थोड़ा सफल हो जाओगे तो मुखबिर, दलाल या रीढ़विहीन बन जाओगे

: 2 अक्टूबर पर विशेष : अपने गांधी जी की शेष यही है पहचान, मुखिया से कलेक्टर तक को घूस का जबरदस्त प्रावधान : बापू को भूलने के कारण और गलत आर्थिक नीतियों को अपनाने से बड़े शहरों, मलिन बस्तियों और उजड़े गाँवों का देश बन गया है भारत :

महात्मा गांधी ऐसी ही मौत चाहते थे!

shesh jiआज से ठीक तिरसठ साल पहले एक धार्मिक आतंकवादी की गोलियों से महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी थी. कुछ लोगों को उनकी हत्या के आरोप में सज़ा भी हुई लेकिन साज़िश की परतों से पर्दा कभी नहीं उठ सका. खुद महात्मा जी अपनी हत्या से लापरवाह थे. जब २० जनवरी को उसी गिरोह ने उन्हें मारने की कोशिश की जिसने ३० जनवरी को असल में मारा तो सरकार चौकन्नी हो गयी थी लेकिन महात्मा गाँधी ने सुरक्षा का कोई भारी बंदोबस्त नहीं होने दिया.

‘गांधी को मरा रहने दो, यही सबसे अच्छा होगा’

[caption id="attachment_18569" align="alignleft" width="142"]लक्ष्मी चंद जैनलक्ष्मी चंद जैन[/caption]: लक्ष्मी चन्द जैन : एक साक्षात्कार : भारत वर्ष में आर्थिक नियोजन के पिछले पचास वर्षों पर गौर करते हुए लक्ष्मी चन्द जैन बताते हैं- ”हमारी प्रमुख समस्या नौकरशाही पर निर्भरता है। गांधी यह भली भांति समझते थे कि जनता की भागीदारी के बिना कोई काम नहीं किया जाना चाहिए तथा जनता की भागीदारी के बिना कोई काम सफल भी नहीं हो सकता – हम यह बुनियादी बात भूल गये।” देश के विकास के लिए होने वाले प्रयासों से गत पचास वर्षों से योजनाकार, विश्लेषक तथा बाद में शिक्षक तथा निर्माता के रूप में जुड़े लक्ष्मी चन्द जैन यह शिद्दत से महसूस करते हैं कि गांधी आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितना वे अपने जीवन-काल में थे।

After the third gun shot I saw Gandhi fall

Delhi : Walking down the memory lane, Shri K D Madan, one of the few surviving witnesses to Bapu’s assassination recollected the events that happened on the fateful evening of January 30, 1948 at the very place where the Mahatma was assassinated. Speaking in a programme organized today by Gandhi Smriti and Darshan Samiti in association with Gandhi Peace Foundation, Gandhi Nidhi, AVARD and National Gandhi Museum, in the rear lawns of the erstwhile Birla House now Gandhi Smriti, Shri Madan narrated in details those moments which history can’t forget.

ये 7 बुराइयां

गांधी जीगांधी पुण्यतिथि पर विशेष : इस वैश्विक दुनिया में बापू की पुण्यतिथि हर साल जयन्ती की तरह आती है और चली जाती है. अखबारों में चित्र दिखते हैं, कुछ लोग फूल चढ़ाते नज़र आते हैं और फिर हर साल हम गांधी से अपनी दूरी बढ़ाते ही जाते हैं. जैसे किसी कर्मकाण्डी की तरह चन्द क्षणों के लिए जुबान पर, और फिर लंबी छुट्टी. इसके अलावा कभी वो दिखते हैं प्रोडक्ट बेचने के नए हथकण्डे के रूप में. एक कंपनी के सीमेंट के विज्ञापन में टीवी पर अमिताभ बच्चन यह कहते हुए दिखते हैं कि देश छोड़कर जाने वाला विदेश में भी प्रभाव छोड़ता है. जैसे गांधी के दक्षिण अफ्रीका में सत्य के प्रयोग की तरह वो सीमेंट भी दुनिया में दिग्विजय यात्रा पर निकल पड़ी हो. कभी सियासी पार्टियों के सम्मेलनों-बैठकों में गांधी के चित्र झांकते नज़र आते हैं. गोया उनके लिए कॉस्मेटिक सरीखे भर रह गए हों बापू. तो ये है हमारी सच्चाई. सभी उनकी तस्वीर लगाते हैं, माल्यार्पण करते हैं, लेकिन व्यवहार में आचरण एकदम उलट.

Remembering Gandhi ji as a journalist

पुण्यतिथि पर विशेष : While discussing the various aspects of Gandhi ji’s epic life and times, we unconsciously either ignore or forget his invaluable contribution as a journalist. As a journalist, Gandhi ji reached out to millions of people and convinced them of his cause. His journalism belonged to an era when there was neither Radio nor television. Such was the power of his pen that whatever he said and wrote reached the farthest corners of this country and world. Mahatma Gandhi’s papers like Young India, Indian Opinion, Harijan and Navajivan, could not boast a circulation of more than a few thousand copies. But such was Gandhi’s grasp of the basics of mass communication that he ensured that his daily views on various issues reached all. There is a story as to how he became a journalist. It is said that during his heady days in South Africa, his friend and a Christian missionary, Joseph Doke suggested that he should publish a newspaper in order to reach to wider audience.