वैसे तो प्रभाष जोशी जी ने एक बखिया उधेड़ने वाले छांटे थे… इसीलिए स्लोगन भी था… सबकी खबर दे, सबकी खबर ले… पर किसी की बखिया उधेड़नी हो तो आलोक तोमर की शब्दावली उधार लेनी पड़ती थी. आलोक तोमर जैसा खबरची और शब्दों का खिलाड़ी न पहले कभी हुआ, न आगे कभी होगा. आलोक ने अपने जीवन में कई प्रयोग किए. बहुत कम लोग जानते होंगे… अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति प्रथम के सारे सवाल आलोक तोमर ने तैयार किए थे.
मैंने जनवरी 1997 में जब नवज्योति में अपना डेली कालम शुरू किया, तो वह हिंदी पत्रकारिता में नया प्रयोग था. आलोक तोमर उन लोगों में थे जिंहोंने मेरे प्रयोग की तारीफ की. तब तक जनसत्ता के तेवरों की धार कुंद होना शुरू हो चुकी थी… इसलिए राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश तक मेरे कालम को भरपूर पाठक मिले. मेरे कालम में मैंने जब खड़ी बोली का इस्तेमाल किया तो बहुतेरे लोगों ने मेरी आलोचना की पर प्रभाश जोषी और आलोक तोमर ने मेरी तारीफ की… दोनों ही अब इस दुनिया में नही रहे… मेरे लिए व्यक्तिगत तौर की ऐसी क्षति हुई है, जिसकी भरपाई नही हो सकती.
सालभर पहले जब पता चला था कि कैंसर ने आ घेरा है, कैंसर की उत्पत्ति का भी पता नहीं चल रहा था. आलोक तभी से लीज की जिंदगी जी रहे थे… हाल ही में नवभारत टाइम्स ने उनसे संडे के संडे स्पेशल स्टोरी लिखवाना शुरू किया था, तो लंबे समय बाद कुछ मजेदार पढ़ने को मिलना शुरू हुआ था… पर हिंदी पत्रकारिता को बेहतरीन लेखक इतने दिन ही नसीब था… जनसत्ता परिवार की पहली पीढ़ी को आलोक की बेवक्त मौत से गहरा धक्का लगा है. भगवान सुप्रिया को यह दुख सहने की शक्ति दे.
लेखक अजय सेतिया ईटीवी के ब्यूरोचीफ हैं.












gbnigam
March 21, 2011 at 4:27 am
bakhiya udhedana kab se patrakaro ki qualification ho gai .patrakaro ko kewal nishpaksh khabar ke liye hi jana chahiye n ki kisi ki khabar lene ke liye arthat bakhiya udhedane jaise kam ke liye
Khushdeep Sehgal
March 21, 2011 at 7:31 am
अद्भुत आलोक जी को विनम्र श्रद्धांजलि…न जाने क्यों आज धर्मेंद्र की फिल्म सत्यकाम की शिद्दत के साथ याद आ रही है…
जय हिंद…