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पत्रकारिता की काली कोठरी से (18)

Alok Nandanवोदका के नशे में पाकिस्तानी सैनिकों के बीच फंसा

जालंधर में अमर उजाला की लेबोरेटरी में खबरों, हेडलाइनों और ले-आउट से लगातार उठापटक करने के दौरान ताजी हवा की चाहत मुझे अक्सर पंजाब के दूर-दराज के इलाकों तक खींच ले जाती थी। सड़क पर खड़ा होकर किसी भी चलती हुई सवारी गाड़ी को हाथ देकर उसमें सवार हो जाता, यह जाने बिना कि वह मुझे कहां ले जाएगी। देर रात गये किसी छोटे-मोटे कस्बे में उतर जाता। किसी छोटे से सराय में हल्की सी नींद खींचता।

Alok Nandanवोदका के नशे में पाकिस्तानी सैनिकों के बीच फंसा

जालंधर में अमर उजाला की लेबोरेटरी में खबरों, हेडलाइनों और ले-आउट से लगातार उठापटक करने के दौरान ताजी हवा की चाहत मुझे अक्सर पंजाब के दूर-दराज के इलाकों तक खींच ले जाती थी। सड़क पर खड़ा होकर किसी भी चलती हुई सवारी गाड़ी को हाथ देकर उसमें सवार हो जाता, यह जाने बिना कि वह मुझे कहां ले जाएगी। देर रात गये किसी छोटे-मोटे कस्बे में उतर जाता। किसी छोटे से सराय में हल्की सी नींद खींचता।

इसके बाद दिन भर उस इलाके में भटकने के बाद देर रात तक वापस जालंधर लौट आता। मैं पंजाब की सरजमीं को पूरी तरह से समझना चाहता था। पंजाब के दूर-दराज के सीमाई इलाकों में भटकते हुये मैं इतिहास की गड़गड़ाहट को सुनने की कोशिश करता। उन गीतों को हवाओं में पकड़ने की कोशिश करता, जिसे गाते हुये यहां के लोगों ने सैकड़ों वर्ष पूर्व आक्रांताओं से पंजे लड़ाये थे। जालंधर में रहने के दौरान इस तरह अकेले भटकने का सिलसिला अनजाने में भारत की सीमा पार करके पाकिस्तानी सैनिकों के हाथों में पड़ने तक चलता रहा।    

एक दिन शाम के वक्त कंप्यूटर पर बैठने की इच्छा नहीं हुई। ऑफिस के बाहर से ही रामेश्वर पांडे को फोन कर दिया, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है, मैं डॉक्टर के पास जा रहा हूं। कुछ देर तक इधर-उधर भटकने के बाद एक छोटी-सी ट्रॉली में सवार हो गया। ड्राइवर को बताया कि मैं बस यूं ही घूमना चाहता हूं, जहां तक तेरी गाड़ी जा रही है, मुझे ले चलो। गाड़ी सड़कों पर लंबे समय तक हनहना कर भागती रही। एक सुनसान जगह पर आकर उसने गाड़ी रोक दी। बोला- अब मैं अपने गांव के करीब आ गया हूं। तूसी इथे ही उतर जाओ। उसने मुझे अपने साथ गांव चलने को भी कहा, लेकिन आसमान में बादलों के साथ अटखेलियां करते चांद को देखकर मैंने वहीं उतरने का निर्णय किया। उस एकांत वातावरण का मैं पूरी तरह से मजा उठा चाहता था। मेरे मस्तिष्क में मैक्सिम गोर्की का किरदार कोनवालोव हावी हो गया, जो इनसानी बस्ती से दूर किसी निर्जन स्थान पर रहने की कामना करता। रास्ते में खरीदी वोदका की बोतल मेरे हाथ में थी। कोनवालोव की मानसिकता को मैं पूरी तरह से जीने के लिए लालायित हो रहा था। उस ट्रॉली ड्राइवर से विदा लेकर मैं सुनसान रास्ते पर अकेले चलने लगा।

वोदका गटकते-गटकते चांद की सुंदरता में फंस कर मैं किधर जा रहा था, मुझे होश न था। हर घूंट के बाद हंसते-इठलाते चांद को देखता। लग रहा था जैसे वह मेरे साथ-साथ चल रहा हो। उसको निहारते-ताकते काफी दूर निकल आया। अचानक मेरी नजर एक पेड़ पर टंगी तख्ती पर पड़ी। उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था, इधर आम आदमी का आना मना है। मैंने तुरंत अपनी दिशा बदल ली। उस तख्ती की विपरीत दिशा की ओर चल पड़ा। वोदका की बोतल खाली हो चुकी थी। उसे फेंक दिया। चांद मेरे साथ चल रहा था। अचानक अंधेरे को बेधती हुई एक आवाज मेरे कानों से टकराई…’रुक जाओ’।

आवाज की दिशा में मैंने देखने की कोशिश की। इसके पहले कि मैं कुछ समझ पाता, पांच-छह लोग मुझे चारों तरफ से घेर चुके थे। उनके हाथों में हथियार थे। उनमें से एक मेरे पास आया। रौबदार आवाज में पूछा, ‘कौन हो? कहां से आ रहे हो?’

उनके सवाल के जवाब में मैंने भी सवाल पूछे, ‘पहले यह बताओ कि तुम लोग कौन हो? और मैं इस वक्त कहां पर हूं?’

चांद की रोशनी में मेरे चेहरे की ओर देखते हुये उस बंदे ने कहा, ‘बेटा, इस वक्त तुम पाकिस्तान में खड़े हो।’

मुझे लगा जैसे मैंने उसके शब्दों को ठीक से सुना नहीं। मैंने अपने प्रश्न फिर दोहराये। मेरे पास आकर वह मेरे कमर और जेब को टटोलने की कोशिश करने लगा।

मैंने उसे रोकते हुये कहा, ‘मैं एक पत्रकार हूं। यदि मैं सीमा पार आ गया हूं तो मेरे शरीर को हाथ लगाने के पहले मेरा मेडिकल चेकअप कराओ। इससे बाद ही मेरे शरीर को हाथ लगाना।’

उसने कहा, ‘सब हो जाएगा, पहले पता तो चले कि तुम हो कौन?’

मैं पूरी तरह से वोदका के रंग में था। अपने आप पर नियंत्रण करते हुये मैंने कहा, ‘मुझे एक सिगरेट चाहिए। सिगरेट पीने के बाद ही मैं कुछ बोलने की स्थिति में आ पाऊंगा।’

मुझे सिगरेट तो नहीं मिली, लेकिन गालियों की भाषा में बात करते हुये उन लोगों ने पाकेट से सारे कागज निकाल लिये और जूते उतार कर मुझे अपने साथ चलने के लिए बाध्य किया। उनके कहे मुताबिक मैं उनके साथ हो लिया। करीब आधे घंटे तक चलने के बाद मैं उनके साथ एक मजार के पास खड़ा था। मुजे मजार के पास बैठने की हिदायत देते हुये लोग मेरे सारे कागजों के साथ अंधरे में गायब हो गये। उन कागजों में मेरा अमर उजाला का पहचान पत्र भी था। हालांकि मेरे आसपास कोई मौजूद न था, लेकिन मुझे इसका पूरा अहसास था कि उन लोगों की आंखें मुझ पर कहीं दूर से टिकी हैं।

वोदका के नशे में मैं सहज तरीके से कुछ भी सोच पाने की स्थिति में न था। थोड़ी देर में वे लोग फिर मेरे सामने आये। मेरे सारे कागजों को मेरे हवाले करते हुये उनमें से एक ने कहा, ‘तेरी किस्मत अच्छी है। ये पकड़ कागज और ये सामने का जो रास्ता है, उस पर चलता चला जा। जितनी जल्दी हो सके यहां से निकल ले। और हां, यदि तुझे गोली लगती है तो यह अपनी जिम्मेदारी नहीं होगी।’

उसके शब्दों के अर्थ को तौलने की कोशिश करते हुये कहा, ‘अभी रात है, सूरज निकल जाने दो, फिर मैं चला जाऊंगा।’

उसने जोर देते हुये कहा, ‘बात को समझ और निकल। यह हम लोगों का क्षेत्र है। हमें हुकुम मिला है कि तुझे सिर्फ अपने क्षेत्र से निकाल दूं। आगे तेरी किस्मत। यदि दूसरी गश्ती टुकड़ी के हाथ में पड़ गया तो तू जान। बस यहां से जल्दी निकल। अभी हाल में ही एक विदेशी पत्रकार मारा गया है। अपने क्षेत्र में कोई हंगामा नहीं चाहिए। बस निकल ले।’  

अनमने ढंग से उठकर मैं उसके बताये हुये पगडंडी पर चल पड़ा। काफी देर तक चलने के बाद कुत्तों के झुंड से सामना हुआ। कुत्तों को कमांड में लेने की तरकीब मुझे आती थी। मैं जानता था कि देसी कुत्तों से अंग्रेजी में कुछ कहने पर वे भोंकना बंद कर देते हैं। इस आजमाये हुये नुस्खे का इस्तेमाल करते हुये वोदका के नशे में मैं कुत्तों को तमाम तरह के आदेश देता रहा। मेरी बातों को सुनकर कुत्ते पीछे हट गये। उन कुत्तों को देखकर मुझे इस बात का अंदाजा हो गया था कि मैं किसी गांव के नजदीक हूं। तभी अंधरे में धीरे-धीरे करके दूर से एक रोशनी सरकते हुये मेरी ओर आ रही थी। जैसे-जैसे वह रोशनी नजदीक आती गई, मुझे इस बात का अहसास होता गया कि वह एक ट्रैक्टर है। उस ट्रैक्टर पर चारा लदा हुआ था और उसमें ड्राइवर सहित दो लोग बैठे हुये थे। 

मुझे देखते ही उन्होंने ट्रैक्टर धीरे कर दी। फंसी हुई आवाज में मैंने उनसे पूछा कि मैं कहां हूं तो ड्राइवर ने बताया कि इस वक्त मैं सीमा से थोड़ी दूरी पर हूं। यह सीमा से सटा हुआ फिरोजपुर का एक गांव है। मैंने उससे कहा कि मुझे मुख्य सड़क पर जाना है। उसने तत्काल मुझे अपने साथ ट्रैक्टर पर बिठा लिया। मेरा शरीर अभी ठंड से कांप रहा था। मेरे सिगरेट मांगने पर उसने मुझे बीड़ी जलाकर दी। बीड़ी का कश खींचते हुये मैंने संक्षेप में उसे अपनी कहानी बताई। उसने कहा कि पौ फटने के पहले उसे चारा लेकर मंडी में पहुंचना है। मुझे वह मुख्य सड़क पर छोड़ देगा वहां से मुझे जालंधर के लिए गाड़ी मिल जाएगी।

कुछ देर के बाद उसने मुझे एक बड़ी सी सड़क पर छोड़ दिया। खुले आसमान के नीचे मैं ठंड से बुरी तरह से कांप रहा था। मेरा शरीर पूरी तरह से बर्फ बन चुका था।

कहीं दूर लाउडस्पीकर से गुरुवाणी की आती हुई आवाज मेरे कानों से टकराई। अपनी पूरी शक्ति को समेटकर मैं उस आवाज की ओर बढ़ चला। मुख्य सड़क के किनारे यह एक बड़ा सा गुरुद्वारा था। गुरुद्वारा में कदम रखते ही एक महिला ने मुझे जूते निकालने को कहा। एक अन्य महिला ने मुझे अपने सिर पर रखने के लिए एक कपड़ा दिया। इस बीच दूसरी महिला बड़ी तल्लीनता से मेरे जूते साफ करती रही।

गुरुद्वारे के अंदर प्रवेश करने के बाद गद्दी पर बैठे हुये एक सरदार पर मेरी नजर गई, जो बड़ी तल्लीनता से गुरुवाणी का पाठ कर रहा था। एक दो लोग उसके सामने बैठे हुये थे। मैं भी एक कोने में जाकर चुपचाप अपनी आंखें बंद करके बैठ गया। थोड़ी ही देर में एक महिला मेरे लिए एक बड़े से गिलास में चाय लेकर आई। चाय की चुस्कियों के साथ ही मेरे शरीर के अंदर घुसी हुई ठंडक जाती रही। बिना कुछ जाने समझे मेरी हालत को देखते हुये उस महिला ने मुझसे वहां पर थोड़ी देर आराम करने को कहा। लेकिन चाय पीने के बाद मेरे मन और शरीर में थोड़ी ताजगी आ गई थी।

दुआ सलाम के बाद मैं उस गुरुद्वारे से निकल पड़ा। एक जीप में बैठकर जालंधर लौटने के दौरान मैं रास्ते में आंखें बंद करके पिछली रात बीती इस घटना के विषय में सिलसिलेवार तरीके से सोचता रहा। अपने कमरे में आकर मैं निढाल हो गया। कई घंटे तक सोने के बाद जब मेरी आंख खुली तो मेरा पूरा शरीर दुख रहा था और मेरे पांव बुरी तरह से सूजे थे।

 बाद में इस बात की चर्चा जब मैंने रामेश्वर पांडे से की तो वह चौंक पड़े। उन्हें मेरी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। अपने चैंबर मे टंगे पंजाब के नक्शे पर मेरे बताये मुताबिक उस जगह की तलाश करते रहे। वहां पर काम करने वाले अन्य लोगों को भी इस घटना की जानकारी हो गई थी। कई दिन तक लोगों के बीच इसको लेकर चर्चाएं होती रहीं। अधिकतर लोगों को इस बात का यकीन नहीं हो पा रहा था कि मैं पाकिस्तानी सैनिकों के चंगुल में फंसकर निकल आया हूं। उस घटना को याद करते हुये आज भी मेरे बदन में एक सरसराहट सी दौड़ पड़ती है।

इस घटना के बाद से अकेले आवारागरदी करने की आदत पर कुछ दिन के लिए विराम लग गया। इधर लेबोरेटरी में भी मेरा स्थान बदल दिया गया। मुझे धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के साथ होशियारपुर डेस्क पर बैठा दिया गया। इसके पहले धर्मेन्द्र प्रताप सिंह से दुआ सलाम होती रहते थी, लेकिन उन्हें नजदीक से जानने का कभी अवसर नहीं मिला था। उनको कविताओं से खास लगाव था। एक बार उन्होंने अपने घर पर ही एक काव्य सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें लेबोरेटरी के सभी लोग आमंत्रित थे। दिन रात अखबार की दुनिया में एक ही तरह के काम करने के दौरान यह स्वाद बदलने वाली बात थी। काव्य सम्मेलन में सुनाई गई रचनाओं का स्तर उम्दा था। वहां मकान और खाने के लिए संघर्षरत पत्रकारों का शानदार चित्रण राघव ने अपनी कविता में की थी। वहां के कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति पर मैंने भी एक कविता सुनाई। वहां पर मौजूद लोगों के उत्साह को देखकर रामेश्वर पांडे ने भी एक कविता सुनाई। उस कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं…

हां, तुममे और मुझमे फर्क है दोस्त !

तुम इनसान की तरह रहते हो और जानवर की तरह सोचते हो,

और मैं जानवर की तरह रहता हूं और इनसान की तरह सोचता हूं ।

हां,  तुममे और मुझमें फर्क है दोस्त ।

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के साथ काम करने के पहले उनकी साहित्यिक रुचियों के विषय में मैं बहुत कुछ सुन चुका था। काम के दौरान ले-आउट पर उनकी कल्पनाशीलता को देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया। खबरों के बजाय वह पेज के लुक पर ज्यादा जोर देते, और निःसंदेह उनकी पेज मेकिंग स्टाइल का जवाब नहीं था। उनके साथ काम करते हुये मेरी पूरी कोशिश हेडलाइन को बारुदी बनाने की होती थी। काम को लेकर हम दोनों का आपसी तालमेल बहुत शानदार था और यह बहुत जल्द ही डिसप्ले बोर्ड पर दिखाई देने लगा।

शिव कुमार विवेक प्रत्येक दिन चुनिंदा हेडलाइनों की एक सूची बनाकर लेबोरेटरी के अंदर डिसप्ले बोर्ड पर टांग देते थे। स्थिति यह हो गई कि उनके द्वारा चुनी गई 10 हेडलाइनों में 7 होशियारपुर डेस्क की होती, जिन्हे मैं बनाया करता था। सूची में अपने द्वारा बनाई गई हेडलाइन को देखकर खुशी होती। हेडलाइन को लेकर धर्मेन्द्र प्रताप सिंह मुझ पर पूरी तरह से विश्वास करते। मैं भी खुले दिमाग से हेडलाइन को अधिक से अधिक आकर्षक बनाने में शक्ति झोंके रहता। मेरे बनाये हेडलाइन पर जब वह ठिठकते तो सीधे शिव कुमार विवेक से संपर्क करने को कहते और शिव कुमार विवेक रामेश्वर पांडे की केबिन की ओर भागते। अपनी हेडलाइन को जस्टीफाई करने के लिए मुझे कई बार रामेश्वर पांडे की केबिन में खड़ा होना पड़ा। कुल मिलाकर धर्मेंद्र प्रताप सिंह के साथ अपनी अच्छी ट्यूनिंग बैठ गई थी।


आलोक नंदन इन दिनों मुंबई में हिंदी सिनेमा के लिए सक्रिय हैं। वे मीडिया के दिनों के अपने अनुभव को भड़ास4मीडिया के पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं। पीछे के पार्ट को पढ़ने के लिए (1),  (2), (3)(4), (5), (6), (7), (8), (9), (10), (11), (12)(13), (14), (15), (16), (17) पर क्लिक कर सकते हैं। 19वां पार्ट अगले हफ्ते पढ़ें।

आलोक से संपर्क [email protected]  के जरिए किया जा सकता है।

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