महिलाओं को गैर बराबरी से नहीं मिल पाई मुक्ति

सुमनजी: महिला दिवस (8 मार्च) पर विशेष : महिलाओं की स्थिति का अन्दाजा उन्हें पैदा होने से पहले भ्रूण में मार देने, महिला आरक्षण विधेयक के पास होने में बाधाओं, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते उत्पीड़न और शोषण की घटनाओं से आसानी से लगाया जा सकता है। महिला सशक्तीकरण के दावों में कितनी सत्यता है, इसे भी इससे परखा जा सकता है। धन और धरती में असमानता तथा भेदभाव न सिर्फ भारत जैसे देशों में वरन दुनिया के विभिन्न देशों में विभिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं।

‘मिशन’ पर हैं भास्कर की ये 18 महिला पत्रकार

दैनिक भास्कर में प्रकाशित विज्ञापन का एक अंशभोपाल में डेरा : कल्पेश  ‘बेरोजगार’ : भास्कर समूह कंटेंट प्लानिंग में लगातार बाजी मार रहा है. महिला दिवस के मौके पर यह समूह जो कुछ कर-करा रहा है, वह बेमिसाल है. आज दैनिक भास्कर में लगभग आधे पेज का विज्ञापन निकला है. इसे देखकर पता चलता है कि महिला दिवस के दिन जो अखबार मार्केट में आने वाला है, वह ‘महिलाओं के लिए, महिलाओं के द्वारा और महिलाओं का’ अखबार होगा. इसके लिए दैनिक भास्कर से जुड़ी कई महिला पत्रकार पिछले कई हफ्तों से जी-जान से जुटी हुई हैं. ये महिला पत्रकार भास्कर समूह के अलग-अलग एडिशनों में कार्यरत हैं और कई हफ्तों से भोपाल आकर सिर्फ एक ही मिशन में लगी हुई हैं. वह मिशन है महिला दिवस के दिन दैनिक भास्कर को सिर्फ अपना अखबार बनाना. यानि आधी दुनिया के हाथों तैयार, आधी दुनिया के लिए और आधी दुनिया का अखबार बनाना.

महिला दिवस और कुरार गांव की औरतें

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) का ज़िक्र होते ही मुझे कुरार गाँव की औरतों का ध्यान आता है। मुम्बई के उपनगर मालाड (पूर्व) में ईस्टर्न हायवे से सटी हुई विशाल बस्ती का नाम है ‘कुरार गाँव’। दूर तक इस बस्ती के सिर पर बस सीमेंट की छतें नज़र आती हैं। बीस साल पहले जब मैंने वहाँ एक चाल में अपना रैन बसेरा बनाया था तो यहाँ छ: पार्षद थे यानी लगभग 6 लाख की आबादी थी। बहुत कुछ बदला मगर न तो ‘कुरार गाँव की औरतें’ बदलीं और न ही उनकी ज़िंदगी बदली। उनका सोच-विचार और व्यवहार आज भी वैसा ही है। मुझे उस समय किंचित आश्चर्य हुआ था कि मेरे पड़ोसी टिम्बर मर्चेंट कासिम की बीवी ही नहीं जवान बेटी भी अनपढ़ है। सर पर डिब्बा लादकर इडली बेचने वाले अन्ना की पत्नी अनपढ़ है तो सिक्योरिटी गार्ड तिवारी की पत्नी भी अनपढ़ है। कुल मिलाकर उस गांव में अनपढ़ औरतों की संख्या काफी थी।