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‘काम का दमन और वीर्य विहीन बैल’

मटुक और जूली ने ब्लाग क्या बनाया, उन्हें अनजाने में मिल गया समाज के हिप्पोक्रेटिक, कट्टरपंथी और यथास्थितिवादी लोगों से लड़ने का नायाब हथियार। अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम, जिसके जरिए वे अपने विरोधियों को समझा पा रहे हैं, अपने दर्शन से परिचित करा पा रहे हैं, दूसरों के जले-भुने और प्रेममय विचारों से अवगत हो पा रहे हैं। मटुक-जूली प्रेम संबंध को गुरु-शिष्या प्रेम संबंध कह इसे अपवित्र और शर्मनाक बताने वालों को मटुक नाथ ने अपने ब्लाग पर चार भाग में लिखकर जवाब दिया है। दूसरा भाग यहां दे रहे हैं। पढ़िए, सहमत-असहमत होने पर राय बताइए, मटुक-जूली के ब्लाग पर कमेंट लिखकर।  -एडिटर, भड़ास4मीडिया 

मटुक और जूली ने ब्लाग क्या बनाया, उन्हें अनजाने में मिल गया समाज के हिप्पोक्रेटिक, कट्टरपंथी और यथास्थितिवादी लोगों से लड़ने का नायाब हथियार। अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम, जिसके जरिए वे अपने विरोधियों को समझा पा रहे हैं, अपने दर्शन से परिचित करा पा रहे हैं, दूसरों के जले-भुने और प्रेममय विचारों से अवगत हो पा रहे हैं। मटुक-जूली प्रेम संबंध को गुरु-शिष्या प्रेम संबंध कह इसे अपवित्र और शर्मनाक बताने वालों को मटुक नाथ ने अपने ब्लाग पर चार भाग में लिखकर जवाब दिया है। दूसरा भाग यहां दे रहे हैं। पढ़िए, सहमत-असहमत होने पर राय बताइए, मटुक-जूली के ब्लाग पर कमेंट लिखकर।  -एडिटर, भड़ास4मीडिया 

गुरु-शिष्या संबंध (2)

अब भारतीय मानुष का मुख्य स्वभाव काम और प्रेम विरोधी है. क्रोध के वे उतने खिलाफ नहीं हैं, हिंसा के उतने खिलाफ नहीं हैं, ईर्ष्या, घृणा सब वे सह लेते हैं, लेकिन काम को बर्दाश्त नहीं कर पाते. मैंने आँखों देखा है, अगर बेटी किसी के साथ फँस गयी और गर्भवती हो गयी, तो इज्जत का सवाल इतना बड़ा होता है कि बेटी की मृत्यु की कीमत पर भी इज्जत बचायी जा सके तो आदमी तैयार रहता है! क्यों ऐसा होता है? क्या कारण है इसके पीछे?. मेरे खयाल से इसके पीछे का रहस्य यह है कि काम सारे खुराफातों की जड़ है. गीता की एक पंक्ति है- ‘कामात्‌ जायते क्रोधः’- काम में बाधा पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है. क्रोध का जनक काम है. यह अहंकार, ईर्ष्या, घृणा भी अपने साथ लेकर आता है. जो इतनी बीमारियों का जन्मदाता हो, अगर भारतीय समाज ने उसकी चोटी पकड़ी है तो ठीक ही पकड़ी है. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि काम पर लगाम लगाने का उनका तरीका मूढतापूर्ण है.

काम को जबरन दबाया नहीं जा सकता. क्या आपने गौर किया है कि बछड़ा जो मस्त और बलवान साँड़ बनने वाला है, उसका अंडकोष चूड़ कर उसे बैल क्यों बना दिया जाता है? क्योंकि सांड़ के कंधे पर बैलगाड़ी का जुआ नहीं रखा जा सकता, सांड़ उसको लेकर कहीं भाग जायेगा, दुर्घटना करा देगा. लेकिन वीर्य विहीन बैल बेचारे को जो भी लाद दीजिये, वह ढोयेगा. हमने अपने युवावर्ग को करीब-करीब ऐसा ही बैल बना दिया है. पुरानी पीढ़ी के लोग उनसे अपने जर्जर विचार ढुलवाते हैं. काम का दमन युवा वर्ग को बधिया करने जैसा ही कृत्य है. कुछ जीवंत लोग जो दमन को स्वीकार नहीं करते, वे उच्छृंखल हो जाते हैं. इसलिए उच्छृंखलता से बचाने के लिए समाज दमन की शरण में चला जाता है. लेकिन सही रास्ता इन दोनों से भिन्न है. काम दमन की चीज नहीं है, क्योंकि दमन के द्वारा उसे केवल विकृत ही किया जा सकता है, उसका नाश नहीं किया जा सकता. काम की उच्छृंखलता उसे अराजकता और दुख की ओर ले जाती है. काम का केवल रूपांतरण किया जा सकता है. काम को प्रेम में रूपांतरित किया जा दो दीवाने... : जूली और मटुक. सकता है, काम को कई कलाओं में, विज्ञान में, हर प्रकार के सृजन में रूपांतरित किया जा सकता है. यही काम हमारा समाज नहीं कर रहा है. शिक्षा में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है. इस दृष्टि से समाज के प्रबुद्ध लोग केवल कहने के लिये प्रबुद्ध हैं. उनके भीतर रूपांतरण की कोई चेष्टा नहीं दिखाई पड़ती है. सरकार बेचारी इतनी अच्छी बात कहां से सोचेगी! उन्हें सत्ता की मस्ती और छीना-झपटी से फुर्सत कहां? काम के रूपांतरण की विद्या के अभाव में दमन का सहारा लेना कुछ वैसा ही है जैसे रात में बिजली के अभाव में टायर जलाकर रोशनी पैदा करना. थोड़ा प्रकाश मिलेगा, लेकिन उसके जहरीले धुएं में सबका दम घुटेगा, ऑक्सीजन खत्म होगा और लोग मर जायेंगे.

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट करने की कोशिश की गयी है कि गुरु-शिष्या-संबंध के विरुद्ध होने का मूल कारण काम के प्रति समझदारी की कमी है. इस विरोध को कई रूपों में व्यक्त किया जाता है. जैसे कहा जाता कि गुरु-शिष्या-संबंध की परंपरा शर्मसार हुई है. गुरु-शिष्या-संबंध की बात तो दूर गुरु-शिष्य-संबंध की भी कोई अक्षुण्ण परंपरा नहीं रही इस देश में. परंपरा का मतलब है कि जो चीज चली आ रही हो सदियों से. गुरु-शिष्य-परंपरा तभी से खत्म हो गयी है, जब नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला आदि विश्वविद्यालय जमींदोज हो गये. मुसलमान आये तो मामूली-सी मुसलमानी शिक्षा चली. अंग्रेज आये तो अंग्रेजी शिक्षा शुरू हुई. इन शिक्षाओं में गुरुकुल जैसा गुरु-शिष्य-संबंध की कल्पना भी नहीं की जा सकती. लेकिन हम संस्कारवश इसी शिक्षा में गुरुकुल की कुछ गुरुभक्ति संबंधी कहानियाँ घुसा कर आत्ममोह के शिकार होते रहे हैं! गुरुकुल में लड़कियों के पढ़ने का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है. केवल लड़के पढते थे. अगर लड़कियाँ पढतीं तो उनके प्रेम-प्रसंगों की कई कहानियाँ प्रचलित हो गयी होंतीं; क्योंकि पुराना भारत काम और प्रेम के बारे में उदार और समझदार था. इसलिए जब-जब मौका हाथ आया प्रेम की घटना घट गयी. महान्‌ गुरु ऋषि याज्ञवल्क्य ने अपनी शिष्या से ही प्रेम किया. उनकी तीन पत्नियां थीं- कात्यायनी, गार्गी और मैत्रेयी. कहा जाता है कि इनमें गार्गी उनकी शिष्या थीं. इससे सुंदर उदाहरण और क्या दिया जा सकता है?

आधुनिक युग में भी जो महान् गुरु हुए, उनकी भी प्रेमिकाएं उनकी शिष्याएं थीं. मैं तो देखने नहीं गया किसी को. लेकिन इसी समाज में भगिनी निवेदिता और विवेकानंद के संबंध के बारे में अफवाहें उड़ी थी. मैंने जे. कृष्णमूर्ति के बारे में शिष्या-प्रेम की कहानी महेश भट्‌ट की आत्मकथा में पढ़ी है. यह तो आध्यात्मिक जगत की बात हुई. भौतिक जगत में अपने जमाने में दर्जनों बड़े गुरुओं को जानता हूं जिनके प्रेम-संबंध अपनी शिष्याओं से रहे. सभी समझदार लोग इस सहज प्रेम को स्वीकृति दिये हुए हैं. लेकिन सारी नैतिकता बैल सरीखे लोगों के कंधों पर लदी हुई है. इन बैलों की नजर से बचने के लिये इन लोगों ने अपने प्रेम-प्रसंगों को परदे में रखा है. लेकिन ये बड़े गुरु पाखंडी नहीं हैं. छोटे-छोटे ना-समझ और कुंठित प्रोफेसर, मास्टर आदि ज्यादा शोर मचाते हैं, क्योंकि गार्जियन को विश्वास में लेकर जो ये धंधा करते हैं, मेरी घटना ने उनके अभिभावकों को सजग कर दिया है, इसलिए वे मुझ पर खिसियाते हैं. धंधा थोड़ा मंदा पड़ा होगा.

जो प्रोफेसर-प्रोफेसरनी, मास्टर-मास्टरनी जितने जगजाहिर लुच्चा-लुच्ची और छिनार हैं, वे उतने ही मुझ पर कुपित होते हैं और जो लड़कियां गार्जियन से छिपकर उनको सहयोग करती रही हैं, उन पर संभवतः पहरेदारी लगी होगी, वे भी मुझ पर जहर उगलती हैं. कहीं बिट्‌टू भी इसी श्रेणी की लड़की तो नहीं? अन्यथा वह इतनी कुपित क्यों होती? सामान्य लड़कियों को क्या मतलब कि कौन क्या करता है? काम का दमन इस तरह की घटनाओं में बहुत दिलचस्पी पैदा कर देता है. लोग खूब चटखारे ले-लेकर इसकी चर्चा करते हैं. ऐसे लोग अपने को श्रेष्ठ और चरित्रवान दिखलाने की भरपूर कोशिश करते हैं. हकीकत यह होती है कि वे अपने प्रेम-संबंधों पर परदा डालकर पाखंडी बन जाते हैं और समाज को धोखा देते हैं. उनके मन में काम और प्रेम के प्रति आदर भाव नहीं होता. वे इसे गलत समझते हैं. यहीं पर उनमें और हममें मूलभूत अंतर दिखाई पड़ने लगता है. इस अंतर को एक बार फिर रेखांकित कर दूं. वे जिस काम का मजा लेते हैं, उसी के प्रति हेय दृष्टि रखते हैं और कपट का धुआं उगल-उगल कर उसमें उसे ढंक देना चाहते हैं. लेकिन हम काम को आदर देते हैं. उसकी ताकत को मानते हैं, उसके रस को जानते हैं और उसे उच्चतर आनंद में रूपांतरित करने के लिए प्रयासशील रहते हैं.

इस संबंध पर कुछ और दृष्टियों से भी विचार करने की जरूरत है.


मटुक-जूली के ब्लाग पर प्रकाशित गुरु-शिष्या संबंधों की सभी कड़ियां पढ़ने के लिए क्लिक करें-

  1. भाग एक
  2. भाग दो
  3. भाग तीन
  4. भाग चार
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0 Comments

  1. BrijMohan

    May 22, 2010 at 8:36 am

    Dil pareshan Hoker hi Kanhi Jata hai

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