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पत्रकारिता की काली कोठरी से (15)

Alok Nandanईश्वर के नाम पर परजीवी कौम

उन दिनों जम्मू में अमरनाथ यात्रा की तैयारियां चल रही थी। देश भर से लोग बाबा अमरनाथ की जयकार करते आ रहे थे। पूरा जम्मू जयकार से गूंज रहा था। अमर उजाला ऑफिस के बगल में बड़ा मैदान तीर्थयात्रियों से पटा था। लंबी जटा व दाढ़ी बढ़ाये साधुओं की टोली में मेरी खास रुचि थी। काम खत्म कर मैं इन्हीं साधुओं की टोली में शामिल हो जाता और उनके जीवन को समझने की कोशिश करता।

Alok Nandanईश्वर के नाम पर परजीवी कौम

उन दिनों जम्मू में अमरनाथ यात्रा की तैयारियां चल रही थी। देश भर से लोग बाबा अमरनाथ की जयकार करते आ रहे थे। पूरा जम्मू जयकार से गूंज रहा था। अमर उजाला ऑफिस के बगल में बड़ा मैदान तीर्थयात्रियों से पटा था। लंबी जटा व दाढ़ी बढ़ाये साधुओं की टोली में मेरी खास रुचि थी। काम खत्म कर मैं इन्हीं साधुओं की टोली में शामिल हो जाता और उनके जीवन को समझने की कोशिश करता।

इन साधुओं की अलग-अलग प्रजातियां थी। कुछ मठ से जुड़े थे, तो कुछ किसी घनघोर तपस्वी बाबा के चेले थे, तो कुछ स्वतंत्र रूप से ईश्वर की तलाश में भटक रहे थे। आध्यात्मिकता और भक्ति की राह पर चलने का दम भरने वाले इन साधुओं के जीवन को करीब से समझने के दौरान मेरे सामने एक रोचक दुनिया खुल रही थी। अधिकतर साधु अनपढ़ थे और जीवन के संघर्ष से मुंह मोड़कर इन्होंने साधुगिरी का रास्ता अपनाया था। अधिकतर साधुओं के अंदर पारिवारिक जीवन की कठिनाइयां का सामना करने की क्षमता नहीं थी। ये जीवन से हारे लोगों का काम था और पूरी तरह से परजीवी थे। इन्हें बस दो टाइम का खाना और सुट्टा लगाने के लिए गांजा चाहिए था। भगवान की भक्ति के सहारे समाज के बहुत बड़े तबके पर ये लोग बहुत ही चालाकी से बोझ बने हुए थे।

इनके बीच में साधु की तरह रहकर मैंने कई बड़े-बड़े साधुओं को टटोला और मौका देख कर उन्हें अपने तरीके से गीता और रामायण के साथ-साथ कांट, रूसो, जॉन स्टुअर्ट मिल, लॉक, हेगल, नीत्शे आदि  के दर्शन भी समझाने लगा। कई नौजवान साधु मुझे एक पहुंचा हुआ फकीर समझने लगे और मेरा चेला बनने के लिए उत्सुक थे। उनमें से कई साधुओं का ब्रेंन वाश करके मैंने उन्हें जीवन के मुख्यधारा की ओर अभिमुख करने की कोशिश की और सफल भी हुआ।

मेरी इच्छा अमर उजाला में साधुगिरी के विभिन्न आयामों पर पूरी मजबूती के साथ कलम चलाने की हो रही थी, लेकिन राजेंन्द्र तिवारी के माइंड सेट के कारण मैंने अपनी इस इच्छा को दबा दिया। मुझे पूरा यकीन था कि इन साधुओं के आर्थिक जीवन की यदि गहराई से पड़ताल की जाती, तो इस परजीवी कौम पर सवालिया निशान जरूर लगता। मेरी नजर में साधुगिरी संस्कृति ने भारत को मानसिक तौर पर पंगु बनाने में महर्त्वपूण भूमिका निभाई है। साधुगिरी के नाम पर परजीवियों की एक बहुत बड़ी मंडली देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर बोझ बनी हुई है।

उस दौरान मेरे दिमाग में बार-बार ये ख्याल आते कि इन साधुओं को बेहतर प्रशिक्षण के बाद कश्मीर के विभिन्न इलाकों में विधिवत बसा देने से कश्मीर समस्या के समाधान की दिशा में एक डग भर सकते हैं। इस बात की चर्चा जब मैंने वहां बैठे अंतरराष्ट्रीय इंटेलिजेंसिया के बीच के लोगों से की तो वे लोग यही कहने लगे कि इसके लिए जरूरी है पहले अनुच्छेद ३७० को हटाना। इन लोगों से बार-बार चर्चा के दौरान घूम-फिर कर मामला अनुच्छेद ३७० पर ही अटक जाता था।

अंतरराष्ट्रीय इंटेलिजेंसिया के लोग भी इस बात को स्वीकार करते थे कि अनुच्छेद ३७० को हटाये बिना भारत कश्मीर के मामले को कभी ठीक से हैंडल नहीं कर पाएगा। मेरी बातों को सुनने के बाद वे कहा करते थे, तुम जैसे लोगों ने ही गेस्टापो को कुख्यात बना दिया था। तुम्हें पत्रकारिता में नहीं, गेस्टापो जैसे किसी संगठन में ऊपर के ओहदे पर होना चाहिए था। 

एक दिन जम्मू अस्पताल में मटरगश्ती के दौरान एक ऐसे व्यक्ति से मुलाकात हुई जिसे लुटेरों ने वैष्णव देवी के दरबार में जाने के दौरान न सिर्फ उसके और उसके परिवार के साथ लूटपाट की थी, बल्कि उसे चाकुओं से बुरी तरह से घायल कर दिया था। उससे लंबी बातचीत के बाद मुझे पता चला कि लुटेरों का एक गिरोह बहुत दिनों से माता के दरबार में आने वाले यात्रियों को अपना शिकार बना रहा था। इस खबर को लेकर मैं असमंजस की स्थिति में था, क्योंकि यह मेरी बीट नहीं थी और राजेंद्र  तिवारी से खबरों को लेकर बतकही करने की मेरी अब कतई इच्छा नहीं थी। मन मारकर इस खबर को छोड़ दिया। मेरे दिलो- दिमाग में यह बात धंसती जा रही थी कि मैं पत्रकारिता के साथ न्याय नहीं कर पा रहा हूं। पत्रकारिता का वह फार्मेट जिसे राजेंद्र तिवारी बीट के नाम पर हांक रहे थे, मेरी स्वतंत्र प्रवृत्ति से बिल्कुल मेल नहीं खा रहा था।

विश्व पत्रकारिता के इतिहास में जॉन रीड के अंदाज पर मैं फिदा था। वोल्शेविक रिवोल्यूशन पर लिखी गई उनकी पुस्तक ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ को मैं रिपोर्टिंग का बाइबल मानता हूं। लेनिन के नेतृत्व में उस खूनी क्रांति की जॉन रीड ने अदभुत रिपोर्टिंग की है। जम्मू और कश्मीर की रिपोर्टिंग मैं जॉन रीड की तरह करना चाहता था, लेकिन राजेंद्र तिवारी के रहते यह संभव नहीं था। 

दिल्ली में एक बार मैं जम्मू-कश्मीर के मामले को लेकर राष्ट्रीय सहारा के संपादक गोविंद जी से भिड़ गया था। जम्मू-कश्मीर के मामले को लेकर एक बार वह अपने कैबिन में मुझे बिठाकर हांके जा रहे थे कि वहां की स्थिति बहुत ही खराब है। शेख अब्दुल्ला की तुलना वह लेनिन से कर रहे थे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सुभाषचंद्र बोस की भूमिका को लेकर भी वह बहकते जा रहे थे।  मैंने उनसे कहा, आप न तो लेनिन को ठीक से जानते हैं और न ही सुभाष बाबू को और आपकी बातों को सुनकर मैं दावे से कह सकता हूं कि आप न तो जम्मू-कश्मीर को ठीक से जानते हैं और न ही शेख अब्दुल्ला को। हालांकि उस वक्त मैं भी शेख अब्दुल्ला को ठीक से नहीं जानता था, लेकिन सम्राट अशोक के अफगान की सीमाओं तक की कहानी इतिहास के पन्नों में खूब पढ़ी थी, और रात भर आंखें गड़ागड़ा के पढ़ी थी। सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रति अनुरक्ति दिखाने के बाद अफगानिस्तान के तक्षशिला में उसकी सीमाओं में एक विद्रोह भी हुआ था, जिसे अशोक ने तलवारों की झंकारों से दबाया था। कॉलेज के दिनों में सम्राट अशोक की वह सीमा मेरे दिमाग के नक्शे पर बैठ गई थी, उसके बाद की टूटी-फूटी सीमाओं वाले भारत के इतिहास को मैं हिकारत की नजर से देखता था। औरंगजेब ने भी उसी सीमा को हासिल करने की कोशिश की थी, इसलिए उसके इस्लामिक फॉर्मेट पर आधिरत मूवमेंट को भी गंभीरता से समझने के लिए खूब दिमाग दौड़ाता था। औरंगजेब की धर्मपरस्ती का मैं कायल था, यदि उसकी आंखों में इस्लाम से इतर कोई मॉडल होता तो निःसंदेह वह इस बहुत बड़े भू-खंड में एक महान नायक के रूप में जाना जाता। वेश्यालयों और शराबखोरी को सार्वजनिक जीवन से दूर करना, लोकहित में उठाये गये उसके क्रांतिकारी कदम थे।

इतिहास में कश्मीर के लपेटे गए धागों को मैं वर्तमान से जोड़कर अमर उजाला के पन्नों पर उड़लेना चाहता था, लेकिन प्रयोग के सारे मार्ग बंद थे। वह अखबार एक व्यक्ति के दिमाग से स्थानीय स्तर पर संचालित हो रहा था। भले ही केंद्रीय ऑफिस में अखबार के संपादकीय ढांचे की बनावट कसी हुई थी, लेकिन स्थानीय स्तर पर राजेंद्र तिवारी का अपना मॉडल चल रहा था। राजेंद्र तिवारी का वह मॉडल मेरे जॉन रीड के मॉडल से मेल नहीं खा रहा था। मास्कों की सड़कों पर दौड़ते हुये दीवारों से विभिन्न तरह के पोलिटिकल पोस्टरों को फाड़ने की जॉन रीड की अदा का मैं दीवाना था। इन्हीं पोस्टरों में वह उस समय की रूसी क्रांति को करवट मारते हुये देख रहा था और समझ भी रहा था और लिख भी रहा था। राजेंद्र तिवारी की निजामत में अमर उजाला का जम्मू फॉरमेट जॉन रीड की ‘रिपोर्टिंगगर्दी” से कोसों दूर था। जॉन रीड के शब्दों से निकलने वाली बोल्शेविक गर्मी मुझको पत्रकारिता के लिए कहीं भी कूद पड़ने के लिए उकसाती थी। रिपोर्टिंग का ककहरा मैंने जॉन रीड से सीखा, फाइव  वाइफ्स और वन हसबेंड वाली बाइगेमी न्यूज राइटिंग फार्मूला मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। जॉन रीड की रिपोर्टिंग स्टाइल के सामने  दुनियाभर के सारे रिपोर्टर मुझे बौने लगते। रिपोर्टिंग का मेरा हीरो केवल जॉन रीड था।      

राजेंद्र तिवारी मुझसे पानी के टैंकरों, स्कूलों की स्थिति, सड़कों पर नगर निगम द्वारा चलाये जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान आदि पर खबर लिखने को कहते थे। वह राजेश रपरिया ब्रांड के पत्रकार थे, उनकी स्कूलिंग पारंपरिक पत्रकारिता वाली थी। दुनियाभर की ताजी हवा के लिए उन्होंने अपने दिमाग की सारी खिड़कियां और दरवाजे बंद कर रखे थे। उनके इस रवैये का मुझ पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था। मेरे  साथ न्यूटन का तीसरा नियम- क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है- काम कर रहा था, हालांकि उस वक्त मुझे इस बात का अहसास नहीं था। अपने मन मुताबिक खबरों को नहीं पकड़ पाने के कारण या तो मैं आक्रामक हो जाता था या फिर उदासीन। धीरे-धीरे उदासीनता का पक्ष हावी होता जा रहा था। मेरी जिंदगी एक रूटीन बनती जा रही थी।  

जम्मू अस्पताल में उस महिला डॉक्टर के साथ अच्छे समय जरूर व्यतीत हो रहे थे, लेकिन जमीनी धरातल पर उस संबंध के अर्थ भी मेरी समझ में नहीं आ रहे थे। उस महिला डॉक्टर से जम्मू के अस्पताल में चलने वाली राजनीति और सियासी हस्तक्षेप के विषय में बहुत कुछ जानने और समझने का मौका मिल रहा था। उस अस्पताल के डॉक्टरों की लॉबी सियासत से जुड़ी हुई थी। चूंकि राजनीति मेरी बीट नहीं थी इसलिए उस पर भी मैं खबर नहीं लिख सकता था। खबर लिखने के पहले बार-बार मुझे यही सोचना पड़ता था कि इस पर खबर लिखू या नहीं? यह खबर मेरे बीट में आती है या नहीं? धीरे-धीरे मैं मानसिक थकान का शिकार हो रहा था। जम्मू के गंदे पानी का असर मेरे स्वास्थ्य पर भी पड़ने लगा था। कुल मिलाकर मेरी स्थिति बदतर होती जा रही थी। 

जम्मू आने के बाद माता वैष्णो देवी के दरबार में जाने के विषय में लगातार सोच रहा था। इसी बीच दिल्ली के कुछ  दोस्त मेरे पास आए। वे लोग माता वैष्णो देवी के दरबार में जा रहे थे। मैं भी उनके साथ निकलना चाह रहा था। इस बात की चर्चा जब मैंने राजेंद्र तिवारी से की तो उन्होंने मुझे वहां जाने से रोकते हुये कहा कि, अभी-अभी अखबार शुरू हुआ है। आपको तो यहां लंबे समय तक रहना है। फिर कभी चले जाइएगा। दिल्ली के मेरे सारे दोस्त वैष्णो देवी के लिए निकल पड़े और उसी दिन मैंने जम्मू छोड़ने का मन बना लिया। पत्रकारिता के नाम पर चाकरी मेरे बस की बात नहीं थी। तीन दिन बाद मैंने राजेंद्र तिवारी से कहा कि मैं जम्मू से जा रहा हूं। उन्होंने पूछा कि आप लौटेंगे कि नहीं। मैंने कहा, पता नहीं। वह कुछ नहीं बोले। अगले दिन मैं वहां से जालंधर का टिकट कटाकर ट्रेन पर बैठ गया। चूंकि अमर उजाला में मेरी नियुक्ति रामेश्वर पांडे ने की थी, इसलिए अमर उजाला छोड़ने से पूर्व मैं नैतिक रूप से रामेश्वर पांडे को रिपोर्ट करने के लिए बाध्य था।   

जिस वक्त मैं जम्मू को पीछे छोड़ते हुये जालंधर की ओर लौट रहा था, उस वक्त मैं घोर निराशा में डूबा था। मुझे बार-बार यही अहसास हो रहा था कि जम्मू के फ्रंट पर मैं बुरी तरह से असफल हो चुका हूं। उस वक्त यह भी स्पष्ट नहीं था कि आगे मुझे आगे क्या करना है। दिल्ली की गलियां और सड़कें बार-बार याद आ रही थीं। मुझे यही लग रहा था कि दिल्ली में एक बार फिर मुझे नये सिरे से शुरुआत करनी होगी। दिल और दिमाग को सुकुन देने के लिए मैं रास्ते भर सिगरेट पीता रहा और अपने साथ के बोगी में बैठे सैनिकों के चेहरे पर घर लौटने की खुशी को देखता रहा। समकालीन पत्रकारिता के फॉरमेट में फिट नहीं होने के कारण मैं मानसिक तौर पर बुरी तरह से बिखरा हुआ था। ट्रेन की खिड़की के पास बैठकर आंख बंद करके जीन जैकस रूसो के जीवन के विषय में सोचने लगा। अपने मानस पटल पर उसकी जिंदगी के पन्नों को पलटते-पलटते एक सकारात्मक ऊर्जा मेरे अंदर विस्तार लेने लगी थी। रूसो के शब्दों की थपकी के साथ कब मुझे नींद ने अपनी आगोश में ले लिया, मुझे पता ही नहीं चला। समय के साथ मैं सीख चुका था कि जिंदगी जब लड़खड़ाने लगे तो उस व्यक्ति को स्मरण करो, जिसने मानव सभ्यता को एक नई दिशा प्रदान की हो। रूसो की लेखनी और उसकी जीवनी मुझे जीवन के गहरे तल तक ले जाती, जहां पर जाकर मुझे अपने आप को समेटने के लिए एक नई ऊर्जा मिलती थी। मेरे लिए रूसो अपने आप में पत्रकारिता का बहुत बड़ा लेबोरेटरी था, जिसने फ्रांस में राजतंत्र को नष्ट करने का फार्मूला दिया था।  


पत्रकार आलोक नंदन इन दिनों मुंबई में हैं और हिंदी सिनेमा के लिए सक्रिय हैं। वे मीडिया के दिनों के अपने अनुभव को भड़ास4मीडिया के पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं। पीछे के पार्ट को पढ़ने के लिए  (1),  (2), (3)(4), (5), (6), (7), (8), (9), (10), (11), (12)(13), (14) पर क्लिक कर सकते हैं। 16वां पार्ट अगले रविवार को पढ़ें।

आलोक से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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