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‘जिसे लेना हो वो ले और जिसे ना लेना हो वो ना ले’

नोएडा के पत्रकार और सौ के नोट से संबंधित खबर पर दो टिप्पणियां आई हैं। एक बेहद छोटी और चुभने वाली टिप्पणी है तो दूसरी काफी लंबी चौड़ी और समझाऊ। पहली टिप्पणी देहरादून से मेल के जरिए भेजी गई है। इसे लिखा है संजय पाठक ने। दूसरी टिप्पणी भोपाल से मनोज कुमार ने मेल किया है। आइए, दोनों टिप्पणियों के मर्म को समझें-

नोएडा के पत्रकार और सौ के नोट से संबंधित खबर पर दो टिप्पणियां आई हैं। एक बेहद छोटी और चुभने वाली टिप्पणी है तो दूसरी काफी लंबी चौड़ी और समझाऊ। पहली टिप्पणी देहरादून से मेल के जरिए भेजी गई है। इसे लिखा है संजय पाठक ने। दूसरी टिप्पणी भोपाल से मनोज कुमार ने मेल किया है। आइए, दोनों टिप्पणियों के मर्म को समझें-


पहली टिप्पणी :

जिसे लेना हो वो ले और जिसे ना लेना हो ना ले

पैसे देकर खबर छपवाने का काम तो हमेशा ही होता रहा है। दिल्ली में जनपथ और प्रेस के दफ्तरो में फोटोग्राफर के जरिये अखबार के स्तर अनुसार पैसे दिए जाते हैं। इसीलिये पीआर एजेंसियों का काम अब खूब चल रहा है। यह सब हर शहर का हिस्सा है। कोई चिंता जैसी बात नही है। जिसे लेना हो वो ले और जिसे ना लेना हो ना ले।

संजय पाठक, देहरादून

09719037071, [email protected]


दूसरी टिप्पणी :

खबर की कीमत तो तय होने दीजिये जनाब!

मनोज कुमार

[email protected]

किसी भी अखबार के पहले पन्ने पर लीड स्टोरी का मूल्य क्या होगा? बॉटम स्टोरी महंगी होगी या फिर सिटी पेज की स्टोरी की कीमत अधिक होती है? 9 बजे प्राइम टाइम पर प्रसारित होने वाला कौन सा समाचार किस कीमत पर बेचा जाएगा अथवा रेडियो पर प्रसारित होने वाली खबरों की भी कोई कीमत आप लगा सकते हैं? प्रधानमंत्री जी का वक्तव्य महंगा होगा या बिपाषा बसु के बारे

में बतायी जा रही खबर की भी कोई कीमत हो सकती है? आप सोच रहे होंगे कि यह कैसा सवाल है- भला खबर की भी कोई कीमत आंकी जा सकती है? मैं भी आपकी तरह ही सोचता हूं कि पत्रकारिता कभी भी व्यावसायिक नहीं हो सकती है किन्तु जब सब तरफ ढोल पीटा जा रहा है कि पत्रकारिता व्यावासायिक हो गई है तब यह सवाल जरूरी हो जाता है। मुझे यह भी नहीं मालूम कि मेरी इस राय से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं लेकिन मेरी अपनी राय है कि पत्रकारिता न तो आजादी के पहले व्यावसायिक थी और न आज व्यावसायिक हुई है। तकनीक के विस्तार के साथ समाचार पत्रों की छपाई का खर्च बढ़ता गया और पाठक को उपभोक्ता बनाकर उन तक पहुंचने के लिए समाचार पत्रों ने बाजार को माध्यम बनाया। कुछ यही हाल टेलीविजन और रेडियो का भी है। मीडिया के संसाधनों का व्यावसायीकरण हुआ और इसे बता दिया गया कि पत्रकारिता व्यावसायिक हो गई।

पत्रकारों का वेतन, विज्ञापनों का रेट, पृष्ठों की संख्या, अखबार का रंगीन स्वरूप, तकनीकी का विस्तार…ये सारी चीजें पिछले 20 वर्षों में तेजी से बदली और बाजार आधारित हुई हैं। पत्रकारिता का गुण-धर्म कहता है कि मीडिया  निरपेक्ष और निःस्वार्थ रूप से अपने सामाजिक और नैतिक दायित्वों का निर्वहन करेगी। और वाकई, इस बदले दौर में भी मीडिया पूरी ईमानदारी के साथ अपने काम करने में जुटी हुई है। आज तक किसी खबर की कीमत तय नहीं की गई और न ही विज्ञापन के रूप में उसकी बिलिंग की गई,  न इंच और सेंटीमीटर में नापा गया। यहां तक की तारीफ में लिखे गये लेख को इम्पेक्ट फीचर कहा गया जो भुगतान के एवज में लिखी गई है जिसमें लेखक हमेशा से गायब रहा है।

पत्रकार अरूण शौरी की रिपोर्टिंग बोफोर्स कांड की गूंज आज तक हो रही है तो स्टिंग आपरेशन से रिश्वतखोर सांसदों की कुर्सी छिन जाना भी इसी स्वतंत्र भारत की घटना है। श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए पी. साईंनाथ को मैगसेसे पुरस्कार मिलना भी इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता न तो स्वतंत्रता के पूर्व व्यावसायिक थी और न आज व्यावसायिक है और इस बात की भी आशंका नहीं है कि पत्रकारिता कभी व्यावसायिक हो पाएगी। मुझे तो लगता है कि मीडिया हाउस और पत्रकारिता को धंधा बनाने में जुटा एक बड़ा वर्ग पत्रकारिता के व्यावसायिक होने का ढोल पीट रहा है। इसके पीछे की साजिश को समझना होगा क्योंकि पत्रकारिता को व्यावसायिक होने की बात स्थापित नहीं की गई तो मैनेजर को संपादक कैसे बनाया जाएगा? आज जब चारों तरफ संपादक नाम की
संस्था की समाप्ति को लेकर रोना रोया जा रहा है, तब हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यही वे लोग हैं जो पत्रकारिता को व्यावसायिक बता कर, खबर को साबुन की टिकिया के दामों पर बेचने का भ्रम फैलाकर संपादक की जरूरत खत्म कर दी। एक बात ध्यान रखें कि जब कोई चीज, भले ही वह पत्रकारिता हो, यदि व्यावसायिक होती है तो उसे अपनी क्वालिटी पर विषेष ध्यान देना होगा। दुर्भाग्य से जो लोग पत्रकारिता को व्यावसायिक बता रहे हैं, उन्होंने पैकेजिंग तो बेहतर की है लेकिन कंटेंट पर ध्यान देना भूल गए जबकि बाजार कहता है कि पैकेजिंग के साथ गुणवत्ता भी जरूरी है। ऐसे में यह माना जा सकता है कि पत्रकारिता को व्यावसायिक बनाने की पहल जरूर तेजी से की जा रही है। यह जरूर माना जा सकता है कि पर्दे के पीछे से पत्रकारिता की आड़ में बहुत सारे सौदे हो रहे हैं और इसी को आधार बनाकर पत्रकारिता को व्यावसायिक होना मान लिया गया है। दरअसल इसे पत्रकारिता में पीत पत्रकारिता कहा जाता है। जो थोड़ा बहुत अनुभव मेरा अपना है, उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि पत्रकारिता की आड़ में कथित तौर पर लेन-देन का किस्सा पुराना है, तब क्यों पत्रकारिता के व्यावसायीकरण की बात नहीं की गई? उसे हमेशा पीत पत्रकारिता कहा गया। साथियों को यह तो याद होगा कि फिल्म न्यू दिल्ली टाइम्स की कहानी इसी पृष्ठभूमि पर थी। पीत पत्रकारिता और व्यावसायिकरण के अंतर को भी समझना होगा।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पत्रकारिता की नयी पीढ़ी के दिमाग में आरंभ से ही यह बात बिठा दी जाती है कि पत्रकारिता व्यावसायिक हो गई है और आप इसी नजर से पत्रकारिता करें। इसका नतीजा यह निकल रहा है कि पत्रकारिता को नयी पीढी नौकरी मानकर करने लगी है। पत्रकारिता की शिक्षा हासिल कर रहे कुछ नये दोस्तों से इस बारे में बात की गई तो उनका मानना था कि अखबारों अथवा टेलीविजन चैनल से जो तनख्वाह मिलती है, वह खबर के लिये मिलती है। उनसे जब इस बारे में पूछा गया कि मिसाल के तौर पर एक अखबार आपको दस हजार रूपये माहवार तनख्वाह देता है और बदले में आप दस खबर महीने में देते हैं। इस अखबार की प्रसार संख्या एक लाख प्रतियां प्रतिदिन है। इस गणित के आधार पर आपकी एक खबर की कीमत एक हजार रुपये और एक प्रति के हिसाब से दस पैसे प्रति खबर दी गई। दस पैसे की खबर और पत्रकारिता का दंभ? इस बात का जवाब मेरे नौजवान साथी के पास नहीं था। जब नये साथियों को समझाया गया कि खबर की कोई कीमत नहीं होती है बल्कि जो दस हजार रुपये आपको दिये जाते हैं, वह आपके श्रम का होता है।

नये साथियों की सोच में उनकी गलती नहीं है बल्कि इसके लिये हम सब दोषी हैं। हमने ही तय कर दिया कि पत्रकारिता व्यावयासियक हो गई है तो नयी पीढ़ी उसी हिसाब से काम करने लगी। मेरा अपना मानना है कि कदाचित पत्रकारिता में व्यावसायिकरण हो भी रहा है तो इसका पूरी ताकत से प्रतिकार किया जाना चाहिए। घर में आग लग जाए तो हाथ पर हाथ रखकर बैठा नहीं जा सकता है, उसी तरह पत्रकारिता जब व्यावसायिक हो रही है तो उसे बचाने की कोशिश तो की जा सकती है। सिर्फ चिल्लाने और रोने से पत्रकारिता में बढ़ती व्यावसायिकता नहीं रूकेगी बल्कि इसके लिये पहल करने की जरूरत होगी और सबसे पहले हमें इस बात को सिरे से, हर मंच से नकारना होगा कि पत्रकारिता व्यावसायिक हो गई है। यह काम हमने आज, और अभी से नहीं किया तो एक प्रोफेशनल कालेज से पासआउट स्टूडेंट और हमारे में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। कल और डरावना हो जाए, इसके पहले हम सबको चेतना होगा। पत्रकारिता के व्यावसायीकरण की बात मानना भी है तो थोड़ा सब्र करें दोस्त, क्योंकि पहले खबर की कीमत तो तय होने दीजिये। खबर को इंच और सेंटीमीटर में नपने तो दीजिये।


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