
दिनेश चौधरी
प्रणय बाबू का चैनल इस मामले में सबसे आगे है और उनके एक संपादक ने बाकायदा यह कहा कि यूपीए सरकार को ”फीलगुड” का एहसास उत्पन्न कराने के लिये सचिन को यह सम्मान दे देना चाहिये। अब पहले जरा इसी फीलगुड पर बात कर लें। पेट्रोल के दाम पिछले छह महीनों में छह बार बढ़े हैं। शुरुआत चीनी के दाम बढ़ने से हुई थी। फिर दाल का नंबर आया जो मुर्गी से महंगी हो गयी और एक पुरानी कहावत को बेअसर कर दिया। अब प्याज, टमाटर व लहसुन में प्रतियोगिता चल रही है। उदारीकरण के बाद कई कारखानों के बंद होने के कारण मजदूरों के सड़कों पर आ जाने और किसानों की आत्महत्या के मामले को उठाना अब बोरिंग विषय हो चुका है, इसलिए इस पर कुछ न कहा जाये तो बेहतर है। ऐसे में जनता के बीच फीलगुड लाने का एक ही उपाय है कि ”भगवान” और ”महात्मा” सचिन को भारत-रत्न दे ही दिया जाये।
इन दिनों सचिन को बड़े से बड़े विशेषण से नवाजने की होड़-सी चल रही है व इंडिया टीवी ने सचिन को भगवान बनाकर एनीमेशन के जरिये पूजा-पाठ तक कर डाली है। कोई बता रहा था कि जी टीवी वालों ने सचिन को “महात्मा” बताया है और उनके बल्ले की तुलना गांधी की लाठी से की है। यही होड़ चलती रही और चूंकि अब कोई विशेषण बचा नहीं है तो कोई चैनल मजबूरी में उन्हें अपना बाप भी कह सकता है। माईबाप तो खैर वे हैं ही, क्योंकि करोड़ों के विज्ञापन दिलवा रहे हैं। तो जब ऐसी गलाकाट स्पर्धा मची हो तो फिर एनडीटीवी ही क्यों पीछे रहे?
कायदे से एनडीटीवी में यह बात आलोचना के रूप में आनी चाहिये थी कि सरकार ने अपनी नाकामी से ध्यान बंटाने के लिये रत्न के रूप में सचिन का नाम चलाया है, लेकिन यह बात सुझाव के रूप में सामने आयी है। प्रणय बाबू के इसी चैनल में विनोद दुआ और रवीश कुमार भाषण देने के अंदाज में लोगों को -और मीडिया को भी –उनके सरोकारों को याद दिलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब मामला क्रिकेट का आता है तो उनके सारे सरोकार हवा हो जाते हैं क्योंकि यह एक ऐसी मुर्गी है जो रोज सोने का अंडा देती है।
तो सोने का अंडा रोज मिलना चाहिये! सोने का अंडा हजम करने की परंपरा को भला गणतंत्र दिवस में क्यों अवकाश मिले, इसलिए अच्छा तरीका यही है कि भारत -रत्न के लिये सचिन का नाम चला दिया जाये। अब गिल्ली डंडे के इस खेल के बगैर -या इस खेल की जुगाली के बगैर- देशवासियों का खाना हजम नहीं होता है। अपच हो जाती है। खट्टी डकारें आती हैं। गिल्ली -डंडा हर हाल में चाहिये। खाने के रूप में न मिले तो चूरन के रूप मे चाहिये। पर चाहिये। हमारी प्राथमिकताओं में अब इसे सबसे ऊपर लाद दिया गया है। यही वजह है कि इस मुल्क में जिस दिन रेल-बजट आता है तो चैनलों में प्रमुखता के साथ चर्चा रेल-बजट पर नहीं होती, बल्कि सचिन के दोहरे शतक पर होती है।
एक समय था कि जब भारत और पाकिस्तान की सरकारें घरेलू मोर्चे पर अपनी नाकामियों को छुपाने के लिये बीच-बीच में सीमा विवाद को हवा दे देती थीं। क्रिकेट के खेल ने अब इस उपमाहाद्वीप में हमारी इन बेचारी सरकारों की इस समस्या को आसान कर दिया है। अब अगर अपनी सरकारों को अपने निकम्मेपन से जनता का ध्यान हटाना हो तो सबसे आसान तरीका यही है कि भारत-पाकिस्तान के बीच गिल्ली-डंडे का मैच करा दो। यह आजमाया हुआ फार्मूला है। हमारी जनतायें एक-सी गरीब व बेवकूफ हैं। हमारी समस्यायें एक जैसी हैं। हम एक ही समान मजहबी रूप से कट्टर बनने की कोशिश करते हैं। हमारा राष्ट्रवाद पाकिस्तान के मुकाबले सबसे ज्यादा उभरकर सामने आता है। हम दुनिया में किसी भी देश से पिछड़ जायें पर एक-दूसरे से पिछड़ना गंवारा नहीं करते। हम भारत-पाक के बीच गिल्ली- डंडे के मैच को मजहबी दंगों की भावना से लेते हैं और हमारे परमवीर चैनलों की भाषा इन मैंचों के दौरान बदल जाती है। वे पाक को “रौंद डालो”, “मार डालो”, “काट डालो” जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। हम भले ही किसी प्रतियोगिता में पहले ही राउंड ही में बाहर हो जायें पर हमारे चैनल दिलासा दिलाते हैं कि बाहर हुए तो क्या हुआ, अपने ”दुश्मन” से तो जीत गये! हमारा राष्ट्रवाद क्रिकेट के साथ मिलकर और निखर जाता है- “नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों मे मिलें।” भांग में धतूरा मिलाने का आपराधिक कृत्य हमारे चैनल कर रहे हैं। वे बाजार की ताकतों के साथ मिलकर जान-बूझकर पूरे देश को अमीफ की ऐसी खुराक परोस रहे हैं, जो शहरों व कस्बों की हदों को लांघकर अब टेलीविजन के जरिये देश के असंख्य गांवों तक पहुंच चुका है।
अब गांवों -कस्बों में बच्चों के सारे खेल गुम हो चुके हैं। यहां रात की रोशनी में “पेप्सी कप” क्रिकेट खेला जा है। मैच के कई दिन पहले से कयास लगाये जाते हैं। विशेषज्ञों की तरह टिप्पणियां की जाती हैं। काम छोड़कर – ये भूलकर कि मां-बाप किस तरह हाड़ तोड़कर दो जून की रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं- कई दिनों तक खेल देखा जाता है। अपनी बेरोजगारी की कोई चिंता नहीं। नौकरी मूर्ख करते हैं। बल्ला लटकाये ये गांव के लौंडे सचिन बनने का सपना पालते हैं। कस्बे की दुकानों में मैच चालू होने पर सड़क जाम हो जाती है। भिखारी तक भीख या रोटी नहीं मांगता। स्कोर पूछता है। ऐसी क्रांति भारत में गांधी तक नहीं कर सकते थे। सचिन ने कर डाली है। इसलिये वे सचमुच के रत्न हैं!
जारी….
लेखक दिनेश चौधरी जर्नलिस्ट, एक्टिविस्ट रहे हैं. सरकारी नौकरी भी की. रिटायरमेंट के बाद फिर से कई तरह के प्रयोगों में सक्रिय हैं. इन दिनों इनका पता ठिकाना भिलाई में है. उनसे [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.












sikanderhayat
January 25, 2011 at 8:59 am
lage raheye dinesh bhai aap jese log bahut kimti ha muge puri umeed ha ki ek din asa avashay aayega jab janta in thakele film or criket star or dharam guruo ko nahi balki aap jese logo ko sahi sammaan degi
Indian Citizen
January 25, 2011 at 4:02 pm
दिनेश जी, आपने सही बात को सामने रखा है.. लेकिन तूती की आवाज है..
sanjay rana
January 26, 2011 at 2:33 am
दिनेश जी सादर प्रणाम ,
आपका लेख पढ़ा सचमुच बहुत अच्छा लगा आपने सही कहा की आज का मीडिया तो विदेशी लोगों व् बाजार के लूटेरों के हाथों पूरा का पूरा बिका हुआ है उनको तो वही दिखाना है वही बोलना है जो वो दरिंदे देखना चाहते हैं, मीडिया वाले तो कठपुतली हैं बस पर सचिन की तुलना गाँधी जी से करना निरी मूर्खता है और और रही बात आज के नोजवानो की वो तो कभी सचिन बन नहीं पायेंगे पर बेकार और अपने करिअर को नष्ट करके गली के गुंडे और लूटेरे ,और कातिल जरूर बनके निकलेंगे ऐसा दिखता है इस देश का भविष्य मुझे ,
वैसे जय हिंद
surinder singh
January 26, 2011 at 11:47 am
dinesh ji apka lekh padha bahut khusi hui ki chalo media mein koi ek weakti to hai jinhone is awaz ko media ke dwara hum logo ko pahunchai
waise to jab jab sachin record torde rahe mene har baar unka naam bharat ratan ke liye recomend karta raha aur karonga ki sachin jaisa ko batsman ab is duniya mein peda nahi hoga ab aap ke madhyam se aur pure india ke citizen se request karoonga ki sachin ko bhart ratan dilwane mein koi kasar na chode
sachin ka diwana
Surinder Singh
Amritsar
Punjab
amit thakur
January 27, 2011 at 1:40 am
दिनेश जी एक बार फिर गुस्ताखी कर रहा हूं आपके लेख पर कमेंट तो नहीं करना चाहता पर करने को मजबूर हूं न तो मै सचिन का फैन हूं और न ही क्रिकेट प्रेमी बस एक अदना सा पत्रकार हूं। आपने सचिन के भारत रत्न को महंगाई, पेट्रोल के दाम और दुनिया भर की चीजों से जोड़ा है जिसका न तो कोई तर्क बनता है न ही इसमें कोई सच्चाई दिखती है। रही बात जीत और हार की तो हार से ही जीत की सीख मिलती है। मुझे नहीं पता आपकी दिलचस्पी क्रिकेट में है या नहीं लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि पिछला इतिहास उठा कर देख लीजिए क्रिेकेट और सचिन ने देश की एक नई पहचान बना दी है। एक बात और कहूंगा आप जिस तरह से सचिन के भारत रत्न पर चिढ़ रहे उस तरह पिछले रत्नों पर क्यों नहीं सवाल उठाया। इससे पहले 41 लोगों को भारत रत्न दिया जा चुका है लेकिन सही मायने में वो सब तो भारत के रत्न नहीं थे। फिर जो देश का रत्न है उसे मिलने में आपको क्यों परेशानी हो रही है।
दिनेश चौधरी
January 27, 2011 at 7:34 am
भाई अमित ठाकुर जी, कृपया बतायें कि इससे पहले किस “रत्न” को भारत रत्न बनाने के लिये मीडिया ने इस तरह की मुहिम चलायी? मैं यही बात साफ करने की कोशिश कर रहा हूं। पूरी लेखमाला पढ़ लें। अपन किसी से चिढ़ते-विढ़ते नहीं हैं। पर आप स्वयं विचार करें कि क्या क्रिकेट आज महज एक खेल है?
dahibada
January 30, 2011 at 2:23 pm
ऐसा लगता है की टीवी वाले दलाल हो गए हैं.सचिन को भारत रत्न दिलाने की दलाली करते दिखाई दे रहे हैं थू ……