मुझे दुष्यंत कुमार ने बिगाड़ा

मुझे बिगाड़ने में दुष्यंत कुमार का अमूल्य योगदान रहा है। दुनिया की ऐसी-तैसी करने का जज्बा मुझे उन्हीं के शेरों ने दिया, ये बात और है कि ता-उम्र नुकसान अपना ही करते रहे। तब कस्बे में ‘साये में धूप’ की एकमात्र प्रति अग्रज मित्र पांडे जी के पास हुआ करती थी जो किताबें मांगने वालों को अच्छी निगाह से नहीं देखते थे।