शुक्रिया सुप्रीम कोर्ट, आदिवासी भाइयों का दर्द समझने के लिए : इरा झा

इरा झा की पत्रकारिता में अलग पहचान है। राष्ट्रीय हिंदी पत्रकारिता में पहली ‘न्यूज वूमन‘ होने के अलावा उन्होंने रिपोर्टिंग में भी मुकाम बनाए हैं। विषेष रूप से आदिवासी-नक्सल रिपोर्टिंग में। बरसों से वह आदिवासियों की समस्याओं / संस्कृति पर लिख रहीं है। करीब तीस साल से पत्रकारिता में सक्रिय इरा झा नक्सलियों का उनकी मांद में (बस्तर के बीहड़ इलाके से) उनका इंटरव्यू कर लाईं।

इस खुलेपन के साथ इन तंग गलियों में गुजर कैसे हो?

गीताश्री ने अपने ब्लाग नुक्कड़ पर 6 अक्टूबर 2008 को इरा झा का एक लेख प्रकाशित किया है। वरिष्ठ पत्रकार इरा झा कुछ दिनों पहले तक दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली में न्यूज एडीटर हुआ करती थीं। अब वे कार्यमुक्त हैं। इरा उन पत्रकारों में से रही हैं जिन्होंने अपने समय में रिपोर्टिंग के जरिए और न्यूज रूम को लीड कर सैकड़ों लड़कियों को इस फील्ड में आने और इसकी चुनौतियों को स्वीकारने के लिए प्रेरित किया। गीताश्री के ब्लाग से इरा के पुराने लेख को यहां प्रकाशित करने का मकसद सिर्फ एक है- इरा झा के बहाने मीडिया में औरतों की स्थिति को बयान करना। आप यह लेख पढ़ना शुरू करेंगे तो पूरा पढ़ जाएंगे, इसकी गारंटी है। और पढ़ने के बाद जरूर खुद के अंदर झांकेंगे, आस-पास के माहौल के बारे में सोचेंगे, यह भी तय है। फिर देर किस बात की, शुरू करते हैं- संपादक, भड़ास4मीडिया