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साहित्य

आलोक धन्वा की वापसी

सुभाष राय: सुनो भाई साधो – 9 : क्या कोई सतत घटना की तरह बचा रह सकता है एक अटूट, अभंग निरंतरता में? एक ऐसे ज्वालामुखी की तरह, जो फटे तो आग उगलता ही रहे तब तक लगातार, जब तक समूची धरती एक धधकते, गुर्राते ज्वालामुखी में न बदल जाये? एक ऐसे महामेघ की तरह, जिसमें सारा समुद्र वाष्प बनकर समा गया हो कि बरसे तो बरसता ही रहे पिघलकर फटते-ढहते आसमान में धरती के डूब जाने तक?

सुभाष राय: सुनो भाई साधो – 9 : क्या कोई सतत घटना की तरह बचा रह सकता है एक अटूट, अभंग निरंतरता में? एक ऐसे ज्वालामुखी की तरह, जो फटे तो आग उगलता ही रहे तब तक लगातार, जब तक समूची धरती एक धधकते, गुर्राते ज्वालामुखी में न बदल जाये? एक ऐसे महामेघ की तरह, जिसमें सारा समुद्र वाष्प बनकर समा गया हो कि बरसे तो बरसता ही रहे पिघलकर फटते-ढहते आसमान में धरती के डूब जाने तक?

एक ऐसे विराट शून्य की तरह, जिसकी ओर सब कुछ समय से भी तीव्रतर वेग से खिंचा चला जा रहा हो, उसमें समाता हुआ, विलीन होता हुआ, लगातार सारा अस्तित्व शून्य में बदल जाने या केवल शून्य शेष रह जाने तक? एक ऐसी खदबदाती झील की तरह, जो अपने किनारों को पार कर गयी हो, चारों ओर एक साथ पसरती हुई, सब कुछ लीलती हुई बढ़ रही हो हजार-हजार जलती नदियों की शक्ल में, गांव, शहर, पेड़, जानवर और आदमी को रौंदती हुई, अपने भीतर घुलाती हुई, सम्पूर्ण धरती के जलप्लावन तक? एक ऐसे विकट झंझावात की तरह, जो सब-कुछ उलट-पुलट कर दे, जो पहाड़ों को चकनाचूर कर दे, नदियों के रास्ते शहरों और बस्तियों की ओर मोड़ दे, पेड़ों को वातचक्र की गुलेलों से बरसा दे भागती, बदहवास दुनिया पर, ग्रह का सारा रस सोख ले क्षण भर में? क्या कोई घटना अपने विस्फोटक नैरंतर्य में अस्ति और नास्ति का बोध मिटा सकती है?

समझ में नहीं आ रहा कि आज मन इतना विप्लवी क्यों हो रहा है, अचानक वह महाविनाश के चिंतन की ओर क्यों बढ़ रहा है? आस-पास कहीं आलोक धन्वा हैं पर उनकी वापसी में उतनी आंच नहीं है, जितनी उसके बहाने उनके आग और बंदूक बोते शब्दों के भीतर लौटने में। यूं ही एक बार फिर उनकी रोज बनती दुनिया में चला गया तो रोज बिगड़ती दुनिया अनायास सामने आ खड़ी हुई। विष्णु खरे को सुना कहते हुए, हिंदी साहित्य में आलोक धन्वा की कविता और काव्य व्यक्तित्व एक अद्भुत सतत घटना, एक फिनामेनन की तरह है।

तब आलोक शायद एक सही आदमी के लिए जेल उड़ा देने की कविता तलाश रहे थे। वे अपने ही एक सवाल का उत्तर दे रहे थे, जिस जमीन पर मैं चलता हूं/ जिस जमीन को मैं जोतता हूं/ जिस जमीन में बीज बोता हूं/ और जिस जमीन से अन्न निकालकर/ मैं गोदामों तक ढोता हंू/ उस जमीन के लिए गोली चलाने का/ अधिकार मुझे है या उन दोगले जमींदारों को/ जो पूरे देश को सूदखोर का कुत्ता/ बना देना चाहते हैं। वे इसे कविता नहीं, गोली दागने की समझ कहते है। कभी जो समझ वे पैदा करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने अपने चारों ओर जंगल उगा लिया था, जिसके लिए वे पेड़ों के तनों में बारूद भर रहे थे, वह शब्दों में बहुत आकर्षक लगता है। आज भी समय में पीछे जाकर उगते हुए आलोक को कोई भी देखें तो भीतर एक रोशनी का धमाका महसूस कर सकता है। पर यह जितना बड़ा सच है कि वे एक बड़ा सपना जी रहे थे, उतना ही बड़ा सच यह भी है कि उनका जीना शब्दों में था और शब्दों से, वे खुद स्वीकार करते हैं, दुश्मन का कुछ नहीं बिगडता।

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वे एक सतत घटना की तरह नहीं रह सके। शब्दों से दूर उनके आस-पास, उनके भीतर कुछ ऐसा घट रहा था, जो उनके विस्फोटक सातत्य को तोड़ रहा था, अवरुद्ध कर रहा था। शब्द और जीवन साथ-साथ चलें तो रास्ते बनते जाते हैं। शब्द आगे बढ़ गये, जीवन पीछे रह गया तो सातत्य भंग हो जाता है, तब भी जब शब्द जीवन को पकड़ ही न पायें। इसे शब्दों के प्रयोग में असावधान होना या ज्यादा सावधान होना भी कह सकते हैं।  ऐसे में कवि कई बार ऐसे द्वीप में जा खड़ा होता है, जहां से आगे बढ़ने का रास्ता नहीं होता और पीछे लौटने की गुंजाइश भी नहीं। एक खामोशी में फंस जाता है। आलोक ने यह खामोशी तोड़ी तो है पर अभी वे अपने बीते हुए लम्हों की याद में कुछ तलाश रहे हैं। यह खामोशी किसी भटकाव से उपजी थी, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा पर इसके पीछे उनके स्वप्निल क्रांतिगान और धरातल की वास्तविकता का अंतराल जरूर दिखता है।

वे आग लिखते हुए जहां कूदे थे, वहां सब कुछ शायद भीगा हुआ था, नम था। वे जब शब्दों को ट्रिगर की तरह आजमा रहे थे, तब उनके आस-पास खिले कुछ फूल मुरझा रहे थे। अब इस उम्र में उन्हें उनकी गंध परेशान कर रही है। बारिश में स्त्री तक जाने की राह देखना, अपनी आवाज का अजनबीपन और खुद को आंकने  की यह कोशिश कि इस उम्र में तो लोग/ किसी नेक और कोमल स्त्री के/ पीछे-पीछे रुसवाई उठाते हैं/ फूलों से भरी डाल /झकझोर डालते हैं उसके ऊपर, अगर कुछ कहती है तो यही कि आलोक के अंदर कोई शून्य है, जो वे चाहकर भी भर नहीं पा रहे हैं। यह शून्य फिर धधकेगा, लगता नहीं क्योंकि उन्हें खुद लगने लगा है कि अब समय छीजने का है, बीतते जाने का। वे खुद संशय में हैं, दुनिया से मेरे जाने की बात सामने आ रही है, ठंडी सादगी से। कोई पछतावा है, कोई चोट है, जो अपने ही सपनों के विस्फोट से लगी है। आहत पुकार से भर जाये शायद। आलोक धन्वा की वापसी अभी तो इतनी ही है, एक भूल सुधार की तरह, एक प्रायश्चित की तरह। वे लौटे हैं तो लगा कि वे जा चुके हैं।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. girish pankaj

    July 25, 2011 at 5:21 pm

    sundar aalekh. ek diggaj ne doosare diggaj par likhaa.

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