कोयलांचल के मिजाज को समझ पाने में फेल रहा दैनिक भास्कर धनबाद

17 अप्रैल से धनबाद कोयलांचल के बाजार में पूरे ताम-झाम के साथ दैनिक भास्कर उतरा और पूरी तरह से फ्लॉप हो गया. यह एकदम सही है. इसकी  एक बड़ी वजह यह है कि दैनिक भास्कर धनबाद कोयलांचल के मिजाज को समझ पाने में एकदम फेल रहा. न तो पहले दिन और न ही अंतिम दिन भास्कर की जो टीम बनी है, वह भी एकदम डी ग्रेड की है. हिंदुस्तान और प्रभात खबर से जो लोग भास्कर में गये, वे एक तरह से दोनों अखबारों में रिजेक्‍ट श्रेणी में थे.

बेहतर टीम बनाने की भास्कर की तमाम कोशिशें नाकाम हो गयी. अंतत: भास्कर को जैसे-तैसे टीम बनानी पड़ी. प्रभात खबर ने अपने जिन दो रिपोर्टरों अखिलेश कुमार व अमित रंजन को गलत-तथ्यहीन रिपोर्टिंग और बिना सूचना के अक्‍सर गायब होने की शिकायत को लेकर बर्खास्त कर दिया था, उन्हें भास्कर को अपना स्टार रिपोर्टर बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा. आज निश्चित तौर पर भास्कर को कोयलांचल के पाठकों ने रिजेक्‍ट कर दिया है. हालात यह बने हैं कि मजबूर होकर भास्कर को मुफ्त में अखबार बांटना पड़ रहा है. पिछले दो दिनों से धनबाद में जिन घरों में प्रभात खबर, हिंदुस्तान और जागरण जाता है, वहां मुफ्त में भास्कर की कॉपियां फेंकी जा रही हैं. भास्कर को जितनी खराब स्थिति का सामना धनबाद में करना पड़ रहा है, उतनी खराब स्थिति देश में शायद ही कहीं और झेलनी पड़ी हो.

सिर्फ एक संस्करण ही निकाल पाया भास्कर : यही नहीं धनबाद से निकलने वाले सभी अखबार प्रभात खबर, हिंदुस्तान व दैनिक जागरण की ओर से धनबाद, बोकारो और गिरिडीह तीनों जिलों के लिए तीन अलग-अलग संस्करण निकाले जाते हैं. दैनिक जागरण ने भी वर्ष 2003 में जब धनबाद से प्रकाशन शुरू किया, तब पहले दिन से ही धनबाद, बोकारो और गिरिडीह तीनों जिलों के लिए तीन संस्करण निकाले थे. मगर भास्कर सिर्फ एक संस्करण ही निकाल पाया, वह भी धनबाद जिले के लिए. बोकारो व गिरिडीह में आज तक उसकी टीम नहीं बन पायी है.

हिंदुस्तान नंबर वन है : एक सच यह भी : जब बात पूरे झारखंड की होती है, तो प्रभात खबर नंबर वन है. रांची और जमशेदपुर में प्रभात खबर का प्रसार हिंदुस्तान की तुलना में सीधे दोगुना है. मगर धनबाद में हिंदुस्तान नंबर वन है और प्रभात खबर दूसरे स्थान पर है. इसकी सबसे बड़ी वजह है धनबाद और बोकारो में बड़े पैमाने पर बिहार के लोगों का होना. और बिहार के लोगों के बीच में पिछले ढाई दशक से हिंदुस्तान एक ब्रांड बना रहा है. पटना से नवभारत टाइम्स का प्रकाशन बंद होने के बाद से ही. उस दौर में जब धनबाद और बोकारो में अखबार का मतलब होता था आवाज (एक स्थानीय हिंदी दैनिक), तब भी पटना से छपकर धनबाद के मार्केट में आनेवाला हिंदुस्तान अधिक बिकता था. कारण हिंदुस्तान में बिहार की खबरों के 5-6 पन्ने होते थे.

कुछ और सच : पहला सच : आज हिंदुस्तान धनबाद में अपने अस्तित्व संकट से जूझ रहा है. वजह तेजी से बढ़ता प्रभात खबर. अप्रैल,  2010 जहां धनबाद, बोकारो व गिरिडीह में प्रभात खबर की मुश्किल से 20,000 कॉपियां बिकती थीं, वहीं आज 82,700 कॉपियां हर रोज बिक रही हैं. जून, 2010 में धनबाद समेत पूरे झारखंड में प्रभात खबर, हिंदुस्तान व दैनिक जागरण ने अपने-अपने अखबार की कीमतें घटाकर दो रुपये की. दो रुपये कीमत होने का सबसे ज्यादा लाभ प्रभात खबर को मिला. हिंदुस्तान की भी कुछ कॉपियां बढ़ी हैं, मगर प्रभात खबर जैसी दोगुनी-तीगुनी नहीं.

दूसरा सच : धनबाद में आज हिंदुस्तान का प्रोडक्‍ट बेहद कमजोर है. हिंदुस्तान आज अपने संपादकीय कंटेंट के बूते नहीं, बल्‍िक एजेंट आरएन सिंह के बल  पर बिक रहा है. धनबाद में हिंदुस्तान के एजेंट आरएन सिंह काफी पुराने एजेंट हैं. आरएन सिंह के पास बांग्ला अखबार आनंदोबाजार और अंगरेजी का अखबार द टेलीग्राफ है. कोई हॉकर यदि हिंदुस्तान की एक कॉपी घटाता है, तो उसे आरएन सिंह आनंदोबाजार व टेलीग्राफ देना बंद कर देते हैं. हॉकर मजबूर होते हैं, क्‍योंकि हिंदी भाषी पाठक कोई भी अखबार पढ़ सकते हैं, मगर धनबाद के बांग्ला भाषी 20 हजार पाठक सिर्फ और सिर्फ आनंदोबाजार पढ़ते हैं.

तीसरा सच : धनबाद में हिंदुस्तान का वर्षों पुराना गढ़ अब ध्वस्त होने को है. वजह प्रभात खबर की तेजी से बढ़ती मांग. यहां गौरतलब है कि हाल में एआईआर की रिपोर्ट में धनबाद में प्रभात खबर का सबसे ज्यादा 18 प्रतिशत ग्रोथ बताया गया है.

आपके भड़ास4मीडिया की निम्‍नलिखित पंक्तियां एकदम गलत हैं : हिंदुस्‍तान के संपादक ओमप्रकाश अश्‍क के लंबे समय का गहरा अनुभव और उनके सानिध्‍य में काम कर चुके दैनिक जागरण के संपादक बसंत भारतीय की रणनीति ने भास्‍कर को पहले ही दिन पटकनी दे दी। दोनों ने अपने अपने अखबारों के बेहतरीन कंटेंट जुझारू तेवर का अखबार में नजारा पेश कर भास्‍कर को हर मोर्चे पर चित कर दिया।

सच तो यह है : धनबाद में बीते 17 अप्रैल  को भास्कर के प्रकाशन के दिन न सिर्फ भास्कर फ्लॉप हुआ, बल्कि कंटेंट के मामले में हिंदुस्तान व दैनिक जागरण भी पीछे छूट गये. बेहतर कंटेंट व जुझारू तेवर दिखा, तो सिर्फ प्रभात खबर का. उस दिन का ईपेपर देख सकते हैं.

हिंदुस्तान के पहले पन्ने पर ओमप्रकाश अश्क ने झरिया पर बॉटम लिखा है : हल्की भी हिली धरती, तो जमींदोज होगी झरिया. झरिया की कोयला खदानों में लगी आग और उस कारण हो रहे भू-धंसान की समस्या काफी पुरानी है. रही बात धरती हिलने की, तो दुनिया में कहीं भी धरती हिलेगी, तो वहां का क्‍या होगा, यह बताने की जरूरत नहीं. क्‍या दिल्‍ली और गुजरात में धरती हिलेगी, तो सब कुछ सामान्य रहेगा?

इसी तरह दैनिक जागरण में उस दिन अपने पहले पन्ने पर एक खबर छाप दी है : दांव पर लाखों श्रमिकों की जिंदगी.. इस खबर में खान सुरक्षा महानिदेशालय के महानिदेशक सतीश पुरी का बयान है. महानिदेशक की प्रतिक्रिया आप खुद ही बात करके जान सकते हैं.  महानिदेशक ने कहा है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में जागरण जैसा झूठा अखबार नहीं देखा.

प्रभात खबर ने भास्कर के प्रकाशन के दिन किस तरह का कंटेंट दिया और उसके बाद लगातार किस तरह का अभियान चला रहा है, उसका प्रमाण ईपेपर के जरिए देख सकते हैं. यूपी तक कोयला के अवैध धंधेबाजों के खिलाफ अभियान शुरू है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

एक संपादक का अलविदा पत्र

दीपक अंबष्ठ
दीपक अंबष्ठ
प्रभात खबर, धनबाद के संपादक दीपक अंबष्ठ ने प्रबंधन को पत्र भेजकर अखबार से मुक्ति की अपील की है. ऐसा उन्होंने स्वास्थ्य कारणों के चलते किया है. किडनी, डायबिटीज, सुगर की बीमारियों से पीड़ित दीपक अंबष्ठ की उम्र पचास के आसपास है. उन्होंने जीवन में शराब तो छोड़िए, चाय तक नहीं पी. सादा जीवन जीते रहे. सादा खाना खाते रहे.

इस सादगी का नतीजा ऐसा निकला कि वे कई रोगों से परेशान होकर देर रात तक वाली अखबारी नौकरी न कर पाने की स्थिति में आ गए है. वे रांची जाकर अपने परिवार के साथ रहना चाहते हैं. इसीलिए उन्होंने प्रभात खबर प्रबंधन को पत्र भेजकर अखबार से मुक्त कर देने की अपील की है. प्रबंधन ने उन्हें नई व्यवस्था होने तक पद पर बने रहने को कहा है.

25 दिसंबर 1960 को जन्मे दीपक अंबष्ठ ने रांची विश्वविद्यालय से इतिहास में बीएन आनर्स की डिग्री ली और 1984 में प्रभात खबर अखबार के रांची से शुरू होने के समय इससे जुड़ गए. 1985 में वे पटना के ब्यूरो चीफ बने. 1987 में चीफ सब एडिटर पद पर प्रमोट हुए.  प्रभात खबर से इस्तीफा देकर वे 1988 में रांची एक्सप्रेस के हिस्से डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में बन गए. बाद में वे 1989 में लोकमत समाचार में सीनियर सब एडिटर बनकर पहुंचे.  1992 में फिर रांची एक्सप्रेस में आए और न्यूज एडिटरर बने.

वर्ष 2000 में हिंदुस्तान, रांची में चीफ सब के रूप में नियुक्त हुए. वर्ष 2002 में हिंदुस्तान में उनका तबादला भागलपुर के लिए कर दिया गया. वहां वे डिप्टी न्यूज एडिटर बनकर पहुंचे. वर्ष 2003 में वे हिंदुस्तान, जमशेदपुर के न्यूज एडिटर बनाए गए. अगले साल वे यहीं संपादकीय प्रभारी बना दिए गए. वर्ष 2008 में फिर से वे प्रभात खबर में जुड़ गए और धनबाद के स्थानीय संपादक बना दिए गए. तबसे वे धनबाद में ही जमे हैं.

भड़ास4मीडिया के अनुरोध पर दीपक अंबष्ठ ने अपनी मनःस्थिति को एक संक्षिप्त टिप्पणी के जरिए प्रकट की है. अपनी पत्रकारीय यात्रा के विराम लेने की बात कहते हुए दीपक आश्वस्त करते हैं- ”मैं पत्रकारिता की मीठी यादें लिए जा रहा हूं”.  दीपक ने जो कुछ लिखकर भेजा है, वह इस प्रकार है-


अखबारी कागज की महक से दूर होने की बेला

साथियों, अखबार जगत में दो दशक से भी अधिक का सफर अपने अंतिम पड़ाव पर आ गया है. पत्रकारिता के कई मरहलों से गुजरता हुआ मैं प्रभात खबर, धनबाद के स्थानीय संपादक के पद तक पहुंचा. लंबी कहानी है यह. इसकी बात फिर कभी. अभी तो मैं उन्हें याद कर रहा हूं, जिनसे मैं प्रभावित हुआ. अस्सी के दशक से मैंने पत्रकारिता की शुरुआत की. पहले खेल पत्रकार रहा. रिपोर्टिंग की. फिर डेस्क पर आया. डेस्क पर काम करने के दौरान भी रिपोर्टिंग नहीं छूटी. रिपोर्टिंग की लत आज भी लगी है. खबर मिलने पर कभी कभार निकल ही जाया करता हूं. पर आने वाले 20-25 दिनों में ये बातें मेरे जेहन में इतिहास हो जायेंगी, क्योंकि तब मैं अखबारी कागज की महक से दूर हो चुका होउंगा. हर शाम उन शामों से एकदम जुदा होंगी, जो अखबार के ऑफिस में हुआ करती है.

मैं याद करता हूं अपने मित्र छोटे भाई और कभी लोकमत नागपुर में सहयोगी तथा एक साथ रहने वाले पुण्य प्रसून बाजपेयी को जो इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़ने के बाद भी कहा करते थे ‘यार, कागज की महक मुझे अखबार की ओर खींचती है’. कुछ ऐसी ही बातें मेरे जेहन में भी हैं. प्रभात खबर के पहले संपादक एस. एन. विनोद और पत्रकारिता में मेरे संभवतः अंतिम संपादक वह भी प्रभात खबर के ही हरिवंश, दोनों एकदम अलग तरह के व्यक्ति हैं, पर दोनों से सीखने लायक कई बातें रही हैं. वरिष्ठ पत्रकार उदय सिन्हा भी वैसे लोगों में रहे, जिनके साथ काम करने का अलग मजा रहा.

श्री बलवीर दत्त, बैजनाथ मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, विजय भाष्कर, रजत कुमार गुप्ता, दिनेश जुयाल, अजय शुक्ला, प्रदीप अग्निहोत्री, कुमार पीयूष, लोकमत के कल्याण कुमार सिन्हा, प्रकाश चंद्रा, मणिमाला और न जाने कितने लोग… जिनके साथ काम करने का मौका मिला. कुछ मेरे वरीय रहे तो शेष सहयोगी, इनकी यादें साथ हैं. मैं पत्रकारिता की मीठी यादें लिये जा रहा हूं, क्योंकि अच्छी चीजें ही जीने का सहारा बनती हैं. कभी अनजाने में किसी को कोई दुख पहुंचाया हो तो माफ करिएगा. मैं अपनी कमियों-गल्तियों के लिए क्षमा चाहता हूं. उम्मीद करता हूं कि आप सभी का प्यार, स्नेह व संबंध बना रहेगा.

शुक्रिया….

दीपक अम्बष्ठ

स्थानीय संपादक

प्रभात खबर

धनबाद

संपर्क : 09470572555