यह दलित विरोधी पत्रकारिता है

हमारी पत्रकारिता का हिन्दूवादी, ब्राह्णवादी चेहरा अक्सर हमें दिख जाता है। सामान्य स्थितियों में तो यह आधुनिक, प्रगतिशील, निष्पक्ष, लोकतांत्रिक होने का स्वाँग करता हुआ हमें दिखता है। लेकिन जब भी इसके अन्तर्मन पर चोट पड़ती है या जब भी इसके अन्दर बैठे किसी ब्राह्मण या सवर्ण पर प्रहार होता है तब यह तिलमिला उठता है। ऐसे में इसकी सारी बड़ी बड़ी बातें धरी की धरी रह जाती हैं। लखनऊ में हुए दलित नाट्य महोत्सव में हमें पत्रकारिता का ऐसा ही चेहरा देखने को मिला।

राजनीति और संस्‍कृति में नया रंग भरती भगत सिंह और पाश की शहादत

[caption id="attachment_19924" align="alignleft" width="85"]कौशल किशोरकौशल किशोर[/caption]23 मार्च शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का शहादत दिवस है। इन तीन नौजवान क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। इस घटना के 57 साल बाद 23 मार्च 1988 को पंजाब के प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश को आतंकवादियों ने अपनी गोलियों का निशाना बनाया।

रेवान्‍त पत्रिका का लखनऊ में लोकार्पण

: कला और साहित्‍य सामाजिक बदलाव के वाहक : कला और साहित्य दुनिया में सामाजिक बदलाव के लिए चले राजनीतिक व सामाजिक आंदोलन का न सिर्फ आईना रहा है बल्कि वह बेहतर समाज के निर्माण के संघर्ष में प्रेरक भी बनता रहा है। इतिहास में उदाहरणों की कमी नहीं है। फ्रांस की राज्य क्रान्ति हो या रूसी क्रान्ति, इस संदर्भ में साहित्य की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। रूसी क्राति के संदर्भ में हम देखते हैं कि टॉलस्‍टाय, गोर्की, चेखव के साहित्य ने जागरण का काम किया।

डा. सेन की सजा के खिलाफ लखनऊ में कई संगठनों का प्रदर्शन

जसमछत्‍तीसगढ़ की निचली अदालत द्वारा विख्यात मानवाधिकारवादी व जनचिकित्सक डॉ. बिनायक सेन को दिये उम्रकैद की सजा के खिलाफ तथा उनकी रिहाई की माँग को लेकर जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से 2 जनवरी 2011 को लखनऊ के शहीद स्मारक पर विरोध प्रदर्शन व सभा का आयोजन किया गया। इसके माध्यम से लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, नागरिक अधिकार व जन आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने विनायक सेन की सजा पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह का फैसला हमारे बचे-खुचे जनतंत्र का गला घोटना है। यह नागरिक आजादी और लोकतंत्र पर हमला है। इसलिए बिनायक सेन की रिहाई का आंदोलन लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष है।