ये हाल है हिंदी पायनियर के पत्रकारों का!

एडिटर, भड़ास4मीडिया, महोदय, भड़ास इतनी भरी है कि अगर अब न बोला तो शायद मैं मनोरोगी हो जाऊं. मजबूरी ये है कि पहचान उजागर नहीं कर सकता. पर उम्मीद करता हूं कि मैं जो कुछ कहूंगा, उसके तथ्यों को आप अपने स्तर पर पता करने के बाद मेरी भड़ास को जरूर प्रकाशित करें ताकि कई बेचैन आत्माओं को राहत मिल सके. शायद पत्रकारिता ने अपनी दशा और दिशा कुछ तथाकथित भंड़ुए संपादकों के कारण खो दी है.