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क्राइम रिपोर्टर की डायरी (2)

बृज दुग्गल

 निर्भय की ऐशगाह में पहला कदम

वो सितंबर की एक अंधेरी काली रात थी। स्याह अंधेरे को चीरते हुए खेतों की बीच बनी पगड़ंडियों पर हम चले जा रहे थे। मुझसे आगे चार बंदूकधारी, मेरे पीछे भी चार लोग। बीच में मै और मेरा मुखबिर- राम सिंह। अंधेरा इतना था कि आगे चल रहा शख्स अगर अपनी रफ्तार थोड़ी तेज कर दे तो कुछ ही पलों में आखों से ओझल हो जाए। बारिश पूरे शबाब पर थी। रपटीली पगडंडियों पर गिरते-पड़ते मैं बढा जा रहा था।

बृज दुग्गल

 निर्भय की ऐशगाह में पहला कदम

वो सितंबर की एक अंधेरी काली रात थी। स्याह अंधेरे को चीरते हुए खेतों की बीच बनी पगड़ंडियों पर हम चले जा रहे थे। मुझसे आगे चार बंदूकधारी, मेरे पीछे भी चार लोग। बीच में मै और मेरा मुखबिर- राम सिंह। अंधेरा इतना था कि आगे चल रहा शख्स अगर अपनी रफ्तार थोड़ी तेज कर दे तो कुछ ही पलों में आखों से ओझल हो जाए। बारिश पूरे शबाब पर थी। रपटीली पगडंडियों पर गिरते-पड़ते मैं बढा जा रहा था।

मेरे आगे-पीछे चल रहे लोगों को परेशानी हो रही थी या नहीं, ये तो पता नहीं लेकिन मैं बुरी तरह थक चुका था। हमें चलते हुए दो घंटे से ज्यादा हो चुके थे। सब कुछ भगवान भरोसे था। रास्ता तो मुझे पता नहीं था लेकिन दिशा के आधार पर मैं अंदाजा लगा रहा था कि कुछ देर इधर-उधर घूमने के बाद हम उसी दिशा में बढ़ रहे थे जिस दिशा में हमने सफर शुरू किया था। ‘अरे भाई …कितनी देर और लगेगी’- आगे चल रहे बंदूकधारी से मैनें पूछा।

बंदूकधारी के हाथ में टॉर्च थी लेकिन वो उसे बड़े रहस्यमय अंदाज में जला रहा था। बिल्कुल जुगनु की तरह। जितनी तेजी से वो टॉर्च को जलाने के लिए बटन दबाता, उससे ज्यादा तेजी से वो उस बटन को छोड़ देता। मानों टॉर्च न हो, जुगनु हो गई। मैनें अपना सवाल दोहराया, लेकिन कोई जवाब नहीं। चलते-चलते करीब तीन घंटे बीत चुके थे। हम सिर्फ आगे ही आगे बढे जा रहे थे । मेरी हिम्मत जवाब देने लगी। मैनें फिर वही सवाल दोहराया …’अरे भाई …कितनी देर और लगेगी’। और आश्चर्यजनक रूप से इस बार जवाब आया, लेकिन बेहद धीमी आवाज में- ‘धीरे बोलो साब….आसपास और गिरोह भी विश्राम कर रहे हैं’।

इधर उसका जवाब आया और जैसे मेरे सारे सवाल, जो मैं उससे पूछना चाहता था, मेरे हलक में ही घुटकर रह गए। आसपास और गिरोह ठहरे हैं…यानि हम एक ऐसे इलाके में हैं जहां सिर्फ निर्भय का ही गिरोह नहीं है। अगर उन्होंने हमें देख लिया तो हमारी भी पकड़ हो सकती है। अब माजरा कुछ कुछ समझ में आने लगा था। हमारे साथ चल रहे बंदूकधारी निश्चित ही हमारी हिफाजत के लिए भेजे गए थे। इनका काम यकीनन हमें निर्भय के ठिकाने तक सुरक्षित पहुंचाना था। मन में तमाम सवाल उठ रहे थे और पलभर में मानों ब्रह्मांड की परिक्रमा मन खुद ही उनका जवाब भी दे रहा था।

यानि ये टॉर्च भी खास अंदाज में इसलिए जलाई जा रही है ताकि अगर कोई देखे भी तो उसे यही लगे कि जुगनु है। मन में तरह तरह के ख्याल आ रहे थे कि अचानक बायां पैर नीचे गया और अगले ही पल मैं बरसाती नदी में था। मुझे गिरते देख मेरे पीछे चल रहे आदमी ने मुझे सहारा देकर खड़ा गया । चूंकि मैं पहले से ही भीगा हुआ था इसलिए बरसाती नदी के पानी में गिरने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। नदी में पानी भी घुटने से ज्यादा नहीं था। हां, इसका एक फायदा जरुर हुआ। पीछे चल रहे एक हट्टे-कट्टे आदमी ने मुझे अपने कंधे पर उठा लिया.। मैं भी बुरी तरह थका था इसलिए मैनें विरोध नहीं किया। अब मैं दो मजबूत कंधों पर था। तन की थकान से थोड़ी राहत मिल रही थी लेकिन मन की बैचेनी बढ रही थी। इस बीच करीब 15 मिनट के सफर के बाद हम एक ऐसी जगह पहुंचे जहां रेत थी। वहां पहुंचकर उसने मुझे कंधे से उतार दिया। मुझे लगा कि हम निर्भय के अड्डे तक पहुंच गए। अबकी बार मैनें बंदूकधारी से न पूछकर, अपने मुखबिर राम सिंह से पूछा- ‘राम सिंह, पहुंच गए क्या ‘

राम सिंह ने भी कोई जवाब नहीं दिया। .इस बीच अचानक टॉर्च की तेज रोशनी के साथ ,एक भारी भरकम आवाज गूंजी- ‘कौन है’। कहीं से कोई जवाब नहीं। पहले से भयावह लग रहे सन्नाटे को हमारी चुप्पी ने और भयावह बना दिया। कुछ देर बाद वही आवाज फिर गूंजी- ‘अरे बोलत क्यों नहीं, कौन है’। अबकी बार हमारी तरफ से जवाब दिया गया- ‘हम हैं भाटा’। आवाज राम सिंह की थी। पहले से ही सवालों के चक्रव्यूह में उलझ रहा मेरा दिमाग और उलझ गया। राम सिंह खुद को ‘भाटा’ क्यों कह रहा है। इस सवाल का जवाब तो दूर जवाब का कोई ‘हिंट’ तक मेरे पास नहीं था। उधर जवाब के साथ ही एक बार फिर सवाल गूंज- ‘कौन भाटा’ ‘मालिक के भाटा’- राम सिंह ने फिर कहा।

निर्भय के साथ बृजजवाब के साथ ही एक बार फिर सन्नाटा छा रहा। ठीक उसी तरह जैसे श्मशान में मुर्दे जलने का इंतजार कर रहे हों। मुझे बेहद डर लग रहा था। हम कुल 10 लोग थे और मुझे छोड़कर किसी के चेहरे पर रत्ती भर भी शिकन न थी। राम सिंह ने तो इस बीच बीड़ी सुलगा ली। वो नीचे बैठकर बड़े इत्मीनान से बीड़ी फूंक रहा था। मानों कुछ हुआ ही न हो। मेरा मन किसी अनहोनी की आशंका से घबरा रहा था। कुछ ही देर में पता चल गया कि आशंका गलत न थी। वहां दस मिनट तक खड़े-खड़े इतना एहसास हो चुका था कि हम निर्भय के अड्डे तक पहुंच चुके हैं। जितना मेरी आंखें काम कर रही थीं उससे मुझे ये भी एहसास हो रहा था कि मेरे चारों तरफ मिट्टी के उंचे-उंचे टीले हैं। हम किसी खाई में खडे हैं। अभी ये सोच ही रहा था कि तीन तरफ से धड़धड़ाते हुए लोग आए और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, हम दस के दस लोग बंदूक की नोंक पर थे। सबसे पहले हमारे साथ आए बंदूकधारियों की बंदूके ली गईं। फिर शुरू हुआ तलाशी का दौर। सिर से पैर तक जमा तलाशी ली गई। इतनी तलाशी तो एअरपोर्ट पर भी नहीं होती। हमारी जुराबें तक उतरवा ली गईं। फिर हमें इशारा किया गया। हमारे आगे – पीछे मुंह पर नकाब बांधे बंदूकधारी और बीच में हम दस लोग। सीधी खड़ी चढा़ई। हमें ज्यादा नहीं चढ़ना पड़ा। जल्द ही हमें रोशनी की हल्की सी लकीर दिखने लगी। बारिश अब भी हो रही थी। हालांकि अब उतनी तेज न थी। मन में ढेर सारे सवाल तैरने लगे। सवालों के इन्ही समंदर के बीच मैने निर्भय की ऐशगाह में पहला कदम रखा …

चारों तरफ मिट्टी के उंचे उंचे टीले …कंटीली झाड़ियों का जंगल ….अगर बाहर से कोई देखना चाहे तो उसे सिर्फ और सिर्फ नजर आएंगी, कंटीली झाडियां ….लेकिन इन्हीं झाडियों के पीछे चौकन्नी निगाहों को पता है …जंगल के बाहर की एक एक बात …वहां से गुजरने वाले को तो कभी भी ये एहसास ही नहीं होता कि उसपर हर पल नजर रखी जा रही है …उसे तो ये भी नहीं पता चलता कि इन्हीं झाडियों के पीछे वो शख्स मौजूद है ,जिसका हुक्म ही नहीं ,इशारा भी पूरे इलाके में पत्थर की लकीर समझा जाता है … आज वो शख्स जाम पर जाम पीये जा रहा है ….एक दो …तीन…बैगपाइपर की एक बोतल खत्म हो चुकी है …..

अचानक फिजा में बेहद रोबीली आवाज गूंजती है….’अरे सब मर गये क्या ….पैग क्या तुम्हारा बाप बनाएगा।’

इधर आवाज गूंजी और उधर एक साथ ….दो सौ से ज्यादा आंखें एक जगह सिमट आईं…. मिट्टी के उन उंचे टीलों के बीच करीब 500 फुट समतल जगह। वहां एक चादर बिछी हुई है …सिर्फ एक चादर …उसी चादर पर बैठा एक शख्स, करीब 6 फुट लंबा,  कंधे तक झूलते लंबे बाल, पूरा चेहरा दाढी से ढका हुआ, लंबी घनी मूछें और बदन पर एक AK 47। सब मिलकर उसके व्यक्तित्व को बेहद रौबीला और खौफनाक बना रहे हैं …वो अकेला चादर पर बैठा है, चादर पर काफी खाली जगह है लेकिन उसके आसपास मौजूद बाकी लोग या तो खड़े हैं या जमीन पर बैठे हैं । पांच सौ फुट के इस जमीनी टुकडे पर लोगों की कोई कमी नहीं लेकिन मानो हर आदमी  भीड़ में होकर भी तन्हा है ….एक तरफ आग जल रही है …वहां कुछ ‘गंजे’ लोग खाना बना रहे हैं …पास ही कुछ लोगों को जंजीरों में जकड़े पड़े हैं …बिल्कुल गुलामों की तरह ….. कुछ लोग हाथों में बंदूक लिए बिल्ली की चौकन्नी निगाहों की तरह आसपास और वहां मौजूद हर शख्स पर नजर रख रहे हैं ….तो कुछ दूरबीन के सहारे मिट्टी के टीलों से और झाड़ियों से बाहर नजर रखे हुए हैं …

‘अरे…. दारु खत्म हो गई क्या ….तुम्हारी अईया की’  एक बार फिर उसी रौबीली आवाज ने फिजा में खौफ पैदा किया।

जैसे ही आवाज लाठी के कानों में पड़ी, गैंग का मुआयना छोड़ वो सीधे नीचे की तरफ भागा, बोतल उठाई ….और अगले ही पल निर्भय के हाथों में पैग था ….निर्भय ने भी बगैर एक पल गवाएं एक ही सांस में पूरा गिलास खत्म कर डाला…खाली गिलास, फिर लाठी के हाथ में था और वो दूसरा पैग बनाने लगा ….

‘क्यों रे लाठी….हम बूढे हो गए क्या, कोई हमारी सुनता ही नहीं’- सन्नाटे को चीरती निर्भय की आवाज गूंजी। ‘नहीं मालिक, हम उपर पहरा चेक कर रहे थे, हमारे अलावा कोई और तो आपकी दवाई को हाथ लगा नहीं सकता,  जैसे ही हमारे कानों में आवाज पड़ी हम, दौड़े चले आए’ – चेहरे पर भारी भरकम मूंछें और बंदूक की जगह बदन टार्च लटकाए शख्स के मुंह से निकला। लाठी, यही नाम है उसका। बिल्कुल लाठी की तरह लंबा …छरहरा बदन …करीब 6 फुट्टा।

लाठी के इस जवाब के साथ ही एक बार फिर माहौल में क्रबिस्तान जैसी वीरानगी छा गई …..सन्नाटे को इस बार भी निर्भय की आवाज ने ही तोड़ा…..’कौन है वो…..जो पहरे पर सो गया था’। निर्भय के इस सवाल के जवाब में किसी ने कुछ नहीं कहा, बस वहां खड़े लोगों में से एक आदमी बाहर निकला और सिर झुकाकर सीधे निर्भय के सामने आकर खड़ा हो गया। इससे पहले कि निर्भय कुछ कहे, वो गिड़गिडाया…’मालिक…गलती हो गई हमसे ….हमें माफ कर दो’।

एक बार फिर पूरी फिजा में सन्नाटा छा गया …सबसे जेहन में मानो एक ही बात चल रही हो…क्या करेगा निर्भय इसके साथ ….क्या इसे माफ कर देगा निर्भय या फिर इसकी भी जान ले लेगा ….जो इस वक्त यहां मौजूद हैं,  उनमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे मुन्नी देवी का किस्सा मालूम न हो …..वैसे भी निर्भय के साथ रहने वाला कोई भी डाकू भला मुन्नी के हश्र को कैसे भूल सकता था …..मैं सवालों के इस समंदर में डुबकी लगा रहा था तो निर्भय के मन में भी कुछ चल रहा था …. लेकिन निर्भय के मन में चल क्या रहा है मुझे इसका अंदाजा लगाने की जरुरत नहीं पड़ी….उसके हाथों में एक रिवाल्वर लहराई …सबकी सांसे, मानों हलक में अटक गईं ..

गोली चली और सबको लगा कि ये तो गया काम से …लेकिन गोली सिर की बजाय, जांघ में लगी ….’अगली बार गोली जांघ को नहीं, दिमाग को चीरेगी’- निर्भय की आवाज गूंजी। इधर गोली चली और उधर मारे खौफ के मेरी जान हलक में ही अटक गई ….मेरे साथ आए सारे लोग इधर -उधर सरक गए थे,  सिवाय मैं और राम सिंह जो एक कोने में खड़े थे …. सब सन्न थे …. pin drop silence …इस चुप्पी को भी किसी और ने नहीं, खुद निर्भय ने ही तोड़ा, उसने पिस्तौल एक तरफ फेंकी और हमारी तरफ मुड़कर बोला…’अरे तुम वहां काहे खडे हो, यहां आओ’।

इससे पहले कि मैं कोई जवाब दूं, वो खुद ही उठा …. चलते हुए मेरे पास तक आया …वो कुछ सेकेंड मेरी जिंदगी के वो पल थे, जब मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं क्या करुं, डर और एक नामुमकिन सी लगने वाली चीज को हासिल करने का एहसास एक साथ मन में तैर रहा था ….हिंदुस्तान का सबसे खूंखार डाकू, वो डाकू जिसका सर कलम करने की कीमत थी … ढाई लाख रुपये …वो डाकू जिस पर कत्ल और अपहरण जैसे न जाने कितने मुकदमे दर्ज थे …. हिंदुस्तान का वो सबसे खतरनाक डाकू, जिसे पकड़ने के लिए एक दो नहीं, तीन-तीन राज्यों, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की पुलिस, लगातार खाक छान रही है … वो डाकू मेरे सामने था। जब ये मुझसे इतनी आसानी से मिल सकता है तो भला पुलिस इसे क्यों नहीं पकड़ पाती। मन में सवालों का भंवर तैर रहा था।

सवालों के इस भंवर से मैं तब निकला जब मैनें महसूस किया कि उसने मुझे गले लगा लिया। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि अगर वो दोस्ती की पकड़ न होती तो यकीनन अब तक मेरा दम निकल चुका होता। अगले ही पल खुद को संभालते हुए मैनें भी गले मिलने में पूरी गर्मजोशी दिखाई। हालांकि गले मिलते हुए भी मैं महसूस कर रहा था कि ये गर्मजोशी पूरी तरह से बनावटी है। कम से कम मेरी तरफ से तो मैं चाहकर भी बनावट को दूर नहीं कर पा रहा था। इस बीच उसने मेरा हाथ पकड़ा और अगले ही पल मैं उसके साथ उसी चादर पर बैठा था जिस पर बैठने का हक सिर्फ और सिर्फ निर्भय को था।


लेखक बृज दुग्गल वर्तमान में आईबीएन7 न्यूज चैनल में डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं और ‘क्रिमिनल’ प्रोग्राम के एंकर हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट और 1997-98 में आईआईएमसी से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा करने वाले बृज दुग्गल ने करियर की शुरुआत ‘आंखों देखी’ से की। उसके बाद जी न्यूज,  फिर आज तक होते हुए अब आईबीएन7 में हैं। पत्रकारिता के 12 साल के सफर में दुग्गल ने समाज के कई अनछुए पहलुओं को करीब से देखने की कोशिश की। कुछ अलग, कुछ हटके करने का जुनून बृज को कभी पूर्वोत्तर के आतंकी कैंप में रिपोर्टिंग कराने ले गया तो कभी चंबल के बीहड़ में पहुंचाया।

बृज से संपर्क करने के लिए आप उन्हें [email protected] पर मेल कर सकते हैं।

इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक कर सकते हैं- (1) This e-mail address is being protected from spambots, you need JavaScript enabled to view it

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