रिपोर्टिंग के रिश्ते

रवीश कुमारसात साल की रिपोर्टिंग से न जाने कितने रिश्ते अरज लाया हूं। ये रिश्ते मुझे अक्सर बुलाते रहते हैं। जिससे भी मिला सबने कहा दुबारा आना। ऐसा कभी नहीं हुआ कि दुबारा उस जगह या शख्स के पास लौटा जा सके। तात्कालिक भावुकता ने दोबारा आने का वादा करवा दिया। मिलने वालों से स्नेह-सत्कार,भोजन और उनका प्रभाव इतना घोर रहा कि बिना दुबारा मिलने का वादा किये आया भी नहीं जाता था। सबको बोल आया कि जल्दी आऊंगा। अब आंसुओं से भर जाता हूं। एक रिपोर्टर सिर्फ दर्शकों का नहीं होता,वो उनका भी होता है जिनसे वो मिलता है, जिनकी सोहबत में वो जानकारियां जमा करता है और जिनके सहारे वो दुनिया में बांट देता है। रिपोर्टिंग में मिले इन सभी रिश्तों में झूठा साबित होता जा रहा हूं। क्या करूं उनका इंतज़ार खतम नहीं होता और मेरा वादा पूरा नहीं होता।