आलोक धन्वा की नई कविताएं

कृपाशंकर चौबेसमकालीन हिंदी कविता के सुधी पाठकों के लिए यह एक अत्यंत सुखद समाचार है कि बहुपठित और बहुप्रशंसित काव्यकृति ‘दुनिया रोज बनती है’ के रचनाकार आलोक धन्वा लंबे अंतराल के बाद फिर से कविता लेखन में अपनी एक नई शुरुआत कर रहे हैं। वे १९९७ के बाद फिर कविताएं लिख रहे हैं।

बारह साल बाद आलोक धन्वा ने लिखीं चार कविताएं

[caption id="attachment_20322" align="alignleft" width="236"]आलोक धन्वाआलोक धन्वा[/caption]”हिंदी साहित्य में आलोकधन्वा की कविता और काव्य व्यक्तित्व एक अद्‍भुत सतत घटना, एक ‘फ़िनोमेनॅन’ की तरह हैं। वे पिछली चौथाई सदी से भी अधिक से कविताएँ लिख रहे हैं लेकिन बहुत संकोच और आत्म संशय से उन्होंने अपना पहला संग्रह प्रकाशित करना स्वीकार किया है और इसमें रचना-स्फीति नहीं है।

जनकवि हूं मैं क्‍यों हकलाउं

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा… चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा. जी हां, सपने में नहीं, अपितु यथार्थ में नागार्जुन के जन्‍मशती पर विमर्श के लिए महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा द्वारा पटना (ए.एन.सिन्‍हा समाज अध्‍ययन संस्‍थान) में ‘नागार्जुन एकाग्र’ पर आयोजित समारोह के दौरान साहित्‍यकारों ने उनको याद किया गया। नागार्जुन के साहित्‍य पर विमर्श का लब्‍बोलुआब था कि बाबा नागार्जुन जनकवि थे और वे अपनी कविताओं में आम लोगों के दर्द को बयां करते थे। वे मानते थे कि जनकवि हूं, मैं क्‍यों हकलाउं।

मशहूर कवि आलोक धन्वा को देखना-सुनना

[caption id="attachment_19510" align="alignleft" width="264"]आलोक धन्वाआलोक धन्वा[/caption]”हर भले आदमी की एक रेल होती है / जो मां के घर की ओर जाती है / सीटी बजाती हुई / धुआं उड़ाती हुई…” ये आलोक धन्वा की कविता है. आलोक धन्वा और उनकी कविताएं, एक दूसरे की पर्यायवाची बन चुकी हैं. आलोक धन्वा का जन्म १९४८ में मुंगेर (बिहार) में हुआ. वे हिंदी के उन बड़े कवियों में हैं, जिन्होंने 70 के दशक में कविता को एक नई पहचान दी. उनका पहला संग्रह है- ”दुनिया रोज बनती है”.

वीएन राय, ब्लागिंग और मेरी वर्धा यात्रा

[caption id="attachment_18266" align="alignnone" width="505"]विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के ठीक बगल में लिखे नाम के साथ तस्वीर खिंचवाता मैं.विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के ठीक बगल में लिखे नाम के साथ तस्वीर खिंचवाता मैं.[/caption]

वर्धा में भले सिर्फ दो, सवा दो दिन रहा, लेकिन लौटा हूं तो लग रहा है जैसे कई महीने रहकर आया हूं. जैसे, फेफड़े में हिक भर आक्सीजन खींचकर और सारे तनाव उडा़कर आया हूं. आलोक धन्वा के शब्दों में- ”यहां (वर्धा में) आक्सीजन बहुत है”. कई लोगों के हृदय में उतर कर कुछ थाह आया हूं. कुछ समझ-बूझ आया हूं. कइयों के दिमाग में चल रहीं तरंगों को माप आया हूं. दो दिनी ब्लागर सम्मेलन के दौरान विभूति नारायण राय उर्फ वीएन राय उर्फ पूर्व आईपीएस अधिकारी उर्फ शहर में कर्फ्यू समेत कई उपन्यास लिखने वाले साहित्यकार उर्फ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति, ये सब एक ही हैं, से कई राउंड में, मिल-जान-बतिया आया हूं.