: गांधी की पत्रकारिता आउटडेटेड हो गई है : आदेश ने छह साल पहले गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में दाखिला लिया था। वह आने वाले दस साल में खुद को प्रभु चावला, आशुतोष, दीपक चौरसिया के आस-पास देख रहा था। गौरतलब है कि इनमें एक भी पत्रकार प्रिंट के नहीं हैं। वैसे आदेश को जल्द ही यह बात समझ आ गई कि यह क्षेत्र उसके लिए नहीं है। तकरीबन दो साल पहले उसने पत्रकारिता को तौबा कर एक आयुर्वेदिक कंपनी के दवा बेचने का काम शुरु किया। इस काम से आदेश बीस-बाइस हजार रुपए हर महीने कमा लेता है।
आदेश के अनुसार उसके इस नए काम में पत्रकारिता के पाठ्यक्रम पर खर्च किए गए सालों से प्राप्त हुआ ज्ञान उसके किसी काम नहीं आ रहा। दूसरी बात, जब वह पत्रकारिता की राह छोड़कर अपने लिए नौकरी की तलाश कर रहा था, उस दौरान उसके परिचय में पत्रकारिता की पढ़ाई का जिक्र उसके लिए बेहद खतरनाक साबित हुआ। साक्षात्कार लेने वाला उसे प्यार से बिठाता, कभी कभार कोई-कोई चाय-नाश्ते के लिए भी पूछ लेता था, लेकिन नौकरी देने को तैयार नहीं होते। कई जगहों से रटा रटाया जवाब आया, ‘इतनी अच्छी पढ़ाई की है, कोई अच्छी नौकरी करो।’
खैर, आदेश के जीवन में पत्रकारिता की पढ़ाई की कोई भूमिका आज नहीं है, यह बात समझ में आती है। चूंकि उसने पत्रकारिता छोड़कर दवा बेचने का काम अपना लिया है, लेकिन उसी के साथ पढ़कर कॉलेज से निकले और आज चैनल अखबारों में नौकरी करने वाले योगेन्द्र, गुफरान, तेजपाल, कमल, आनन्द, नितिन, मयंक, रवि और विद्यानाथ का मानना भी यही है कि उनकी नौकरी में आज वह पढ़ाई किसी काम नहीं आ रही है। जिसके लिए उन्होंने पांच साल लगाए। सिवाय इसके कि वे अपने साक्षात्कार में कह पाते हैं कि उनके पास पत्रकारिता की डिग्री है।
पत्रकारिता की पढ़ाई करते वक्त व्यवस्था बदलने का सपना देखने वाले विद्यार्थी नौकरी की तलाश करते हुए खुद बदल जाते हैं। मतलब सिस्टम को बदलने निकले छात्रों को सिस्टम बदल देती है। जो अपनी जिद पर बदलते नहीं, वे लोग हाशिए पर होते हैं। अभी आईआईएमसी का वाकया है। इस संस्थान से पत्रकारिता पढ़कर निकले छात्र आज मीडिया में शीर्ष पर हैं। शायद यही वजह थी निरुपमा पाठक के मामले को मीडिया में विशेष स्थान मिला। निरुपमा के दोस्तों का कहना था कि यह ‘ऑनर किलिंग’ का मामला है। ‘निरुपमा पाठक को न्याय दिलाने के लिए शुरु हुए मुहिम में शामिल होने से पहले छात्रों के लिए यह बहस का मुद्दा था कि इससे उनके कॅरियर को किसी प्रकार की क्षति तो नहीं होगी? यानी आंदोलन में भी सरोकार नहीं समझदारी हावी है।
यह समझदारी, सरोकारों पर सिर्फ आंदोलनों में ही नहीं पत्रकारिता में भी हावी है। निरुपमा मामले को अभी एक साल भी नहीं हुए हैं, वह अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन क्या उस मुहिम का भी अंतिम संस्कार हो गया? इस बात के लिए कोई पहल हुई कि आगे से कोई निरुपमा आईआईएमसी में इस वजह से अपने गांव/घर में फांसी पर ना झूले कि उसने किसी से प्रेम किया है। यह तो तब जब निरुपमा दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अखबार में पत्रकार थी।
दिल्ली के एक प्रतिष्ठित संस्थान से पत्रकारिता करने वाले एक छात्र को ‘सबसे तेज होने का दावा करने वाले एक राष्ट्रीय चैनल में इंटर्नशिप के लिए वाया अपने पिताजी एक केन्द्रीय मंत्री से पैरवी करवानी पड़ी। उस दौरान उसके साथियों के बीच यह जुमला मशहूर हो गया था, ‘इंटर्नशिप के लिए केन्द्रीय मंत्री तो नौकरी के लिए प्रधानमंत्री।’ आज वह छात्र अपने इसी संबंधों और काबिलियत की वजह से एक बड़े चैनल में अच्छी पोस्ट पर है। कभी कुछ इस तरह का एक सर्वेक्षण पत्रकारों के बीच होना चाहिए कि उनकी पत्रकारिता जीवन में उन्होंने जो पत्रकारिता की पढ़ाई की है, उसकी भूमिका है या नहीं? है भी तो कितनी? चैनल/अखबार में नौकरी मिलने के बाद कितने लोग संदर्भ के लिए उन पुरानी पाठ्यक्रम की किताबें उलटते हैं?
आज पत्रकारिता के छात्र अपने पाठ्यक्रम के नाम पर जो पढ़ रहे हैं, उसे देखकर यही लगता है कि यह 2010 के पत्रकारिता छात्रों के लिए तैयार पाठ्यक्रम नहीं है। इसकी उपयोगिता सिर्फ डिग्री भर की है। वहां सैद्धांतिक बातों की चर्चा अधिक है और व्यावहारिक ज्ञान के लिए गुंजाइश बिल्कुल कम। जबकि पत्रकारिता में सिद्धान्त के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान का महत्व भी बराबर है। इसलिए पाठ्यक्रम में उस हिस्से को भी बराबर तवज्जो मिलनी चाहिए। व्यावहारिक ज्ञान से जुड़ती एक यह बात भी महत्वपूर्ण है कि इसके नाम पर छात्रों को जिस इंटर्नशिप के लिए भेजा जाता है, उसकी बेगारी पर लगाम लगनी चाहिए।
ऐसा कोई भी चैनल या अखबार जो मुनाफे के लिए निकल/चल रहा हो, वहां किसी पत्रकारिता के छात्र को क्यों मुफ्त काम करना चाहिए? कम से कम इंटर्न आए छात्रों के लिए यात्रा व्यय संस्थान को देना ही चाहिए। दिल्ली-नोएडा में कई ऐसे टीवी चैनल और अखबार और पत्रिकाएं हैं, जो इन्हीं इंटर्नशिप करने वाले बच्चों के भरोसे चलती हैं। इस बात को पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हर छात्र की गांठ में बांध देना चाहिए कि बिना पारिश्रमिक लिए किसी संस्थान के लिए काम करना अपनी पत्रकारिता के साथ बेईमानी है।
आज पत्रकारिता मिशन नहीं बल्कि एक प्रोफेशन है, इस बात को पत्रकारिता के छात्र भली-भांति समझ चुके हैं। चैनल और अखबार के मालिक भी समझ चुके हैं। लेकिन शायद इसे पत्रकारिता का पाठ्यक्रम तैयार करते समय विद्वतजन नहीं समझ पाए। इसी का परिणाम है कि वे छात्रों को रुपर्ट मार्डोकों, बिरलाओं, रिलायंसों जैसे शुद्ध व्यावसायियों की मीडिया इंडस्ट्री में गणेश शंकर विद्यार्थी और महात्मा गांधी की पत्रकारिता को पढ़ाने का साहस कर पा रहे हैं। महात्मा गांधी आज आउट डेटेड हैं, देश की पत्रकारिता उन्हें मजबूरी का दूसरा नाम मान चुकी है। आज लोगों की रुचि महात्मा गांधी की नहीं बल्कि रजत शर्मा की पत्रकारिता में है। आज ‘हरिजन’ की पत्रकारिता प्रेरित नहीं करती बल्कि ‘पंजाब केसरी’ और ‘सरस सलिल’ की पत्रकारिता ट्रेंड बदलने वाली साबित हो रही है।
इसी का परिणाम है कि आज हिन्दी का एक प्रसिद्ध अखबार अपनी वेबसाइट की तरफ लोगों को आकर्षित करने के लिए संपादक की पसंद के नाम पर पोर्न तस्वीर परोस रहा है। कमाल की बात यह कि जिन वेबसाइटों और ब्लॉग्स पर उस अखबार के इस पोर्न पत्रकारिता की निन्दा की गई है, वे लोग भी अपने लेख के साथ उस अखबार की वेबसाइट से साभार उन नग्न तस्वीरों को लेना नहीं भूले। मतलब नंगई की बहती गंगा में जो जितना उतर सकता है, उतर गया। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हाथ धोकर संतुष्ट हैं।
अब यह बात पत्रकारिता के छात्रों को कैसे बताई जाए कि एक पत्रकार को आज चैनल/ अखबार में टिकने के लिए पत्रकारीय गुण से अधिक प्रबंधकीय गुण से लैस होना होगा। उसे इस बात की अच्छी समझ होनी होगी कि कौन सी खबर किस तरह की पैकेजिंग में अधिक हंगामाखेज और बिकाऊ हो सकती है। जिसने सनसनी का फंडा और खरीद-बिक्री का खेल समझ लिया, उसका भविष्य पत्रकारिता में उज्ज्वल है। यदि इन सारे विषयों को समेटकर कोई पाठ्यक्रम कुछ इस तरह तैयार हो कि पत्रकारिता समाज में उसे स्वीकृति मिल जाए तो इसे पाठ्यक्रम तैयार करने वालों के प्रबंधन कौशल की अनूठी मिसाल ही समझिए।
लेखक आशीष कुमार ‘अंशु’ स्वतंत्र पत्रकार हैं तथा इण्डिया फाउंडेशन फॉर रुरल डेवलपमेंट स्टडीज से जुड़े हुए हैं.












संजय
October 9, 2010 at 12:13 am
kai log aaj v mision ki patrkarita kar rahe hain.. unhe tabajjo v mil raha hain.
bas antar ye hain ki aap kewal partakarita ka kirishpaksh di dekh rahe hai.
sanjay
kota
saurav chaubey
October 9, 2010 at 12:40 am
patrakarita ke jis vyavstha ki aap baat kah rahe hain mai is baat se bilkul sahmat hu kyonki mai khud patrakarita ki padhai me 4 saal se jyada bitane ke baad bhi aaj sadak par thokre kha raha hoon janha jata hu sabhi internship ke liye to bulate hain par job ki jagah khali nahi hai. Internship ke dauran meri lekhan kala aur sonch par jo log meri peeth thapthapate hain unhi ko job ki baat karne par kahte hain ki abhi tumhe bahut kuch sikhne ki jarurat hai,,! Mere saath padhnewale mere mitra, jo mujhse kam mehnati aur kam gunwtta ke bad bhi aaj media me ache post par achi salary le rahe hain. mere mata-pita ne mujhe media line me jane se mana kiya tha par ye meri jid thi so chala aaya aur aaj bhi us chingari ko jalaye ja raha hoon.
ek film ke dialogue the jale ko aag aur bujhe ko rakh, aur us rakh se jo barud bani uska thora bhaag abhi bhi mere pas bacha hua hai.
And i am not quitting my struggle journey wish me good luck..!
satish singh
October 9, 2010 at 1:50 am
dear ansu ji
now adays journalism is nt defined as the expanded form of 5w1h.it has stuck on only M(money).or i can say its all abut money honey.i am topper of my institute and awarded for best writing skills and also done interns with a reputed hindi news paper at lucknow but still struggling to get a good break.i have been asked by my empoyer to find advertisements if i want my salary.i am looking for othe job with which i can survive.moral is DOOR KE DHOL HI SUHANE HOTE HAIN ISLIYE UNHE DOOR SE HI SUNNA CHAHIYE
ashwani
October 9, 2010 at 4:50 am
bhai sachai hai .per kya kar sakte ho.
bhopal
October 9, 2010 at 7:11 pm
kya wakai hamare yaha patrkarita ki padhai ki zarurat hai ya fir jo slyabus padhaye jate hai vo itne kargar hai ki insan uske bharose rozi roti chala sake kitabo me jo padhaya jata hai vo practically to bilkul kaam nhi aata aise me kya yah nhi man lena chahiye ki patrkarita ki padhai bhedchal me ho rahi hai college khul rahe hai kamane wale kama rahe hai or yaha se padhne wale student bad me bhatkte rahte hai bina kisi disa ke balki unhe ye lagne lagta hai ki unke jivan ki sabse badi galti is proffession ko chunna rahi
sushma
October 13, 2010 at 11:40 pm
baat to sach hai, kya aisa hi hota rahega, kewal hum vichar aur baate hi karenge. ya sach me kuch badlav hoga bhi…….
ATUL SAGAR
May 9, 2013 at 1:39 pm
पत्रकारिता के बारे में अपने जो बिचार रखा है उससे मै सहमत हु क्युकी आज पत्ररिता ‘पैशन’ की जगह “प्रोफेसन” बन चूका है और इतना ही नहीं समाज का आईना कहे जाने वाले पत्रकारिता आज खुद की शक्ल भूल चूका है I आज लोग पत्रकार इस लिए बनना चाहते है ताकि वो अपना रुतबा दिखा सके ये हालत न केवल शहरो में बल्कि ग्रामीण पत्रकारिता के साथ भी ऐसा ही है I