक केंद्र पर हुआ कवि सम्मेलन. कई और कवियों की लाइनों पर भी चोरी की खुसपुसाहट शुरू. मंच पर थे आजमगढ, गाजीपुर समेत यूपी के कई जिलों के कवि. हिंदुस्तान अखबार के काबिल रिपोर्टरों व संपादकों को भी अकल नहीं. अदम गोंडवी की मशहूर लाइनों को शंकर कैमूरी की कविता बनाकर खबर का भी प्रकाशन कर दिया. धन्य है पत्रकारों का आईक्यू लेवल व ज्ञान, धन्य हैं देश के आजकल के कवि. देखिए, हिंदुस्तान, भागलपुर की कटिंग और पढ़िए इस चोरी की महाखबर को.













मयंक
March 14, 2011 at 9:53 am
हद है…अदम गोंडवी की ये सारी कविताएं तो ज़्यादातर पत्रकारों को ज़ुबानी याद होनी चाहिए हैं….वाकई रामराज आ गया है…
midea ka father
March 14, 2011 at 11:44 am
aap bhi yashwant ji kaisi asha rkhte hai 5hajriya ptrkaar se yah to jo sunte hai bhais ke jase bhe kar dete hai,agar koi bharat me 53rajya hai to ye likh bhi denge 53 rajy hai,aajkal iq wale kam dalal jyada ho gye hai.
पंकज झा.
March 14, 2011 at 3:01 pm
रिपोर्टरों का तो सही में कोई कसूर नहीं….अखबार वालों को जितने पैसे में पत्रकार चाहिए उससे ऐसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह इतने जागरूक हों. लेकिन आश्चर्य तो डेस्क पर बैठे लोगों के काम को देख कर हो रहा है. केवल कट और पेस्ट करना ही उनकी ड्यूटी नहीं है यह समझना चाहिए.
और रही कवियों की बात …तो इस तरह की डकैती कोई कैसे कर सकता है? ऐसा बेशर्म भी कवि कहलाने वाला कोई व्यक्ति हो सकता है, पढ़ कर क्षुब्ध हूं. ‘उतरा है रामराज…तो काफी प्रसिद्द पंक्ति है ….छिः.
dhanish sharma
March 15, 2011 at 6:35 am
mari bhi kavita chori ho gai hai.
raj bharti
March 15, 2011 at 9:15 am
भाइ लोगो क्या चाहते हो अब बेचारा पत्रकार दुनिया भर की कविताऐ याद करता चले
Rahul Kumar Thakur
March 16, 2011 at 10:48 am
Hindustan jaise popular paper ka top news me yah to major mistake hai hi lekin ajkai jis terah main heading mein galtiyan reh rahi hai wah Hindustan ke managment lagte hain dhyan nahin dete hain.
girish pankaj
March 19, 2011 at 7:17 pm
mai to us chor kee himmat ki daad -khaaj doonga, jisane kavitaa maree’20 saal pahale likhi apni hi kavitaa ab achanak yaad aa rahi hai
kavita to badee pyaree hai,
magar
sach-sachbatana,
kahaan se maree hai…
‘jai ho’ chor-kavi ki.
aloktiwari
March 20, 2011 at 5:24 am
alok ki taraf se alok ji ko badhai