आलोक धन्वा की वापसी

सुभाष राय: सुनो भाई साधो – 9 : क्या कोई सतत घटना की तरह बचा रह सकता है एक अटूट, अभंग निरंतरता में? एक ऐसे ज्वालामुखी की तरह, जो फटे तो आग उगलता ही रहे तब तक लगातार, जब तक समूची धरती एक धधकते, गुर्राते ज्वालामुखी में न बदल जाये? एक ऐसे महामेघ की तरह, जिसमें सारा समुद्र वाष्प बनकर समा गया हो कि बरसे तो बरसता ही रहे पिघलकर फटते-ढहते आसमान में धरती के डूब जाने तक?

अयोध्या की चिनगारी को हवा न दें

डा. सुभाष राय: राजनीतिक दल फायदा उठाने की फिराक में : इतिहास केवल बीता हुआ भर नहीं होता, उसकी समग्रता का प्रतिफलन वर्तमान के रूप में उपस्थित होता है। वर्तमान की भी पूरी तरह स्वतंत्र सत्ता नहीं हो सकती,  उसे इतिहास के संदर्भ में ही देखा जा सकता है लेकिन वर्तमान इतनी स्वतंत्रता हमेशा देता है कि इतिहास की गलतियों को दुहराने से बचा जा सके, कतिपय स्थितियों में उन्हें दुरुस्त किया जा सके।