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पत्रकारिता की काली कोठरी से (16)

Alok Nandanअखबार, शराब और किताबों में सिमटी रही जिंदगी

शाम 6 बजे जालंधर प्लेटफॉम पर उतरने के बाद मैं सीधे कपूरथला मार्ग स्थित अमर उजाला दफ्तर पहुंचा, ताकि रामेश्वर पांडे से अंतिम विदाई लेकर उसी रात दिल्ली निकल पड़ूं। मैं सीधे रामेश्वर पांडे के चैंबर में दाखिल हुआ। मेरी तरफ आश्चर्य से देखते हुए उन्होंने पूछा, ‘तुम यहां, तुम्हे तो जम्मू होना चाहिए था?’  उनकी ओर देखते हुए मैंने कहा, ‘बस, मैं आपसे मिलने मिलने चला आया। मैं वहां पर काम नहीं करूंगा।’ 

Alok Nandanअखबार, शराब और किताबों में सिमटी रही जिंदगी

शाम 6 बजे जालंधर प्लेटफॉम पर उतरने के बाद मैं सीधे कपूरथला मार्ग स्थित अमर उजाला दफ्तर पहुंचा, ताकि रामेश्वर पांडे से अंतिम विदाई लेकर उसी रात दिल्ली निकल पड़ूं। मैं सीधे रामेश्वर पांडे के चैंबर में दाखिल हुआ। मेरी तरफ आश्चर्य से देखते हुए उन्होंने पूछा, ‘तुम यहां, तुम्हे तो जम्मू होना चाहिए था?’  उनकी ओर देखते हुए मैंने कहा, ‘बस, मैं आपसे मिलने मिलने चला आया। मैं वहां पर काम नहीं करूंगा।’ 

इसके पहले कि मैं कुछ और बोलता, उन्होंने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘जाकर आराम करो, दो दिन बाद मुझसे मिलना।’ इंसान के अंदर के आवेग को वह अच्छी तरह समझते थे। मेरी बातों को सुनकर उन्हें लग गया था कि उस वक्त मै आवेग में था और तार्किक तरीके से निर्णय लेने की स्थिति में न था। अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने बड़े सलीके से मुझे दो दिन के लिए रोक लिया।

जालंधर में एक बार फिर मैं अनिल गुप्ता के कमरे पर रुक गया। उसके कमरे पर पड़ा-पड़ा दो दिन तक मैं लगातार पीता रहा और तमाम तरह की बातें सोचता रहा। दिल्ली के वीर अर्जुन में मैं सहज था और बेहतर कर रहा था। खबरों से लेकर संपादकीय पेज तक पर मेरी उपस्थिति होती थी, लेकिन अमर उजाला में मैं फ्लॉप हो चुका था। या तो कमी मेरे अंदर थी या फिर अमर उजाला के अंदर। अपनी कमियों की तलाश करने की कोशिश करता तो यही लगता था कि पत्रकारिता को लेकर जो आदर्श मैने बना रखा था, वही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी। मेरे दिमाग में बना पत्रकारिता का मॉडल ही मेरी नाकामी का कारण था। लेकिन इस मॉडल से इतर जाकर मैं पत्रकारिता करने की स्थिति में बिलकुल नहीं था। पत्रकारिता को लेकर बुने गए मेरे सपने मेरे कैरियर को निगल रहे थे। लेकिन राजेंद्र तिवारी की कार्यप्रणाली पर गंभीरता से विचार करने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुंचता था कि मैं अपनी जगह पर पूरी तरह से सही था। एक व्यक्ति विशेष की सोच के अनुरूप कार्य न कर पाने से मैं अपने आप को असफल मानने के लिए कतई तैयार नहीं था। अंतिम सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन उस वक्त वोदका की बोतलें खाली करते हुए इन बातों को अपने दिमाग से मैं जितना झटकने की कोशिश करता, वो उतनी ही हावी होती जाती थी।     

दो दिन बाद एक बार फिर रामेश्वर पांडे के सामने अपने इस्तीफे के साथ हाजिर हुआ। इसके पहले की मैं उन्हें इस्तीफा सौंपता, उन्होंने मुझे बैठने के लिए कहा और पूछा, ‘पहले यह बताओ कि जम्मू में तुम्हारे साथ हुआ क्या?’

मैंने सहजता से कहा, ‘मैं कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं हूं। मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं वहां काम नहीं करूंगा।’

‘पंजाब में रिर्पोटिंग करोगे?’

‘नहीं, मैं जम्मू-कश्मीर में रिपोर्टिंग करना चाहता था, पंजाब में नहीं।’

‘यहां ऑफिस में मेरे साथ रहोगे?’  उन्होंने पूछा।

‘हां, रह लूंगा।’

‘ठीक है। नवीन पांडे के साथ सिटी डेस्क पर आ जाओ। लेकिन एक बार फिर मैं तुमसे पूछता हूं कि जम्मू तुमने क्यों छोड़ा। वहां राजेंद्र तिवारी को बताया था या फिर ऐसे ही वहां से निकल पड़े थे?’

‘मैंने उन्हें बता दिया था कि मैं जा रहा हूं।’

‘मैंने तुम्हारे अंदर उत्साह देखा था, एक जज्बा था,  इसलिए रखा था। जाओ सिटी डेस्क पर काम करो।’

‘कल से करूंगा।’

‘ठीक है।’

ऑफिस से निकलने के पहले मैंने नवीन पांडे से मुलाकात की और उन्हें बताया कि मुझे कल से उन्हीं के साथ काम करने के लिए कहा गया है। उन्होंने हंसते हुए मेरा स्वागत किया और जम्मू के विषय में तमाम तरह की बातें पूछने लगे। कुछ का जवाब दिया, लेकिन राजेंद्र तिवारी के संबंध में पूछी गई बातों को टाल गया। वहां से निकलने के बाद एक बार फिर जालंधर के एक मटमैले शराबखाने में पहुंचा और देर रात तक पीता रहा। रात को अनिल गुप्ता भी कमरे पर शराब की एक बड़ी बोतल के साथ लौटा और मेरे जालंधर में ठहर जाने की खुशी का जश्न धूमधाम से मनाया गया। 

उस वक्त नवीन पांडे के साथ जालंधर डेस्क पर चार लोग काम कर रहे थे, पांचवे व्यक्ति के रूप में मैं भी उनकी टीम में शामिल हो गया। चूंकि जम्मू जाने के पहले नवीन पांडे के साथ उनके डेस्क पर काम चुका था, इसलिए उनके साथ आसानी से तालमेल बैठ गया। मेरी हिन्दी डेस्क पर काम करने के अनुकूल नहीं थी। अपनी भाषा को दुरुस्त करने के लिए मैं सुबह उठकर हिन्दी व्याकरण की एक किताब पढ़ता था।   
करीब पांच महीने तक मैं रुटीन से सिटी डेस्क पर काम करता रहा। इस दौरान अनिल गुप्ता ने अमर उजाला के लैंडलोर्ड से सेटिंग करके उसके दो मंजिले बंगले में हम लोगों के रहने का इंतजाम कर दिया।

अमर उजाला के ऑफिस के ठीक पीछे यह ऊंची चारदीवारी के बीच एक विशाल दो मंजिला बंगला था। बंगले के निचले हिस्से में एक नेपाली दंपति अपने बच्चों के साथ रहता था। बंगले की साफ-सफाई और देखभाल करने की जिम्मेदारी इन्हीं लोगों पर थी। दिन में उस क्षेत्र की नेपाली महिलाएं बहुत बड़ी संख्या में अपने बच्चों के साथ बंगले के अंदर बैठी रहती थीं। गरीबी और भुखमरी उनके जीवन को जकड़े थे। ये सभी महिलाएं उस वक्त नेपाल में जारी माओवादी हिंसा से अपने बच्चों को बचाने के लिए यहां आई हुईं थीं। नेपाली माओवादी इनके बच्चों को जबरन उठा ले जाते और सैनिक शिविरों में डाल देते थे। जालंधर में माओवाद का साइड इफेक्ट बहुत ही घिनौना था। जालंधर के स्थानीय लोग इनके साथ रोम के गुलामों से भी बुरा व्यवहार करते थे। 

नवीन पांडे के साथ  मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। वह अक्सर मेरे कमरे पर आते और घंटों इधर-उधर की बातें होती रहती थीं। छुट्टी के दिन मैं उनके साथ शहर की ओर निकल पड़ता था। इसी तरह एक दिन शहर में भटकने के दौरान मैं साम्यवादी किताबों की एक पुरानी सी दुकान में पहुंच गया। पूरी दुकान किताबों से भरी हुई थी। एक ही किताब की कई-कई प्रतियां वहां पड़ी थीं। उस धूल भरी दुकान में चार घंटे के अथक प्रयास के बाद मैंने इतने सारे किताब उठा लिए कि उन्हें लेकर चल पाना भी मुश्किल था। चेखोव, तोलस्तोय, दोस्तोवोस्की, गोर्की, बालजाक आदि लेखकों की उन सारी किताबों को मैंने निकाल लिया था, जिन्हें अब तक मैंने नहीं पढ़ा था। इसके अलावा फिजिक्स पर बहुत सारी किताबे उठा ली थी। करीब एक साल के लिए हेवी मेंटल खुराक मैंने खरीद लिया था। अब तक अमर उजाला से की गई मेरी सारी कमाई इसी में खत्म हो गई। कुछ दिनों के लिए जालंधर में मेरी जिंदगी सिर्फ तीन चीजों में सिमट गई गई थी- अखबार, शराब और किताबें। अखबार से छूटने के बाद या तो मैं शराब पीता था या फिर किताबें पढ़ता था। अक्सर शराब और किताबें साथ-साथ चलती थीं।

बालजाक की पुस्तक ‘किसान’  पढ़ने के बाद किसानों के प्रति मेरी सोच पूरी तरह से पलटा मार गई। बचपन से भारतीय किसानों की सरलता के बारे में बहुत कुछ घोटाया गया था,  दिमाग के स्लेट से सब एक बार में साफ हो गया। किसानों की मक्कारी, व्यावहारिकता, छोटी-छोटी भौतिक चीजों को हस्तगत करने के लिए उनकी चालों को मैं बचपन में अपने परिवेश के किसानी माहौल से जोड़ कर देखने लगा था। इसके लिए मुझे अंतदृष्टि बालजाक से मिली थी। इसके बाद से मैं बालजाक की राइटिंग स्टाइल का दीवाना हो गया था। उसे खोज-खोज के पढ़ता रहा।    
दोस्तोवास्की का ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ को पढ़ने के बाद उस किताब में लिखे एक संवाद `अनंत युद्ध जिंदाबाद’ को जालंधर डेस्क पर अपने कंप्यूटर के बगल में चिपका दिया था। पहले मैंने इसे फ्रांसीसी भाषा में किताब से हू-ब-हू निकाल लिया था, लेकिन अमर उजाला के सभी लोग इसे लेकर कंफ्यूज हो रहे थे। जब  शिव कुमार क्योंकि ने मुझसे पूछा कि इसका मतलब क्या है तो मुझे लगा कि फ्रांसीसी भाषा में लिखा यह संवाद लोगों के बीच ठीक से कम्युनिकेट नहीं हो पा रहा है। मैंने तत्काल उसे हिंदी में बदल दिया। मेरे कंप्यूटर के सामने टंगा `अनंत युद्ध जिंदाबाद ‘ का नारा हमेशा मुझे उकसाता रहता था, एक अनंत युद्ध के लिए। यह नारा मेरे अंदर बुरी तरह से धंस गया था।

मेरे किताबों को चाटने की आदत से विवेक जी भी अवगत हो चुके थे। एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि जो किताबों तुम पढ़ते हो उसकी आज प्रसांगिकता है। मैने सहजता से कहा, सर किताबों की प्रसांगिकता तो हर युग में बनी रहती है। किताबों में चलने, फिरने, हंसने, बोलने और रोने वाले चरित्र विभिन्न युगों में मानव की विभिन्न दशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही अपने परिवेश में अगल-बगल के किरदारों को पहचानने की भी शक्ति देते हैं। 

उन्होंने मुझसे तोलोस्तोय का रिसरेक्शन का हिंदी अनुवाद मांगा। वह किताब मेरे पास अंग्रेजी में तो थी, लेकिन हिन्दी में नहीं। उन्होंने अंग्रेजी में पढ़ने से इनकार कर दिया।  

शराब और लिटरेचर से उबने के बाद मैं फिजिक्स की दुनिया में गोते लगाता था। बिना किसी खास उद्देश्य के फिजिक्स के सवालों को घंटों हल करता था। इस मैकेनिकल अभ्यास से दिमाग को बुरी तरह से थका देने में सुकून मिलता था। उस निर्जन बंगले में लिटरेचर और शराब के बाद फिजिक्स के सवाल ही मेरे साथी थे। बोलते तो कुछ नहीं थे, लेकिन दिमाग को अधिक से अधिक कसरत करने के लिए उकसाते रहते थे। 

इसी बीच पटियाला डेस्क पर काम करने वाले नरेंद्र जी के बगल का एक कमरा खाली हुआ और उन्होंने मुझे उस कमरे में आने के लिए कहा। अकेले में रहने के कारण शराबखोरी कुछ ज्यादा हो हो रही थी। इससे बचने के लिए परिवार वाले लोगों के बीच रहने के बारे में मैं पिछले कई दिनों से गंभीरता से सोच रहा था। नरेंद्र की बात मानकर मैं उनके बगल के कमरे में आ गया। उस आबादी वाली बस्ती में जाने के बाद मुझे इस बात का अहसास हुआ मेरे दाढ़ी और बाल बुरी तरह बढ़कर आपस में बुरी तरह से उलझे हुए हैं। जैसे-जैसे मैं गलियों से होकर उनके साथ गुजर रहा था, लोग बाग मेरी ओर आंखें फाड़ कर देख रहे थे। कमरा फाइनल होने के बाद मैं सीधे सैलून गया और अपने सिर को नाई के हवाले करते हुए कहा कि बाल छोटे करो और दाढ़ी साफ करो।

दूसरे दिन जब मैं ऑफिस में आकर अपनी जगह पर बैठा तो मेरे अगल-बगल के कई साथी मुझे पहचान नहीं पाए। प्रभात मिश्रा ने इंटरकॉम से मुख्य गेट पर इंट्री करने वाले बंदे से पूछा कि क्या मैं ऑफिस में दाखिल हो चुका हूं। उसने ना में जवाब दिया। तब प्रभात मिश्रा ने उसे बताया कि मैं अपनी सीट पर बैठा हूं। वह दौड़ते हुए मेरे पास आया और मेरे सलीके से कटे हुए बाल और दाढ़ी को देखकर हंसने लगा। लोग मुझे रामेश्वर पांडे के पास ले गये और वह भी बिना बाल-दाढ़ी में मुझे नहीं पहचान पाए। इसके बाद तो ऑफिस में हंसी और ठहाकों का दौर लंबे समय तक चलता रहा। दूसरे विभाग के लोग मेरी शक्ल देखने झुंड बना कर आ रहे थे, मानो मैं उस प्रयोगशाला में कोई नया आया जीव था।  
अमर उजाला की उस लेबोरेटरी में  काम करने वाले अन्य लोगों के साथ भी तालमेल धीरे-धीरे बैठता जा रहा था। धमेंद्र प्रताप सिंह, भूरी सिंह, प्रभात मिश्रा, कौशल किशोर, संतोष पांडे, नवीन सिन्हा, अभय, रघु आदित्य, राघव, जितेन्द्र, कुंवर जी अंजुम आदि लोगों से दुआ सलाम होने लगा था।

इस दौरान रामेश्वर पांडे संपादकीय विभाग में संगठन के स्तर पर लगातार प्रयोग करने में लगे थे। उन्होंने पंजाब के प्रत्येक जिले के लिए अलग-अलग डेस्क बना दिया था, जिसके अलग-अलग इन्चार्ज होते थे। भूरी सिंह की सत्ता पटियाला तक सिमट गई थी और नए लोग, जो पिछले कई महीनों से लगातार खबरों को रगड़ने और पेज बनवाने का अभ्यास कर रहे थे, पूरे आत्मविश्वास के साथ  फ्रंट पर आ गए थे। संपादकीय विभाग के प्रत्येक लोगों को खास तौर से पंजाब के लिए तैयार की गई अमर उजाला की एक वर्तनी दे गई थी। उसी वर्तनी के आधार पर खबरों में शब्दों का इस्तेमाल होता था।

चूंकि सिटी के अधिकतर रिपोर्टर हिंदी भाषी क्षेत्र के थे, इसलिए उनकी खबरों को लेकर कुछ खास परेशानी नहीं होती थी। लेकिन अन्य जिलों के गैर हिन्दी भाषी रिपोर्टरों की खबरों को ठीक करने में डेस्क इंचार्जों के साथ काम करने वाले लोगों के पसीने छूट जाते थे। शाम को काम शुरू होने के बाद संपादकीय विभाग में हो-हंगामा मचा रहता था।

रामेश्वर पांडे ने जनरल डेस्क को बिल्कुल अलग कर रखा था। जनरल डेस्क पर दो शिफ्ट में सात-आठ लोग काम करते थे। ये लोग एजेंसी से आने वाली अंग्रेजी खबरों का हिन्दी में अनुवाद करते थे। अखबार का मुख्य पेज बनाने की जिम्मेदारी इन्हीं लोगों पर भी। इस पेज पर रामेश्वर पांडे की कड़ी नजर होती थी, जबकि जिले भर के खबरों को हांकने की जिम्मेदारी विवेक जी पर थी। किसी भी समस्या के आने पर जिले के डेस्क इंचार्ज विवेक जी से संपर्क करते थे।

हालांकि संपादकीय विभाग के अंदर किए जा रहे इन प्रयोगों का अखबार के प्रसारण पर कुछ सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ रहा था। अमर उजाला वहां की मुख्य धारा से कटा हुआ था। बहुत बड़ी संख्या में लोग यह भी नहीं जानते थे कि अमर उजाला एक अखबार है। अखबार में काम करने वाले लोग जब बाहर किसी को बताते थे कि वे अमर उजाला में काम करते हैं तो लोग यही समझते थे कि अमर उजाला जूते बनाने की कोई फैक्ट्री है। चूंकि जिस जगह पर अमर उजाला का मुख्य कार्यालय था, वहां पर पहले कभी जूते बनाने की फैक्ट्री हुआ करती थी। लोगों के बीच यह भ्रम अभी बना हुआ था कि वहां पर जूते बनते हैं। ब्रांडिंग के स्तर पर अमर उजाला कमजोर पड़ रहा था। इस बात का एहसाह वहां पर काम करने वाले सभी लोगों को था।

पंजाब के लोग पंजाब केसरी को पढ़ने के आदी थे और उनकी चाय की शुरुआत पंजाब केसरी के साथ होती थी। निशिकांत ठाकुर के नेतृत्व में दैनिक जागरण प्रचार के स्तर पर बमबारी करने के बाद पंजाब के लोगों के बीच सेंध लगाने में लगा हुआ था, लेकिन पंजाब केसरी के पाठकों को छीनने में उसे भी कामयाबी नहीं मिल रही थी। वैसे, दैनिक जागरण की पहचान एक अखबार के रूप में पंजाब में तेजी से बनती जा रही थी।
जिस तरह से दैनिक जागरण प्रचार संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए अपने आप को एक बड़े ब्रांड के रूप में पंजाब में स्थापित करने में लगा हुआ था उसे देखकर अमर उजाला में काम करने वाले लोग भी उसकी ओर आकर्षित हो रहे थे। रामेश्वर पांडे बड़ी कुशलता से वहां के लोगों को अपने से बांधे हुए थे, हालांकि दोनों अखबारी संगठनों में काम करने वाले कई लोगों के तार अंतर खाते जुड़े हुए थे, और अक्सर पत्रकारों के मोल-भाव की बातें भी सुनने को मिलती थी। लेकिन यह सब कुछ अंडर करेंट चल रहा था, गुप्त रूप से। हालांकि इसकी भनभनाहट पंजाब के पत्रकारिता की हवा में तैर रही थी।


पत्रकार आलोक नंदन इन दिनों मुंबई में हैं और हिंदी सिनेमा के लिए सक्रिय हैं। वे मीडिया के दिनों के अपने अनुभव को भड़ास4मीडिया के पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं। पीछे के पार्ट को पढ़ने के लिए  (1),  (2), (3)(4), (5), (6), (7), (8), (9), (10), (11), (12)(13), (14), (15) पर क्लिक कर सकते हैं। 17वां पार्ट अगले रविवार को पढ़ें।

आलोक से संपर्क [email protected]   के जरिए किया जा सकता है।

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