बारह साल बाद आलोक धन्वा ने लिखीं चार कविताएं

[caption id="attachment_20322" align="alignleft" width="236"]आलोक धन्वाआलोक धन्वा[/caption]”हिंदी साहित्य में आलोकधन्वा की कविता और काव्य व्यक्तित्व एक अद्‍भुत सतत घटना, एक ‘फ़िनोमेनॅन’ की तरह हैं। वे पिछली चौथाई सदी से भी अधिक से कविताएँ लिख रहे हैं लेकिन बहुत संकोच और आत्म संशय से उन्होंने अपना पहला संग्रह प्रकाशित करना स्वीकार किया है और इसमें रचना-स्फीति नहीं है।

मशहूर कवि आलोक धन्वा को देखना-सुनना

[caption id="attachment_19510" align="alignleft" width="264"]आलोक धन्वाआलोक धन्वा[/caption]”हर भले आदमी की एक रेल होती है / जो मां के घर की ओर जाती है / सीटी बजाती हुई / धुआं उड़ाती हुई…” ये आलोक धन्वा की कविता है. आलोक धन्वा और उनकी कविताएं, एक दूसरे की पर्यायवाची बन चुकी हैं. आलोक धन्वा का जन्म १९४८ में मुंगेर (बिहार) में हुआ. वे हिंदी के उन बड़े कवियों में हैं, जिन्होंने 70 के दशक में कविता को एक नई पहचान दी. उनका पहला संग्रह है- ”दुनिया रोज बनती है”.