सूचना मांगने वाले खुद भी पारदर्शी बनें

सूचना अधिकार कार्यकर्ता मनीष सिसोदिया ने ‘अपना पन्ना’ (सूचना अधिकार की मासिक पत्रिका) के माध्यम से सूचना अधिकार की लोकप्रियता और इसके मार्ग में बाधा को लेकर एक सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण से यह बात सामने आई कि देश भर में सूचना के अधिकार की शक्ति से जन-जन को परिचित कराने में मीडिया ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सर्वेक्षण में 54 फीसदी लोगों ने माना कि उन्हें सूचना अधिकार कानून की जानकारी प्रिंट मीडिया से हुई। अर्थात अखबार और पत्रिकाओं ने उन्‍हें इस कानून से परिचित कराया। 09 फीसदी लोगों को इस कानून के संबंध में पहली जानकारी टीवी से प्राप्त हुई। 09 फीसदी लोग ऐसे भी थे, जिन्‍हें रेडियो ने बताया कि सूचना का अधिकार है क्या? 13 फीसदी लोगों को इसकी जानकारी किसी स्वयं सेवी संस्थान और 13 फीसदी लोगों को यह जानकारी मित्रों और सगे संबंधियों से मिली।

इंटर्नशिप के लिए सीएम, नौकरी के लिए पीएम

आशीष: गांधी की पत्रकारिता आउटडेटेड हो गई है : आदेश ने छह साल पहले गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में दाखिला लिया था। वह आने वाले दस साल में खुद को प्रभु चावला, आशुतोष, दीपक चौरसिया के आस-पास देख रहा था। गौरतलब है कि इनमें एक भी पत्रकार प्रिंट के नहीं हैं। वैसे आदेश को जल्द ही यह बात समझ आ गई कि यह क्षेत्र उसके लिए नहीं है। तकरीबन दो साल पहले उसने पत्रकारिता को तौबा कर एक आयुर्वेदिक कंपनी के दवा बेचने का काम शुरु किया। इस काम से आदेश बीस-बाइस हजार रुपए हर महीने कमा लेता है।