संजय तिवारी को एवार्ड मिलने की सूचना जब मेरे पास आई तो सोचा कोई और संजय तिवारी होंगे जो किसी मीडिया संस्थान में कई साल काम-धाम करने के बाद किसी को सेट करके कोई एवार्ड पा रहे होंगे लेकिन उत्सुकता वश संजय भाई को फोन करके पूछ ही लिया, मुबारक हो, एवार्ड मिलने पर? संजय भाई सकुचा गए। लजा गए। शरमा गए। फोन पर ही। उनकी बातों से लगा मुझे। कुछ बोल पाने के पहले जो सांसों का उतार-चढ़ाव था, उससे महसूस कर लिया।
इतना तो महसूस करने ही लगे हैं हम दोनों। दिल्ली में रहते, झेलते, जीते, लड़ते, रोते, हंसते। संजय भाई की आवाज आई- हां, कल फोन आया था उन लोगों का, कह रहे थे कि आपको चुना गया है। इतना सुनने के बाद वही किया जो मुझे करना चाहिए। भड़ास4मीडिया के रिपोर्टर और फोटोग्राफर साथियों को संजय के पास भेज दिया। उनके मना करने के बावजूद जबरन उनकी तस्वीरें उतारी गईं। उन लोगों ने बात की। संजय सकुचाए। बोले। सुबके। फिर सबको भगा दिया।
ये कौन है संजय तिवारी जो दिल्ली में कई वर्षों से एक हड्डी पर जिंदा है। खुद मरने की हालत में होते हुए भी अपने पोर्टल को जिंदा रखे हुए है। मेरा नाता संजय से जब हुआ तब संजय को एहसास भी न हुआ होगा कि मेरा उनपे दिल आ गया है। ब्लागवाणी वाले मैथिली के यहां एक ब्लाग मीटिंग थी और मैं तब दिल्ली में आया ही आया था। बुलावा मिला तो मैं भी वहां पहुंचा, भड़ास ब्लाग के माडरेटर के बतौर। वहीं विस्फोट वाले संजय दिखे। नाम विस्फोट लेकिन काया सींक। थोड़ा तरस आया, थोड़ी हंसी आई, थोड़ा व्यंग्य से मुस्काया। लेकिन उस मीटिंग में संजय की बातें सुनीं, उन्हें महसूस किया, उनके अंदाज को देखा, उनकी आंखों को समझा तो लगा, बंदे में है दम, बंदेमातरम।
संजय भाई को किसी संस्थान ने एवार्ड दे दिया, मेरे लिए ये महत्वपूर्ण नहीं है। मेरे लिए महत्वपूर्ण है कि उस बंदे के बारे में मैं यहां कुछ लिख पा रहा हूं। वो स्वतंत्र पत्रकार नहीं मुक्त पत्रकार है।
वो खुद कहता है- जो मुक्त नहीं होगा वो किसी मीडिया हाउस के लिए भी स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं कर सकता।
वो कहता है- जिसे गोबर की खुश्बू अगर बदबू समझ आती है तो वो भारत को क्या समझ सकता है।
वो कहता है- खतरे में भारत कभी नहीं रहा और न आज है, खतरे में भारतीयता है। हमारे देसज सरोकार व संस्कार हैं, जो असली भारत के सरोकार व संस्कार हैं।
जाने क्या क्या कहता है संजय। मुझे कभी पगला लगता है। कभी अपना लगता है तो कभी बेगाना। लेकिन ये सच है कि ये संजय वाकई संजय है, जो समय है, जो देख पा रहा है आगे, जो जी पा रहा है अपने शर्तों की बेलौस फक्कड़ जिंदगी, एक मिशनरी पत्रकार-सी जिंदगी। संजय उन असली पत्रकारों में हैं जो अब दुर्लभ हो चुके हैं, जिनके अब जीवाश्म दिखते हैं लेकिन सौभाग्य से संजय अभी जीवाश्म नहीं बने हैं, जिंदा हैं।
आइए, इस संजय के लिए दुवाएं करें। दो दिन तक खाना न मिलने के बावजूद किसी के आगे झुके नहीं। अपने दिल की, अपने धुन की, करता रहे। विस्फोट को जिंदा रखे रहे, ताकि जिंदा रह सके भारत के गांव और उसके सरोकार के बारे में सोचने वाला कोई मंच, दिल्ली में भी। ताकि दिल्ली में आकर भी बिना किसी से एक पैसे की मदद मांगे अपनी शर्तों पर कोई कर सके अपने देसज जन के लिए विस्फोटक पत्रकारिता। ऐसे संजय की शख्सीयत, उनकी हिम्मत और उनके आत्मविश्वास को मेरा प्रणाम।
संजय से [email protected] पर संपर्क करिए और उन्हें विश करिए, इस दौर में भी जीवट बने रहने के लिए, अड़े-डटे रहने के लिए, आंसू और भूख वाले हालात की परवाह न करते हुए देश-समाज के लिए जीते रहने के लिए, सत्ता व प्रलोभनों से मुक्त होकर अपनी कलम की ताकत पर भरोसा करने के लिए।
लेखक यशवंत सिंह हिंदी मीडिया की खबरों के नंबर वन पोर्टल भड़ास4मीडिया के एडीटर हैं। उनसे संपर्क करने के लिए आप [email protected] या 09999330099 का सहारा ले सकते हैं।











