जनकवि हूं मैं क्‍यों हकलाउं

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा… चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा. जी हां, सपने में नहीं, अपितु यथार्थ में नागार्जुन के जन्‍मशती पर विमर्श के लिए महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा द्वारा पटना (ए.एन.सिन्‍हा समाज अध्‍ययन संस्‍थान) में ‘नागार्जुन एकाग्र’ पर आयोजित समारोह के दौरान साहित्‍यकारों ने उनको याद किया गया। नागार्जुन के साहित्‍य पर विमर्श का लब्‍बोलुआब था कि बाबा नागार्जुन जनकवि थे और वे अपनी कविताओं में आम लोगों के दर्द को बयां करते थे। वे मानते थे कि जनकवि हूं, मैं क्‍यों हकलाउं।