देश के स्ट्रिंगरों साथ आओ लड़ाई लड़ने के लिए

पूरे देश में काम करने वाले न्यूज़ चैनल जिनके भरोसे चलते हैं उनके हितों के लिए लड़ने वाला कोई भी नहीं है. जब चाहा हमे काम पर रख लिया,  जब चाहा हमे काम से निकाल दिया.  इन न्यूज़ चैनलों को टीआरपी दिलाने वाले, जिन्हें ये कभी संवाददाता, कभी रिपोर्टर या कभी स्ट्रिंगर के नाम से बुलाते हैं किन्तु हम इनके लिए मात्र बंधुआ मजदूर से अधिक की हैसियत नहीं रखते हैं.

हम ठेके पर काम करने वाले मजदूर हैं या पत्रकार!

:अपनी पहचान के लिए आगे आएं स्ट्रिंगर : यशवंत जी, मैं भड़ास के माध्यम से पूरे देश में काम कर रहे स्ट्रिंगरों से आह्वान करना चाहता हूं कि वे अपनी पहचान के लिए, अपने अस्तित्व के लिए आगे आये और वे जिस संस्थान में काम कर रहे हैं उस संस्थान से लिखित रूप से मांगें कि वे क्या ठेके पर काम करने वाले मजदूर हैं या पत्रकार. यह सवाल पूछने पर मैं इसलिए विवश हुआ हूं कि सिवनी के जनसंपर्क विभाग ने माननीय हाईकोर्ट जबलपुर में मेरे ऊपर पुलिस प्रशासन द्वारा बनाये गये फर्जी मामलों के जबाब में एक पत्र लगाया है कि स्ट्रिंगर पत्रकार की श्रेणी में नहीं आते हैं,  वो एक अनुबंध के आधार पर संस्थानों के साथ काम करते है.

मध्य प्रदेश में फर्जी पत्रकार संगठन!

पत्रकारिता के मायने बदलते ही जा रहे हैं. फर्जी और ब्लैकमेलर लोग अपने आप को पत्रकार बता कर गौरवान्वित महसूस करते हैं. वहीं सही मायने में पत्रकारिता से जुड़ा पत्रकार इनके सामने अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है. फर्जी पत्रकारिता को वास्तविक रीके से बढ़ावा देने का श्रेय मध्य प्रदेश में संचालित हो रहे पत्रकार संगठनों को जाता है.