क्या भारत 2020 तक चीन से आगे निकल जाएगा?

गिरीशजी: ड्रैगन बनाम टाइगर :  नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था – ‘चीन को अभी सोने दो. यदि वो जाग गया तो भारी उथल-पुथल करेगा.’ नेपोलियन ने यह बात लगभग दो शताब्दी पहले कही थी- लेकिन इसका असर अब दिख रहा है. तभी तो दुनिया की सबसे तेज विकसित होती चीनी अर्थव्यवस्था को लेकर छपी दो रिपोर्टें इस समय खासी चर्चा में हैं. पहली है साप्ताहिक ‘द इकानॉमिस्ट’ की विशेष रिपोर्ट. इसमें संभावना जताते हुए कहा गया है कि तेजी से बढ़ते चीन के विश्व अधिपति बनने पर कई खतरे पैदा होंगे. इनमें सबसे निर्णायक तो यही होगा कि पश्चिमी दुनिया जिस मात्रा में असरहीन होगी, उतनी ही तेजी से नई विश्व व्यवस्था का निर्माण होगा.

प्रतिस्पर्धा – सहयोग का खेल

गिरीशजी: चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की भारत यात्रा : भारत के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग की दो दिवसीय पारी खेल कर चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ पाकिस्तान रवाना हो गए. दिल्ली में दोनों देशों के बीच 16 बिलियन डालर के समझौते पर दस्तखत हुए और द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को 2015 तक सौ बिलियन डालर तक विस्तारित करने का संकल्प भी व्यक्त किया गया. लगा कि इस पहल से रिश्तों में सुधार की प्रक्रिया और मजबूत ही होगी.

‘शालीन लौ’ हमेशा रोशन करेगी!

[caption id="attachment_18904" align="alignleft" width="90"]सुरेन्‍द्र मोहनसुरेन्‍द्र मोहन[/caption]: श्रद्धांजलि : समाजवादी-राजनीतिक विचारक सुरेंद्र मोहन का गुजर जाना उन मूल्यों और संस्कारों के लिए हादसा है जो नैतिकता, सद्भाव, लोकतंत्र और समाजवाद के जन सरोकारों और जमीनी सच्चाइयों से जुडे हैं. वैसे भी आज की सियासत में सबसे ज्यादा कमी इन्हीं की है, इसलिए भी ये हादसा ही ज्यादा है.

सच से डर लगता है

गिरीश: श्याबाओ हों या विकिलीक्स- कहानी एक है : ‘चीन तब तक दुनिया का नेता नहीं बन सकता, जब तक कि वो मानवाधिकार हनन नहीं रोकता. हालांकि लू श्याबाओ की कहानी एक अरब से ज्यादा लोगों में से एक व्यक्ति की कहानी है, लेकिन ये व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के प्रति चीन की सरकार की असहिष्णुता का प्रतीक है.’ आर्चबिशप डेसमंड टूटू और वेस्लाव हावेल (दोनों नोबेल शांति पुरस्कार के पूर्व विजेता). ’चीन ने जो किया वो दुखद है…बहुत दुखद. एक मनुष्य होने के नाते मैं श्याबाओ की ओर अपना हाथ बढाना चाहती हूं.’ आंग सान सू ची (नोबेल शांति पुरस्कार की पूर्व विजेता). ’इस साल 2010 के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता श्याबाओ का काम तुलनात्मक रूप से मुझसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है… मैं अपील करता हूं कि चीन सरकार उन्हें तुरंत रिहा करे.’ बराक ओबामा (2009 में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता).

आएगी पारदर्शिता!

गिरीश: विकीलीक्स धमाके हों या राडिया, कॉमनवेल्थ, आदर्श जैसे खुलासे : इस समय वेबसाइट विकीलीक्स को लेकर सारी दुनिया में खासी चर्चा है. अनेक सत्‍ता तंत्र सकते में हैं. जो अमेरिका इंटरनेट में पहल के संदर्भ में कभी सिरमौर हुआ करता था, अब वही खुद इंटरनेट के निशाने पर है और हकबकाया हुआ सभी जगह सफाई देता घूम रहा है, इन सबके बीच गौरतलब ये है कि विश्व स्तर पर जो काम विकीलीक्स कर रहा है, लगभग उसी दरम्यान भारत में भी खुलासों का बाजार खासा गर्म है-चाहे कॉमनवेल्थ गेम्स का एक लाख 70 हजार करोड़ का घोटाला हो, उद्योगपतियों-दलालों-राजनीतिज्ञों-मीडियाकर्मियों के गठजोड़ की पोल खोलती नीरा राडिया टेप प्रकरण हो, स्पेक्ट्रम घोटाला हो, आदर्श सोसाइटी मामला हो या फिर कुछ और – ये सुर्खियां भी विकीलीक्स के खुलासों की धारा से कहीं-न-कहीं जुड़ती-सी प्रतीत होती हैं. उसी धारा की परछाई-सी लगती हैं. रही बात हंगामे की तो वो वहां भी है, यहां भी है – भले ही उनके रूप थोड़े अलग हैं. लेकिन मूल सवाल यही है कि इन खुलासों के संकेत क्या हैं? क्या ये पूंजीवाद और पूंजीवादी दरबारी लोकतंत्र के द्वंद्व-अंतर्द्वंद्व का खुलासा है? ये लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत है या फिर दुखद? ऐसे अनेक सवाल उठ रहे हैं.

काबा हो तो क्या, बुतखाना हो तो क्या!

गिरीश: 6 दिसंबर 1992 की बरसी पर : बाबरी मस्जिद की शहादत की आज 18वीं बरसी है. कुछ लोग इसे विवादित इमारत या ढांचा भी कहते थे. उत्‍तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में मस्जिद की रक्षा के लिए चली गोली में 28 लोगों की जान गई थी, तो कल्याण सिंह सरकार के जमाने में 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने ढांचे को ध्वस्त कर दिया था, और सरकारी तंत्र वहां खड़ा तमाशबीन ही नहीं था, बल्कि उसने कारसेवकों की अप्रत्यक्ष रूप से मदद ही की थी. फिर इसे लेकर देश में ही नहीं, विदेशों में भी भड़के दंगों में अनेक निरपराध लोगों की जान गई थी.

आज भी हैं ये शक्तिपुंज

गिरीश मिश्र : 31 अक्तूबर पर विशेष : इंदिराजी, लौह पुरुष और आचार्यजी : आज 31 अक्तूबर है. भारतीय इतिहास के तीन सितारों को याद करने का दिन. आज इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि है तो वल्लभभाई पटेल और आचार्य नरेंद्र देव की जयंती. दिलचस्प है कि तीनों की धाराएं भले ही अलग हों, पर वे अपने क्षेत्र के शिखर व्यक्तित्व हैं. शक्तिपुंज हैं. अतुलनीय और अविस्मरणीय भी.

ये 7 बुराइयां

गांधी जीगांधी पुण्यतिथि पर विशेष : इस वैश्विक दुनिया में बापू की पुण्यतिथि हर साल जयन्ती की तरह आती है और चली जाती है. अखबारों में चित्र दिखते हैं, कुछ लोग फूल चढ़ाते नज़र आते हैं और फिर हर साल हम गांधी से अपनी दूरी बढ़ाते ही जाते हैं. जैसे किसी कर्मकाण्डी की तरह चन्द क्षणों के लिए जुबान पर, और फिर लंबी छुट्टी. इसके अलावा कभी वो दिखते हैं प्रोडक्ट बेचने के नए हथकण्डे के रूप में. एक कंपनी के सीमेंट के विज्ञापन में टीवी पर अमिताभ बच्चन यह कहते हुए दिखते हैं कि देश छोड़कर जाने वाला विदेश में भी प्रभाव छोड़ता है. जैसे गांधी के दक्षिण अफ्रीका में सत्य के प्रयोग की तरह वो सीमेंट भी दुनिया में दिग्विजय यात्रा पर निकल पड़ी हो. कभी सियासी पार्टियों के सम्मेलनों-बैठकों में गांधी के चित्र झांकते नज़र आते हैं. गोया उनके लिए कॉस्मेटिक सरीखे भर रह गए हों बापू. तो ये है हमारी सच्चाई. सभी उनकी तस्वीर लगाते हैं, माल्यार्पण करते हैं, लेकिन व्यवहार में आचरण एकदम उलट.