जगजीत सिंह बरास्ते अमिताभ

मैं जिस अमिताभ की बात कर रहा हूं वह बच्चन नहीं, बल्कि अपने शुक्ला जी हैं। कॉलेज में अपन से एक साल सीनियर। मोटे तब भी थे पर थोड़े कम थे। अब लंबाई-चौड़ाई कदरन एक जैसी होगी क्योंकि खाने-पीने के इंतिहाई शौकीन हैं। अपने दुबे जी खुले आम मुर्गे की टांग उड़ाते थे और कोई उनके ब्राह्मण होने का हवाला देता था तो कहते थे कि हां ‘ब्राह्मण तो हूं पर रावण के कुल का’ और जय लंकेश के नारे के साथ पुनः मुर्ग-भोज में जुट जाते थे।

मुर्दों के साथ कोई मर नहीं जाता

दिनेश चौधरी अगर मेरी याददाश्त धोखा नहीं दे रही है तो ये अनमोल वचन अशोक वाजपेयी के हैं, जो एक जमाने में खूब चर्चित व विवादित रहे थे। प्रसंग ‘भारत-भवन’  में होने वाले किसी आयोजन का था, लेकिन चंद दिनों पहले ही भोपाल में दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी हुई थी और इसी के मद्देनजर चंद अखबारनवीसों की आपत्तियों का अशोक वाजपेयी जवाब दे रहे थे। अखबारों में यह विवाद काफी दिनों तक चलता रहा था।

लोकतंत्र का डॉक्टर

दिनेश चौधरी डॉ. रमांकात दानी -जैसा कि नाम से जाहिर भी हो रहा है- पेशे से चिकित्सक हैं। रोज अनेक लोगों का इलाज करते हैं और अब तक कितनों का किया है कोई हिसाब नहीं है। इनमें से कुछ को असाध्य मानी जानी वाली बीमारियां थीं, पर धुन के पक्के डॉक्टर दानी ने अड़ियल बीमारियों को भी चलता कर दिया। मगर एक मरीज ऐसा है, जो ठीक होने का नाम ही नहीं लेता। इसकी नब्ज कई दिनों से ठीक नहीं चल रही है।

अन्ना हजारे, रामदेव व कांग्रेस- (दो)

दिनेश चौधरी: बाबा यदि अन्ना की शरण लें तो कैसा हो? : राजीव दीक्षित के संबंध में मैं फिलहाल उन्हीं प्रसंगों की चर्चा करना चाहता हूं, जिनका संबंध बाबा रामदेव से है। इसे आप काव्यात्मक न्याय या “पोयेटिक जस्टिस” कह सकते हैं कि सब कुछ होते हुए भी अहंकार के जिस दुर्गुण के कारण राजीव को बाबा की शरण में जाना पड़ा, आज बाबा भी उसी वजह से दुर्दशा के दिन देख रहे हैं।

आइए, सचिन को भारत रत्न बनाएं! (दो)

दिनेश चौधरीपाकिस्तान के साथ कोई मैच था। जावेद मियांदाद ने आखिरी गेंद में छक्का मार कर पाकिस्तान को जिता दिया। अगले दिन परम आदरणीय प्रभाष जी के अग्रलेख का शीर्षक था – ‘वे विजेता की तरह जीते, हम विजेता की तरह हारे।” इसी दौरान -शायद पाकिस्तान में ही- हॉकी की कोई प्रतियोगिता चल रही थी और भारतीय हॉकी टीम, कमोबेश इन्हीं परिस्थितियों में हालैण्ड से मैच हार गयी।

आइए, सचिन को भारत रत्न बनाएं! (एक)

[caption id="attachment_18216" align="alignleft" width="66"]दिनेश चौधरीदिनेश चौधरी[/caption]मै जानता हूं कि नक्कारखाने में मेरी चीखने की यह कोशिश महज एक बेवकूफी है, मगर मैं – आदत से लाचार – यह बेवकूफी एक बार फिर कर रहा हूं। हो सकता है कि इन पंक्तियों के पोस्ट किये जाने तक सचिन सचमुच में भारत-रत्न बन जायें। ऐसा हुआ तो यह देश का पहला मामला होगा जहां मीडिया की पैरवी की वजह से किसी को यह सम्मान दिया जायेगा। मुझे याद नहीं कि इससे पहले इस सम्मान के लिये मीडिया ने कोई दिलचस्पी दिखायी हो और बाकायदा किसी रत्न की पैरवी की हो।

यह वैकल्पिक मीडिया नहीं है तो और क्या है?

नाटक: नाट्‌योत्सव, एक छोटे-से कस्बे में : महज चालीस-पचास हजार की आबादी वाले एक छोटे-से कस्बे में होने वाले नाट्‌योत्सव की चर्चा राष्ट्रीय फलक पर किसलिये की जानी चाहिये? शायद इसलिए कि राष्‍ट्रीय स्तर का यह आयोजन बगैर किसी सरकारी सहायता के मेहनतकश जनता से एकत्र बहुत छोटी राशियों के बलबूते किया जाता है। या फिर इसलिए कि संभवतः यह हिंदी पट्‌टी का इकलौता कस्बा है, जहां नाटकों के दर्शकों का एक अपना वर्ग है और जहां बाद में आने वाले  दर्शकों को जगह नहीं मिलने के कारण मायूस होकर लौटना पड़ता है।

बटुआ लौटाने की परंपरा और संस्कृति के झंडू बाम

: अखिल भारतीय नाट्‌योत्सव 2011 :  जब सरकारें शासन का, भद्रजन अनुशासन का, कार्यपालिका प्रशासन का और मीडिया तटस्थता का ‘नाटक’ करने लगे तब नाटकों अथवा नाटककारों की क्या प्रासंगिकता रह जाती है?

बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ…

[caption id="attachment_18216" align="alignleft" width="66"]दिनेश चौधरीदिनेश चौधरी[/caption]भारत रत्न लता मंगेशकर ने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग की है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। सचिन को भारत-रत्न से नवाजने की मुहिम मीडिया ने लंबे अरसे से चला रखी है। नैनो की लॉचिंग के बाद कुछ लोगों ने रतन टाटा को भी भारत रत्न देने की बात कही थी और प्रमोद महाजन के एक वक्तव्य को बाकायदा कोट किया गया था कि गाने-बजाने वालों को भारत रत्न बहुत मिल चुका ‘अब देश की सेवा करने करने वालों’ को यह सम्मान मिलना चाहिये। उन भले आदमियों की बात उस समय मान ली गयी होती तो अब ‘भारत रत्न’ रतन का नीरा से संवाद सुनने में कितना रस मिलता?